Rag darbari, p.41

Rag Darbari, page 41

 

Rag Darbari
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  इन्हीं लड़कों के हाथ में आज हॉकी की स्टिकें और क्रिकेट के बल्ले मौजूद थे जिन्हें वे ऐसी बदगुमानी से पकड़े थे जैसे उनके हाथ में किसी ने राइफलें पकड़ा दी हों। लगभग पचास लड़के इसी तरह के सामान से लैस होकर कॉलिज के फाटक के आसपास घूम रहे थे।

  रंगनाथ ने उन्हें इस तरह सज़ा–बजा देखकर पूछा, ‘‘क्या मामला है ? क्या आज इन्स्पेक्टर का मुआइना भी होगा ?’’

  छोटे पहलवान ने जवाब देने की तैयारी की, यानी कमर से छूटती हुई लुंगी सँभाली और बोले, ‘‘इस पटापट में कौन मुआइना करेगा ? यह तो सालाना बैठक की तैयारी है।’’

  छोटे पहलवान भी कॉलिज की समिति के सदस्य थे। लड़कों ने उन्हें देखकर हर्ष–ध्वनि की। फाटक पर ही उनसे प्रिंसिपल साहब मिले और बोले, ‘‘आइए छोटेलालजी, आपका ही इन्तज़ार था।’’

  ‘‘आए हैं तो लौट थोड़े ही जाएँगे। चलिए न आगे–आगे।’’ छोटे पहलवान ने भलमनसाहत से कहा। बरसात में कुत्ता जब भीग जाता है तो एक खास क़िस्म से छींकता है। प्रिंसिपल साहब झेंपकर हँसे तो कुछ वैसी ही आवाज़ हुई। वे आगे–आगे चलने लगे। कहते रहे : ‘‘रामाधीन के गुट ने बड़ा ज़ोर लगाया है। बैजेगाँव के लालसाहब की मदद से कई आदमी अपनी ओर तोड़ लिये हैं। लालसाहब न जाने क्यों इस पचड़े में पड़ गए। शहर में रहते हैं, पर गाँव के हर मामले में टाँग अड़ाते हैं। रामाधीन के दिमाग़ बढ़ गए हैं। पता ही नहीं चलता कि कितने आदमी इधर हैं, कितने उधर।’’

  छोटे पहलवान इमारत के सामने बनी हुई फूलों की क्यारियों पर निगाह डालते रहे। जब प्रिंसिपल ने कहना शुरू किया था कि, ‘‘बैद महाराज भी कभी–कभी ऐसा काम कर बैठते हैं कि क्या बतायें ! क्या ज़रूरत थी इस चुनाव–उनाव की... ?’’ छोटे पहलवान ने एक कविता कही जो उन दिनों कीर्तन के रूप में काफ़ी प्रचलित थी ‘‘हमें क्या काम दुनिया से, मेरा श्रीकृष्ण प्यारा है।’’

  फाटक के अन्दर आते समय प्रिंसिपल ने रंगनाथ से भी कहा, ‘‘आप भी आइए रंगनाथ बाबू, आपके लिए कोई रोक–टोक नहीं है।’’

  उसने सिर हिलाकर बताया कि वह पीछे आ रहा है। पर वह अन्दर नहीं गया।

  धीरे–धीरे कॉलिज की सामान्य समिति के और मेम्बर भी कई ढंग से और कई रास्तों से आए। कोअॉपरेटिव यूनियन के एक डायरेक्टर पैदल होते हुए भी इतनी तेज़ी से आए और इतनी तेज़ी से अन्दर चले गए कि लोग उन्हें न देखकर एक–दूसरे का मुँह देखने लगे। कुछ मिनटों बाद कॉलिज के खेतों की फसल को रौंदते हुए ठेकेदार साहब दूसरी ओर से जाते हुए दिखायी दिए। जहाँ मज़दूर काम कर रहे थे, वहाँ रुककर उन्होंने किसी चीज़ को आसमान तक उठाकर ज़मीन पर पटकने का अभिनय किया और फिर अचानक अन्तर्धान हो गए। कुछ देर में बाबू गयादीन धीरे–धीरे चलते हुए कॉलिज के फाटक तक आए और पुलिया पर बैठ गए। उन्होंने उदासी के साथ लड़कों के हाथों में स्टिकों और बल्लों को देखा, फिर वे एक लड़के की हथेली में चिपके हुए गेंद को अपनी आँखों से मेस्मराइज़ करने लगे। प्रिंसिपल साहब फाटक पर बोले, ‘‘चलिए मेम्बर साहब, और सब लोग आ गए हैं।’’

