Rag darbari, p.12

Rag Darbari, page 12

 

Rag Darbari
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  पहलवान ने आँखें बन्द कर ली थीं। जम्हाई लेकर बोले, ‘‘कुछ सिनेमा का गाना–वाना भी गाते हो कि बातें झलते रहोगे ?’’

  रिक्शेवाले ने कहा, ‘‘यहाँ तो ठाकुर साहब दो ही बातें हैं, रोज़ सिनेमा देखना और फटाफट सिगरेट पीना। गाना भी सुना देता, पर इस वक़्त गला खराब है।’’

  पहलवान हँसे, ‘‘तब फिर क्या ? शहर का नाम डुबोए हो।’’

  रिक्शावाला इस अपमान को शालीनता के साथ हज़म कर गया। फिर कुछ सोचकर उसने धीरे–से ‘लारी लप्पा, लारी लप्पा’ की धुन निकालनी शुरू की। पहलवान ने उधर ध्यान नहीं दिया। उसने सवारी की तबीयत को गिरा देखकर फिर बात शुरू की, ‘‘हमारे भाई भी रिक्शा चलाते हैं, पर सिर्फ़ खास–खास मुहल्लों में सवारियाँ ढोते हैं। एक सुलतानपुरी रिक्शेवाले को उन्होंने दो–चार दाँव सिखाए तो वह रोने लगा। बोला, जान ले लो पर धरम न लो। हम इस काम के लिए सवारी न लादेंगे। हमने कहा कि भैया बन्द करो, गधे को दुलकी चलाकर घोड़ा न बनाओ।’’

  शिवपालगंज नज़दीक आ रहा था। उन्होंने रिक्शेवाले को सनद–जैसी देते हुए कहा, ‘‘तुम आदमी बहुत ठीक हो। सबको मुँह न लगाना चाहिए। तुम्हारा तरीक़ा पक्का है।’’ फिर वे कुछ सोचकर बोले, ‘‘पर तुम्हारी तन्दुरुस्ती कुछ ढीली–ढाली है। कुछ महीने डण्ड–बैठक लगा डालो। फिर देखो क्या होता है।’’

  ‘‘उससे क्या होगा ?’’ रिक्शावाले ने कहा, ‘‘मैं भी पहलवान हो जाऊँगा। पर अब पहलवानी में क्या रखा है ? लड़ाई में जब ऊपर से बम गिरता है तो नीचे बड़े–बड़े पहलवान ढेर हो जाते हैं। हाथ में तमंचा हो तो पहलवान हुए तो क्या, और न हुए तो क्या ?’’ कुछ रुककर रिक्शावाले ने इत्मीनान से कहा, ‘‘पहलवानी तो अब दिहात में ही चलती है ठाकुर साहब ! हमारे उधर तो अब छुरेबाज़ी का ज़ोर है।’’

  इतनी देर बाद बद्री पहलवान को अचानक अपमान की अनुभूति हुई। हाथ बढ़ाकर उन्होंने रिक्शावाले की बनियान चुटकी से पकड़कर खींची और कहा, ‘‘अबे, घण्टे–भर से यह ‘ठाकुर साहब’, ‘ठाकुर साहब’ क्या लगा रखा है ! जानता नहीं, मैं बाँभन हूँ !’’

  यह सुनकर रिक्शेवाला पहले तो चौंका, पर बाद में उसने सर्वोदयी भाव ग्रहण कर लिया। ‘‘कोई बात नहीं पण्डितजी, कोई बात नहीं।’’ कहकर वह सड़क के किनारे प्रकृति की शोभा निहारने लगा।

  रामाधीन का पूरा नाम बाबू रामाधीन भीखमखेड़वी था। भीखमखेड़ा शिवपालगंज से मिला हुआ एक गाँव था, जो अब ‘यूनानो–मिस्र–रोमाँ’ की तरह जहान से मिट चुका था। यानी वह मिटा नहीं था, सिर्फ़ शिवपालगंजवाले बेवकूफ़ी के मारे उसे मिटा हुआ समझते थे। भीखमखेड़ा आज भी कुछ झोंपड़ों में, माल–विभाग के कागज़ात में और बाबू रामाधीन की पुरानी शायरी में सुरक्षित था।

