Rag darbari, p.96

Rag Darbari, page 96

 

Rag Darbari
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  बद्री पहलवान शामियाने का एक कोना घेरकर लेटे हुए थे। बिना पूरी बात सुने ही वे समझ गए कि छोटे पहलवान रुप्पन को अपने से भी छोटा बनाकर पेश करना चाहते हैं। उन्होंने एक सीनियर उस्ताद के लहजे़ में कहा, ‘‘बस, बस...ज़बान पर लगाम लगाए रहो।’’

  छोटे पहलवान चुप हो गए। फिर अचानक बिगड़कर बोले, ‘‘यह चिड़ीमार लगता है कि रात कर डालेगा।’’

  इसी को लोकापवाद कहते हैं। डिप्टी डायरेक्टर ऑफ़ एजुकेशन ने भी चींटी तक नहीं मारी थी।

  चार बजे के क़रीब वैद्यजी सनीचर के साथ डाकबँगले के फाटक पर आते हुए दीख पड़े। शहर से आए हुए ग्रामोफ़ोनवाले ने मौके के हिसाब से एक फ़िल्मी गाना लगा दिया, जिसके शुरू के बोल थे, ‘नज़र लागी राजा तोरे बँगले पर।’ सुनते ही छोटे पहलवान ने इतने जा़ेर से डाँट लगायी कि ग्रामोफ़ोन अपने–आप रुक गया। लोग अपनी–अपनी जगह पर क़ायदे से बैठ गए, कुछ खड़े हो गए। सिर्फ़ बद्री पहलवान टूटे हुए तने की तरह कोने में पड़े रहे। वैद्यजी आकर इत्मीनान से एक क़ालीन पर बैठे। अपने–आप उनके पीछे मसनद लग गई, सनीचर और प्रिंसिपल एक किनारे खड़े हो गए जैसे हाथ में चँवर पकड़ने की नीयत हो। वैद्यजी के बैठते ही लगा, कोई चक्रवर्ती महाराज सिंहासन पर बैठा हुआ है। उनके मुक़ाबले दूसरे शामियाने में बैठे हुए खन्ना मास्टर और रुप्पन बाबू आदि बिलकुल लुच्चे–लफंगे–से दीखने लगे।

  वैद्यजी ने प्रिंसिपल से पूछा, ‘‘क्या समाचार है ?’’

  प्रिंसिपल साहब उत्साह से बताने लगे, ‘‘अपने आदमी सब आसपास ही में हैं। उधरवालों को बहुमूत्र का रोग हो रहा है।’’

  सनीचर ने मज़ा लेते हुए कहा, ‘‘तो कहो रुप्पन बाबू को बुलाकर पूछा जाय। ज़्यादा तकलीफ़ हो तो महराज के दवाखाने से लेकर एक–एक गोली जमालगोटे की भी बाँट दी जाए।’’

  वैद्यजी के चेहरे की प्रसन्नता ढल गई। बोले, ‘‘उस नीच का नाम न लो।’’ थोड़ा रुककर वे फिर स्वस्थ हो गए। उन्होंने पूछा, ‘‘डिप्टी डायरेक्टर का अभी पता नहीं चला ? अब तो सूर्यास्त होने में विलम्ब नहीं रह गया।’’

  प्रिंसिपल ने इस उम्मीद में कि शायद यह बात भी हाकिमों के कान तक पहुँच जाएगी, दुम–हिलन्तू आवाज़ में कहा, ‘‘इतने बड़े अफ़सर हैं। किसी मीटिंग में फँस गए होंगे। अब आ ही जाना चाहिए।’’

  ‘‘किसी को भेज देना था।’’

  ‘‘सो तो भेज दिया है।’’ प्रिंसिपल ने सूचित किया, ‘‘मास्टर मोतीराम सवेरे गए हैं। वे न तो इस पार्टी में हैं, न उस पार्टी में। उनका मतलब तो अपनी आटाचक्की से है। इसीलिए हमने कहा, मास्टर साहब, तुम्हीं चले जाओ, बुजुर्ग आदमी हो। डी. डी. साहब के साथ गाड़ी पर बैठे हुए चले आना, कोई तुम्हें यह न कहेगा कि तुम हमारी तरफ़ से डी. डी. के कान भरने गए थे।’’

  वैद्यजी जनता का मनोरंजन करने के लिए किस्से सुनाने लगे :

  ‘‘तब हमारे प्रान्त में पन्तजी का ज़माना था। नयी–नयी राष्ट्रीय सरकार थी। चुनाव की एक मीटिंग थी। दस बजे पन्तजी को आना था। जिलाधीश, पुलिस कप्तान–सब चपरास बाँधे खड़े थे। ग्यारह बजे, फिर एक बज गया, उसके बाद दो बजे...।’’

