Rag darbari, p.94

Rag Darbari, page 94

 

Rag Darbari
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  रुप्पन मुँह लटकाकर बैठे हुए थे। वे भुनभुनाए, ‘‘मुझे तो लगता है दादा, सारे मुल्क में यह शिवपालगंज ही फैला हुआ है।’’

  प्रिंसिपल साहब को बड़ी विपत्तियाँ झेलनी पड़ीं। परसों डिप्टी डायरेक्टर ऑफ़ एजुकेशन जाँच करने आएँगे, डाकबँगले पर सारा इन्तज़ाम करवाना होगा। उन्होंने कॉलिज के क्लर्क को कुछ आदेश दिए। वे दरवाज़े पर खड़े–खड़े उसे आदेश देते रहे, वह कुर्सी पर बैठा हुआ कच्चे आम की ठण्डाई पीता रहा और पूरी बात सुनकर बोला, ‘‘ऐसे चिड़िमार रोज़ ही आया करते हैं। हम कहाँ तक उनके पीछे घूमें !’’ प्रिंसिपल साहब ने क्लर्क को दोस्ताना तौर पर बताया कि डिप्टी डायरेक्टर खुश होकर हमारा कोई फ़ायदा भले ही न करा पायें, बिगड़कर बहुत भारी नुकसान कर सकते हैं। इस विषय पर उन्होंने एक लघु वार्ता प्रसारित की, किन्तु क्लर्क पर इसका कोई प्रभाव न पड़ा। उसने चुपचाप ठण्डाई का गिलास खाली कर दिया, फिर तृप्तिपूर्वक एक भौंड़ी डकार ली जिसके पीछे बरसों की मुफ्तखोरी और बदहज़मी का हाथ था और कहा, ‘‘चाचा के होते हुए कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।’’

  चाचा, अर्थात् वैद्यजी। प्रिंसिपल समझ गए कि क्लर्क आज निकम्मापन झाड़ रहा है और उसे काम करने पर मजबूर किया गया तो बेंच पर लेट जाएगा और पेट के पुराने दर्द की शिकायत करने लगेगा। उस हालत में वह कल भी काम न करेगा। ‘‘उनका ही भरोसा है,’’ कहकर वैद्यजी की अनावश्यक चापलूसी करते हुए वे बाहर निकल आए। वहाँ उन्होंने अपने विश्वास के मास्टर को बुलाकर वही आदेश देने चाहे। पर पता चला, वह मास्टर एक लड़के के साथ शहर में सिनेमा देखने गया है। ‘‘अभी तक एक मालवीय ही थे, अब उन्होंने भी वही लाइन पकड़ ली है,’’ प्रिंसिपल ने ज़ोर से कहा। कल का प्रबन्ध किस आदमी को सौंपा जाय, यह सोचते–सोचते उन्होंने किसी अज्ञात व्यक्ति और किसी काल्पनिक परिस्थिति को अवधी में मनमानी गालियाँ सुनानी शुरू कर दीं। इस पर उनका चपरासी, खड़ाऊँदार पाँवों और चन्दन से लिपे–पुते मत्थे के साथ उन पर घृणा की निगाह डालता हुआ सामने से खटर–पटर के बवण्डर में निकल गया।

  जब वे वैद्यजी के घर की ओर जा रहे थे, मौसम के पहले आँधी–पानी ने उनका रास्ता रोका, उनकी आँखों में धूल भर गई। सड़क के किनारे पर तँबोली की दुकान का छप्पर उड़ा और उनके कन्धे को छूता हुआ सड़क पर ढेर हो गया। धूल–धक्कड़ में उनका पाँव गोबर के एक छोत पर पड़ गया जिससे उनकी चप्पल और टखने नाइट्रोजन के भण्डार में समा गए। प्रिंसिपल ने खन्ना मास्टर को गाली दी। फिर गरज और बिजली के साथ ओले पड़ने लगे। उन्होंने खन्ना मास्टर को दूसरी गाली दी और दो–तीन लोगों को धक्के देते, एक कुत्ते की दुम रौंदते हुए वे एक चाय की दुकान में घुस गए।