  जैसे वे डकैती के जुर्म में गिरफ़्तार हों और उन्हें गवाहों के सामने शिनाख्त के लिए चलने को कहा गया हो, गिरी–गिरी तबीयत से बोले, ‘‘चलिए।’’ पेंगुइन चिड़िया की तरह टाँगें फैलाकर चलते हुए वे भी धीरे–धीरे कॉलिज की इमारत में अलक्षित हो गए।

  थोड़ी देर बाद सड़क पर एक घुड़सवार आता दिखायी दिया। वह बुर्राक़दार साफा बाँधे था और लगता था, बारहवीं सदी के इतिहास के किसी पन्ने से वह अभी–अभी फड़फड़ाता हुआ बाहर निकला है। लड़कों में से एक ने कहा, ‘‘अब कोई वैद्यजी का बाल भी नहीं उखाड़ सकता। ठाकुर बलरामसिंह आ गए।’’

  बलरामसिंह ने आते ही घोड़े की रास किसी भी लड़के के हाथ में पकड़ा दी। फिर वे अठारहवीं सदी के आदमी दिखने लगे। जैसे दक्खिन से बग़ावत की खबर देने के लिए कोई साँडनी–सवार आगरे के क़िले में दाख़िल हो रहा हो, उसी तेज़ी से वे कॉलिज की पुलिया तक आए और एक लड़के से पूछने लगे, ‘‘मारपीट तो नहीं हुई ?’’

  लड़के ने कहा, ‘‘कैसी मारपीट ? हम लोग तो प्रिंसिपल साहब के दल में हैं, अहिंसावादी हैं।’’

  बलरामसिंह ने मूँछों पर ताव दिया। मुस्कराते हुए बोले, ‘‘तुम लोग भी कम नहीं हो। हाथ में हॉकी–डण्डे लिये घूम रहे हो और महात्मा गाँधी की औलाद बने हो।’’

  लड़के ने कहा, ‘‘महात्मा गाँधी भी लाठी लेकर चलते थे, हम तो निहत्थे हैं। यह तो हॉकी की स्टिक है, इससे तो साला गेंद तक नहीं मरता। आदमी क्या मरेगा ?’’

  प्रिंसिपल साहब फिर बाहर आ गए थे। उन्होंने कहा, ‘‘चलिए मेम्बर साहब, अन्दर चलिए। कोरम हो गया है। मीटिंग शुरू होनेवाली है।’’

  बलरामसिंह ने साफे के छोर से पसीना पोंछा। कहने लगे, ‘‘किसी चेले से कह दीजिए, घोड़े को दाना–पानी पहुँचा दे। हमें अन्दर की मीटिंग से क्या लेना ! अपना कोरम तो यहीं बँधा है।’’

  प्रिंसिपल ने खुश होकर सिर हिलाया, बलरामिसंह ने कुरते की जेब को मुट्ठी में पकड़कर कहा, “ यक़ीन न हो तो इसे छूकर देख लीजिए। जेब तनी हुई है। यही सच्चा कोरम है।’’

  प्रिंसिपल ने बिना छुए हुए ही कहा, ‘‘समझ लीजिए कि छू लिया। भला आपकी बात खाली हो सकती है ?’’

  बलरामसिंह बोले, ‘‘असली विलायती चीज़ है, छ: गोलीवाली। देसी कारतूसी तमंचा नहीं कि एक बार फुट्ट से होकर रह जाय। ठाँय–ठाँय शुरू कर देगा तो रामाधीन गुट के छ: मेम्बर गौरैया की तरह लोट जाएँगे।’’

  ‘‘क्या कहने हैं आपके ! क्या कहने हैं !’’ प्रिंसिपल ने इस तरह कहा जैसे सच्ची कविता जिसका नाम है वही उन्हें बलरामसिंह के मुँह से सुनने को मिली हो। चलते–चलते बोले, ‘‘मैं अन्दर मीटिंग में चलता हूँ। बाहर की आप सँभालिएगा।’’ फिर प्रार्थनापूर्वक महात्मा विदुर की वाणी में बोले, ‘‘शान्ति से काम लीजिएगा।’’

  बलरामसिंह ने फिर मूँछों पर ताव दिया, ‘‘सब शान्ती ही है। यहाँ पचास–पचास शान्ती जाँघ के नीचे पड़ी हैं।’’

  प्रिंसिपल साहब चले गए। बलरामसिंह पुलिया पर बैठ गए। थोड़ी देर वे तम्बाकू की पीक पिचिर–पिचिर करके थूकते रहे, फिर पासवाले उस लड़के से, जिसने अपने को महात्मा गाँधी से बड़ा अहिंसावादी बताया था, बोले, ‘‘ज़रा बेटा, कॉलिज की पैकरमा करके देख आओ, हमारे आदमी ठीक से नाकाबन्दी किये हैं कि नहीं। और रमेसरा से कह देना कि साला किसी से भिड़ न जाय। जो समझाने से न माने उसे इधर फाटक पर भेज दे।’’