  सनीचर ने उनकी बात काटकर कहा, ‘‘उसके बाद तो महाराज तीन बज गया होगा।’’

  वैद्यजी ने उदारतापूर्वक इस सूचना को स्वीकार किया। बोले, ‘‘वही हुआ। जब साढ़े तीन बजे तब अचानक पन्तजी की मोटर मीटिंग में आकर खड़ी हो गई। उधर क्या हुआ कि इतना बड़ा राष्ट्रनायक वहाँ पर उपस्थित था, परन्तु जिला के अधिकारी सब गायब। पता लगा, भोजन करने चले गए हैं...।

  किस्सा चलता रहा। पाँच बजने को आ गए। तब तक प्रिंसिपल साहब को जान पड़ा, उनके शामियाने से भी कई लोग उठ–उठकर झाड़ियों की ओर जाने लगे हैं। और बहुमूत्र की बीमारी इतनी व्यापक हो गई है कि कुछ लोग झाड़ियों के पीछे से वापस नहीं लौटे। पहलवान से कहा, ‘‘मेम्बर साहब, यह तो ठीक नहीं हो रहा है।’’

  छोटे पहलवान ऊब गए थे। बोले, ‘‘तो मैं क्या करूँ ? किसी का हगना–मूतना बन्द कर दूँ ?’’

  अब ग्रामोफ़ोन के गाने लगभग थक गए थे और लोग छोटे–छोटे गुट बनाकर बातचीत करने लगे थे। सूरज डूबने का वक़्त आ गया था। प्रिंसिपल साहब एकटक कुछ दूर डाकबँगले के पास सड़क के किनारे लगे हुए एक आम के पेड़ की ओर देखने लगे थे। पेड़ के जिस हिस्से पर उनकी निगाह थी, वहाँ एक सूखी टहनी थी। उस टहनी में हँसिया फँसा था। हँसिये से एक बाँस बँधा था। बाँस का नीचेवाला सिरा एक लड़की के हाथों में था। वह लड़की लगभग बीस साल की थी। उसकी धोती मैली थी, पर ब्लाउज़ उजला था और देह के कसाव से गले के नीचे चिटक गया था। प्रिंसिपल साहब, जैसा बताया गया, सिर्फ़ सूखी टहनी देख रहे थे। अचानक उन्होंने चौंककर सड़क के दूसरी ओर देखा और बोले, ‘‘यह बस यहाँ धीमी क्यों हो रही है ?’’

  लोग तेज़ी से बढ़कर फाटक की ओर जाने लगे। एक बस सचमुच ही डाकबँगले के आगे रुक गई थी।

  बस से एक बड़ा–सा झोला लटकाए मास्टर मोतीराम उतरे। दोनों तरफ़ के लोगों ने उन्हें घेर लिया। थोड़ी देर में वे वैद्यजी के पास आकर खड़े हो गए और बोले, ‘‘डिप्टी डायरेक्टर साहब आज नहीं आ रहे हैं।’’

  इस बात का ऐलान पहले ही गैर–रस्मी ढंग से हो चुका था; क्योंकि चारों ओर शोरगुल मचने लगा था और जिन्हें बहुमूत्र की बीमारी भी नहीं थी, वे तेज़ी से इधर–उधर फैलने लगे थे। प्रिंसिपल साहब ने पूछा, ‘‘तब ? फिर किस तारीख़ को आने को कहा है ?’’

  ‘‘कुछ नहीं कहा जा सकता। आज तो वे शहर में थे ही नहीं। तीन–चार दिन हुए, बाहर दौरे पर गए हैं। लौटे नहीं हैं।’’

  ‘‘कब तक लौटेंगे ?’’

  ‘‘क्या बताया जाय ? कोई कुछ जानता नहीं है। कोई कहता था चार दिन में आएँगे, किसी ने कहा पाँच दिन में। मेरा ख्याल है कि छ:–सात दिन तो लगेंगे ही लौटते–लौटते।’’

  वैद्यजी ने आँखें मूँदकर थकान–सी उतारी। पूछा, ‘‘तब आप दोपहर को क्यों नहीं लौट आए ? जनता को इतना कष्ट उठाना पड़ा।’’

  मास्टर मोतीराम विनम्रता से झुक गए। दोहरे होकर बोले, ‘‘कैसे आता महराज ! यह ख़रीदना था।’’ उन्होंने झोले की ओर इशारा किया और कहा, ‘‘पुरानी चक्की है। पुर्जों की टूट–फूट लगी ही रहती है। न जाने कहाँ–कहाँ ढूँढ़ा, फिर कहीं जाकर कबाड़ी बाज़ार में...।’’

  मास्टर मोतीराम का वार्तालाप सुननेवाले बहुत–से लोगों में रंगनाथ भी था। शत्रुपक्ष की ओर से शायद वही घटना का पूरा ब्योरा जानने के लिए आया था। जब वह धीरे–से खिसकने लगा तो वैद्यजी ने उसे पुकारा। वह उनके नज़दीक आकर बैठ गया।

  वैद्यजी उसे देखकर मुस्कराए। मुस्कराते हुए देखते रहे। रंगनाथ थोड़ी देर के लिए अचकचाया। फिर हिम्मत करके बोला, ‘‘क्या आज्ञा है मामाजी ?’’