  आँधी–पानी और ओलों का तमाशा ख़त्म हो जाने के बाद वे धीरे–धीरे वैद्यजी के मकान की ओर चले। रास्ते में मिलनेवाले किसान यही चर्चा कर रहे थे कि खलिहान से जो फसल अभी घर नहीं आयी है वह चौपट हो जाएगी, पर उन्होंने इस पर विशेष ध्यान नहीं दिया। उनके पैर में गोबर लगा हुआ था और उनके लिए संसार की यह सबसे बड़ी दुर्घटना थी। सड़क पर जानेवाले प्रत्येक किसान को देखकर वे सोचते, अब यह मेरा पैर देखकर हँसेगा, पर किसी ने भी ऐसा नहीं किया। प्रिंसिपल साहब वैद्यजी के घर पर पहुँचे।

  बैठक का दरवाज़ा बन्द था। उन्होंने कुंडी खटखटाकर खोलने का इशारा दिया। उसे शायद धूल से बचने के लिए बन्द कर दिया गया था। दरवाज़ा खुलते ही तख़्त पर वैद्यजी, बद्री पहलवान, सनीचर और छोटे बैठे हुए नज़र आए। उन लोगों के चेहरे गम्भीर हो रहे थे। वैद्यजी ने इशारे से प्रिंसिपल साहब को अन्दर आने के लिए कहा। उन्होंने जवाब में अपनी चिरपरिचित, उत्साहपूर्ण भाषा में बताया कि एक लोटा पानी मँगवाइए, पैर धोकर ही अन्दर आना चाहता हूँ क्योंकि मेरा पैर गऊमाता की टट्टी में पड़ गया है। इस मज़ाक पर कोई भी नहीं हँसा। सनीचर ने उठकर उन्हें चुपचाप पानी का एक लोटा पकड़ा दिया। प्रिंसिपल साहब झेंप से दाँत निकालते हुए अन्दर आए और वैद्यजी के पैर छूकर उन्हीं के पास बैठ गए। बद्री पहलवान ने पूछा, ‘‘क्या रंग है प्रिंसिपल साहब ?’’

  ‘‘अपना रंग तो हमेशा ही चोखा है,’’ उन्होंने हिम्मत करके मज़ाक का दूसरा प्रयास किया, ‘‘अपने रंग बताइए। बारात में कब तक चलना होगा ?’’

  जवाब में बद्री पहलवान ने एक प्रश्न–भरी निगाह उनके मुँह पर डाली, जैसे वे बारात का मतलब न समझते हों। वैद्यजी ने कहा, ‘‘किसकी बारात, प्रिंसिपल साहब?’’

  ‘‘हमारे नए मैनेजिंग डायरेक्टर साहब की। गाँव में ही जाना है तो क्या हुआ, बारात तो बारात है। मैंने भी एक सिल्क का कुरता नपवा लिया है। दाम तो तुम्हारी ही जेब से वसूला जाएगा, क्यों मैनेजिंग डायरेक्टर साहब ?’’ प्रिंसिपल साहब ने बद्री पहलवान से हँसते हुए पूछा। इतनी देर खीझ और चिढ़ में रहकर वे अब फिर हल्के हो रहे थे।

  बद्री पहलवान छोटे से कोई और बात करने लगे, उन्होंने प्रिंसिपल की बात सुनना ज़रूरी नहीं समझा। वैद्यजी ने कहा, ‘‘बद्री का तो इस वर्ष विवाह हो नहीं रहा है। आप किसके विवाह की बात कर रहे हैं ?’’