  लड़का उस ब्वाय–स्काउट की तरह, जिसकी कामयाबी पर किसी युद्ध में देश की विजय निर्भर हो, हालचाल लेने के लिए चल दिया। आसपास टहलनेवाले लड़कों की चहल–पहल बढ़ गई। बलरामसिंह ने कहा, ‘‘ज़रा और लम्बा चक्कर खींच लो, बेटा लोगो, और बेफिकर रहो। मैं यहाँ पुलिया पर जब तक मौजूद हूँ, दुश्मन नज़दीक न आएगा।’’

  दिन के तीन बज गए थे। सड़क पर ट्रकें और बैलगाड़ियाँ निकल रही थीं। बलरामसिंह पुलिया पर पाल्थी मारकर बैठ गए और स्वप्निल निगाहों से उन्हीं का आना–जाना देखते रहे। एक बार घोड़ा हिनहिनाया तो उन्होंने ललकारकर कहा, ‘‘शाबाश मेरे चेतक, सबर कर। वक़्त से दाना–पानी मिलेगा।’’ चेतक ने सबर कर लिया और इसके सबूत में धारावाहिक रूप से पानी गिराना शुरू कर दिया। कुछ लड़के उसके पास गोल दायरा बनाकर घोड़े पर इस कार्रवाई के पहले की और बाद की प्रतिक्रिया को देखते रहे और आपस में घनिष्ठ तरीके के मज़ाक करते रहे।

  अचानक एक ट्रक कॉलिज के सामने सड़क पर खड़ा हो गया। एक आदमी कुरता–धोती–टोपी और छड़ी से लैस–कूदकर नीचे उतरा और तेज़ी से कॉलिज की तरफ़ बढ़ा। लड़के ट्रक का रुकना देखते ही दूर–दूर से दौड़ते हुए पुलिया के पास आने लगे थे। बलरामसिंह ने उसे टोककर कहा, ‘‘पाँय लागी पंडित।’’

  आदमी होंठों ही में कुछ बुदबुदाया और फाटक की ओर बढ़ा। बलरामसिंह ने कहा, ‘‘पंडित, ज़रा धीरे चलो। तुम्हें कोई पिछुवाये नहीं है।’’

  पंडित झेंपकर हँसे। बोले, ‘‘मीटिंग शुरू हो गई न ?’’

  बलरामसिंह खड़े हो गए। धीरे से पंडित के पास आए। लड़के गोल बाँधकर नज़दीक आ गए थे। उन्होंने डपटकर कहा, ‘‘भाग जाओ, बेटा लोगो, दूर जाकर खाओ–खेलो।’’ फिर उस आदमी से सटकर बोले, ‘‘पंडित, मीटिंग में तुम्हारी हाज़िरी हो गई। अब लौट जाओ।’’

  पंडित ने कुछ कहना चाहा, तब तक वे उससे और सट गए और बोले, ‘‘कुछ समझकर कह रहा हूँ। लौट जाओ।’’

  पंडित को अपनी जाँघ में कुछ कड़ा–कड़ा–सा अड़ता हुआ जान पड़ा। उन्होंने बलरामसिंह के कुरते की जेब पर निगाह डाली। अचकचाकर वे दो कदम पीछे हट गए।

  विदाई देते हुए बलरामसिंह ने फिर कहा, ‘‘पंडित, पाँय लागी।’’

  वह आदमी चुपचाप वापस लौट पड़ा। सड़क पर कोई सवारी न थी। ट्रक चला गया था। वह तेज़ी से पैदल ही एक ओर को लपक गया। एक लड़के ने कहा, ‘‘गए।’’

  बलरामसिंह बोले, ‘‘पंडित बहुत समझदार हैं। समझ गए।’’

  ‘‘समझ तो गए, पर इस तरह भागने की क्या बात थी ?’’ एक विद्यार्थी ने सवाल किया।

  बलरामसिंह बोले, ‘‘अभी लौंडे हो बेटा ! ऐसे मौक़ों पर समझदार आदमी ऐसी ही चाल चलता है।’’

  एक विद्यार्थी घोड़े को दाना–पानी देने लगा था। घोड़ा फिर हिनहिनाया। बलरामसिंह ने इस बार डपट दिया, ‘‘चुप बे चेतक !’’

  ब्वाय–स्काउट लौट आया था। घोड़े से बात करने की लपेट ही में उन्होंने उससे पूछा, ‘‘क्यों बे, क्या ख़बर है ?’’

 

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