  बचपन में बाबू रामाधीन भीखमखेड़ा गाँव से निकलकर रेल की पटरी पकड़े हुए शहर तक पहुँचे थे, वहाँ से किसी भी ट्रेन में बैठने की योजना बनाकर वे बिना किसी योजना के कलकत्ते में पहुँच गए थे। कलकत्ते में उन्होंने पहले एक व्यापारी के यहाँ चिट्ठी ले जाने का काम किया, फिर माल ले जाने का, बाद में उन्होंने उसके साझे में कारोबार करना शुरू कर दिया। अन्त में वे पूरे कारोबार के मालिक हो गए।

  कारोबार अफ़ीम का था। कच्ची अफ़ीम पच्छिम से आती थी, उसे कई ढंगों से कलकत्ते में ही बड़े व्यापारियों के यहाँ पहुँचाने की आढ़त उनके हाथ में थी। वहाँ से देश के बाहर भेजने का काम भी वे हाथ में ले सकते थे, पर वे महत्त्वाकांक्षाी न थे, अपनी आढ़त का काम वे चुपचाप करते थे और बचे समय में पच्छिम के ज़िलों से आनेवाले लोगों की सोहबत कर लेते थे। वहाँ वे अपने क्षेत्र के आदमियों में काफ़ी मशहूर थे; लोग उनकी अशिक्षा की तारीफ़ करते थे और उनका नाम लेकर समझाने की कोशिश करते थे कि अकबर आदि अशिक्षित बादशाहों ने किस ख़ूबी से हुकूमत चलायी होगी।

  अफ़ीम के कारोबार में अच्छा पैसा आता था और दूसरे व्यापारियों से इसमें ज़्यादा स्पर्धा भी नहीं रखनी पड़ती थी। इस व्यापार में सिर्फ़ एक छोटी–सी यही खराबी थी कि यह क़ानून के ख़िलाफ़ पड़ता था। उसका ज़िक्र आने पर बाबू रामाधीन अपने दोस्तों में कहते थे, ‘‘इस बारे में मैं क्या कर सकता हूँ ? क़ानून मुझसे पूछकर तो बनाया नहीं गया था।’’

  जब बाबू रामाधीन अफ़ीम क़ानून के अन्तर्गत गिरफ़्तार होकर मजिस्ट्रेट के सामने पेश हुए तो वहाँ भी उन्होंने यही रवैया अपनाया। उन्होंने अंग्रेज़ी क़ानून की निन्दा करते हुए महात्मा गाँधी का हवाला दिया और यह बताने की कोशिश की कि विदेशी कानून मनमाने ढंग से बनाए गए हैं और हरएक छोटी–सी बात को ज़ुर्म का नाम दे दिया गया है। उन्होंने कहा, ‘‘जनाब, अफ़ीम एक पौधे से पैदा होती है। पौधा उगता है तो उसमें खूबसूरत–से सफ़ेद फूल निकलते हैं। अंग्रेज़ी में उसे पॉपी कहते हैं। उसी की एक दूसरी क़िस्म भी होती है जिसमें लाल फूल निकलते हैं। उसे साहब लोग बँगले पर लगाते हैं। उस फूल की एक तीसरी क़िस्म भी होती है जिसे डबुल पॉपी कहते हैं। हुजूर, ये सब फूल-पत्तों की बातें हैं, इनसे ज़ुर्म का क्या सरोकार ? उसी सफ़ेद फूलवाले पॉपी के पौधे से बाद में यह काली–काली चीज़ निकलती है। यह दवा के काम आती है। इसका कारोबार ज़ुर्म नहीं हो सकता। जिस क़ानून में यह ज़ुर्म बताया गया है, वह काला क़ानून है। वह हमें बरबाद करने के लिए बनाया गया है।’’

  इस लेक्चर के बावजूद बाबू रामाधीन को दो साल की सज़ा हो गई। पर सज़ा तो उस ज़माने में हो ही जाती थी, असली चीज़ सज़ा के पहले इजलास में दिया जानेवाला लेक्चर था। बाबू रामाधीन को मालूम था कि इस तरह लेक्चर देकर सैकड़ों लोग–क्रांतिकारियों से लेकर अहिंसावादियों तक–शहीद हो चुके हैं और उन्हें यक़ीन था कि इस लेक्चर से उन्हें भी शहीद बनने में आसानी होगी। पर सज़ा भुगतकर आने के बाद उन्हें पता चला कि शहीद होने के लिए उन्हें अफ़ीम का क़ानून नहीं, नमक-क़ानून तोड़ना चाहिए था। कुछ दिन कलकत्ते में घूम–फिरकर उन्होंने देख लिया कि वे बाज़ार में उखड़ चुके हैं, अफ़सोस में उन्होंने एकाध शेर कहे और इस बार टिकट लेकर वे अपने गाँव वापस लौट आए। आकर वे शिवपालगंज में बस गए।