  ‘‘आज्ञा कुछ नहीं है।’’ वैद्यजी मधुर स्वरों में बोले, ‘‘यह तो धर्मयुद्ध है। तुम्हें लगता है कि ये दो–चार अध्यापक सही मार्ग पर चल रहे हैं, अत: तुम उनसे स्नेह दिखा रहे हो। पर सन्मार्ग क्या है, और असन्मार्ग क्या है, इसका तुम्हें कभी–न–कभी तो अनुभव होगा ही। जब होगा, तब तुम स्वयं अपनी पहलेवाली स्थिति में आ जाओगे।’’

  साँस खींचकर वे बोले, ‘‘तुम शिक्षित हो, बुद्धिमान हो, मुझे तुम्हारी चिन्ता नहीं है। चिन्ता रुप्पन की है।’’

  बातों में जान लाने के लिए प्रिंसिपल ने किलकारी मारकर कहा, ‘‘अरे नहीं महराज, आप रंगनाथ बाबू को जानते नहीं ! ये बड़े राजनीतिज्ञ हैं। उधर का हाल पहले ही समझ चुके हैं, इन्हें समझाने की ज़रूरत नहीं है।’’

  वैद्यजी फिर मुस्कराए, ‘‘धर्मयुद्ध में समझ की नहीं, विश्वास की बात है। तुम्हें जब यही विश्वास है कि हम दोषी हैं, तो कोई चिन्ता नहीं; डटकर हमारा विरोध करो। जिस दिन मेरे प्राणों की आवश्यकता हो, बता देना। मैं भीष्म पितामह की तरह मरने की तिथि अपने–आप निश्चित कर लूँगा।’’

  रंगनाथ से कुछ कहते न बना। बोला, ‘‘आप कुछ गलत समझ रहे हैं।’’

  उनका चेहरा तमतमा गया। ज़ोर से बोले, ‘‘नहीं, गलत वे लोग समझ रहे हैं। मैं तो प्रजातन्त्र से चलता हूँ। सबको बोलने की स्वतन्त्रता देता हूँ। तभी तो अध्यापक, जो मेरे ही गुलाम हैं–मेरा विरोध करते हुए घूम रहे हैं। पर इसकी भी सीमा होती है, क्यों प्रिंसिपल साहब ?’’

  प्रिंसिपल साहब ने नीची निगाह करके कहा, ‘‘आपके आगे मैं क्या कह सकता हूँ ? पर आप न होते तो मैं बहुत पहले इस्तीफ़ा देकर चला जाता।’’

  ‘‘आप क्यों चले जाते ? अब समय आ गया है कि इस अध्याय को समाप्त कर लिया जाय। रुकिए, मैं अभी निर्णय किये देता हूँ।’’

  उन्होंने छोटे को पुकारकर कहा, ‘‘छोटे, उधर के शामियाने में चले जाओ। खन्ना और मालवीय को बुला लाना। रुप्पन को भी साथ लेते आना। वे नहीं आते तो हमीं लोग वहाँ चलेंगे। और देखो, जनता से कह दो कि वह अपने घर जाए। विश्राम करे। प्रिंसिपल साहब, तुम उधर जाकर जनता को धन्यवाद दे दो।’’

  थोड़ी देर में दोनों शामियाने वीरान हो गए। खन्ना मास्टर का शामियाना ज़रा पहले ही वीरान हो गया था, क्योंकि उधर लोगों का बहुमूत्र रोकने के लिए बद्री पहलवान और छोटे का व्यक्तित्व न था और डिप्टी डायरेक्टर धोखा दे गए, यह खबर पाते ही बहुत–से लोग एकदम से उड़नछू हो गए थे। अब उस शामियाने के पास ज़्यादातर वही लोग बचे थे जिनका काम माइक्रोफोन, ग्रामोफोन के रिकार्ड और पानी के सकोरे बटोरने का था। वैद्यजी के शामियाने में इधर बद्री पहलवान, छोटे, सनीचर, प्रिंसिपल साहब, वैद्यजी, दो–चार प्रतिष्ठित लोग और बद्री के अखाड़े के चन्द गुण्डे रह गए।

 

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