  उन्होंने लोगों को इतना तक सच बता दिया कि उनकी आढ़त की दुकान बन्द हो गई है। इससे आगे बताने की ज़रूरत न थी। उन्होंने एक छोटा–सा कच्चा–पक्का मकान बनवा लिया, कुछ खेत लेकर किसानी शुरू कर दी, गाँव के लड़कों को कौड़ी की जगह ताश से जुआ खेलना सिखा दिया और दरवाज़े की चारपाई पर पड़े–पड़े कलकत्ता–प्रवास के किस्से सुनाने में दक्षता प्राप्त कर ली। तभी गाँव–पंचायतें बनीं और कलकत्ते की करामात के सहारे उन्होंने अपने एक चचेरे भाई को सभापति भी बनवा दिया। शुरू में लोगों को पता ही न था कि सभापति होता क्या है, इसलिए उनके भाई को इस पद के लिए चुनाव तक नहीं लड़ना पड़ा। कुछ दिनों बाद ही लोगों को पता चल गया कि गाँव में दो सभापति हैं जिनमें बाबू रामाधीन गाँव–सभा की ज़मीन का पट्टा देने के लिए हैं, और उनका चचेरा भाई, ज़रूरत पड़े तो ग़बन के मुक़दमे में जेल जाने के लिए है।

  बाबू रामाधीन का एक ज़माने तक गाँव में बड़ा दौर–दौरा रहा। उनके मकान के सामने एक छप्पर का बँगला पड़ा था जिसमें गाँव के नौजवान जुआ खेलते थे, एक ओर भंग की ताज़ी पत्ती घुटती थी। वातावरण बड़ा काव्यपूर्ण था। उन्होंने गाँव में पहली बार कैना, नैस्टर्शियम, लार्कस्पर आदि अंग्रेज़ी फूल लगाए थे। उनमें लाल रंग के कुछ फूल थे, जिनके बारे में वे कभी–कभी कहते थे, ‘‘यह पॉपी है और यह साला डबल पॉपी है।’’

  भीखमखेड़वी के नाम से ही प्रकट था कि वे शायर भी होंगे। अब तो वे नहीं थे, पर कलकत्ता के अच्छे दिनों में वे एकाध बार शायर हो गए थे।

  उर्दू कवियों की सबसे बड़ी विशेषता उनका मातृभूमि–प्रेम है। इसीलिए बम्बई और कलकत्ता में भी वे अपने गाँव या कस्बे का नाम अपने नाम के पीछे बाँधे रहते हैं और उसे खटखटा नहीं समझते। अपने को गोंडवी, सलोनवी और अमरोहवी कहकर वे कलकत्ता–बम्बई के कूप–मण्डूक लोगों को इशारे से समझाते हैं कि सारी दुनिया तुम्हारे शहर ही में सीमित नहीं है। जहाँ बम्बई है, वहाँ गोंडा भी है।

  एक प्रकार से यह बहुत अच्छी बात है, क्योंकि जन्मभूमि के प्रेम से ही देश–प्रेम पैदा होता है। जिसे अपने को बम्बई में ‘सँडीलवी’ कहते हुए शरम नहीं आती, वही कुरता–पायजामा पहनकर और मुँह में चार पान और चार लिटर थूक भरकर न्यूयार्क के फुटपाथों पर अपने देश की सभ्यता का झण्डा खड़ा कर सकता है। जो कलकत्ता में अपने को बाराबंकवी कहते हुए हिचकता है, वह यक़ीनन विलायत में अपने को हिन्दुस्तानी कहते हुए हिचकेगा।

  इसी सिद्धान्त के अनुसार रामाधीन कलकत्ता में अपने दोस्तों के बीच बाबू रामाधीन भीखमखेड़वी के नाम से मशहूर हो गए थे।

  यह सब दानिश टाँडवी की सोहबत में हुआ था। वे टाँडवी की देखादेखी उर्दू कविता में दिलचस्पी लेने लगे और चूँकि कविता में दिलचस्पी लेने की शुरुआत कविता लिखने से होती है, इसलिए दूसरों के देखते–देखते उन्होंने एक दिन एक शेर लिख डाला। जब उसे टाँडवी साहब ने सुना तो, जैसा कि एक शायर को दूसरे शायर के लिए कहना चाहिए, कहा, ‘‘अच्छा शेर कहा है।’’

 

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