  ‘‘क्यों ? गयादीनजी की...।’’

  वैद्यजी ने हाथ उठाकर, उनकी बात पूरी नहीं होने दी, कहा, ‘‘आप भी शत्रुओं के बहकावे में आ गए। बड़े खेद की बात है।’’

  प्रिंसिपल साहब ताज़्ज़偕ुब में पड़ गए। सारे गाँव में बद्री और बेला के ब्याह की चर्चा हो रही थी और...।

  ‘‘शत्रुओं ने गयादीनजी की कन्या को बदनाम करने के लिए ही ये अफवाहें उड़ायी थीं। आप स्वयं जानते हैं, बेला साक्षात् देवी है और बद्री सब प्रकार से निष्कलंक है। उस दिन शहर से आकर मैंने पूछताछ की तो पता चला, इसके पीछे भी शत्रुओं का कुचक्र है। मैंने कहा, कन्या के हित में अब यही अच्छा है कि इस प्रसंग को भुला दिया जाय। बेचारे गयादीनजी तो इस अपवाद से डरकर शहर भाग गए हैं। अपनी कन्या का विवाह वे वहीं पर किसी से कर रहे हैं।’’

  ‘‘धन्य है ! यह गाँव भी अद्भुत है।’’

  बद्री पहलवान उठकर बाहर चले गए थे। छोटे दूसरी ओर देखते हुए अपनी खुली हुई जाँघ पर दाहिना हाथ फेरने लगे थे। अपने गँवारपन को उजागर करने का उनके पास यही अचूक नुस्खा था। सनीचर ने प्रधान की हैसियत से अपनी ज़िम्मेदारी महसूस करते हुए कहा, ‘‘इस गाँव को मैं ही ठीक करूँगा। अभी मुझे प्रधान बने दिन ही कितने हुए हैं ?’’

  मेंढक को भी जुकाम होने लगा है, सोचकर छोटे ने फर्श पर पिच्च से थूक दिया। सब लोग कुछ देर चुप बैठे रहे। वैद्यजी ने फिर कहना शुरू किया, ‘‘किसी की कन्या के विषय में सोच–समझकर बोलना चाहिए। पता नहीं, किस शत्रु ने अफ़वाह उड़ा दी थी कि बद्री स्वयं गयादीन के घर से सम्बन्ध करना चाहते हैं...।’’

  छोटे ने अपनी जाँघ पर हाथ फेरना बन्द कर दिया। कहा, ‘‘मैं कुछ बोलूँगा तो बुरा मानोगे महराज।’’

  ‘‘तुम मूर्ख हो। तुम्हारी शोभा तभी तक है जब तक तुम कुछ बोलते नहीं।’’ वैद्यजी कड़े होकर बोले, ‘‘तुम्हीं लोगों ने लड़कपन में आकर मनमानी बातें फैलायी हैं और गयादीनजी को अपमानित किया है। अब शान्त हो जाओ। उनकी कन्या का सकुशल विवाह हो जाने दो। बस, अब यह बात समाप्त हुई। यह प्रसंग दुबारा न उठना चाहिए।’’ यह कहकर वे मसनद के सहारे लुढ़क गए, जैसे किसी मुगल बादशाह ने किसी गुलाम को देश–निकाला दे दिया और अब कोई बात न सुनना चाहता हो।

  बैठक की ख़ामोशी अस्वाभाविक हुई जा रही है। प्रिंसिपल ने, जो हमेशा जोश में रहते थे, सोचा, इस मौक़े पर कुछ मेरा भी कर्त्तव्य है। जैसे कुछ भी न हुआ हो, इस तरह अतीत की सारी घटनाओं पर कूँची फेरकर, वे सनीचर की ओर मुड़े और बोले, ‘‘और तुम्हारे क्या रंग हैं प्रधानजी ?’’

  ‘‘बदरंग हैं।’’ उसने कहा, ‘‘आपके आने के पहले वही तो बात हो रही थी। जोगनथवा कल शहर गया था। सुनते हैं वहाँ उसे पुलिस ने एक सौ नौ में बन्द कर दिया है। बेचारा स्टेशन पर दारू पिए हुए एक बेंच पर लेटा था...।’’

  सनीचर ने कहा–

  ‘‘एक पहाड़ा–जैसा लिखा गया है रिपोर्ट में। ख़बर मिलते ही बद्री भैया के साथ वहाँ आज मैं भी दौड़ा गया था। प्रधानी में यही झंझट है। दो दिन से दुकान खुलने की नौबत नहीं आयी।

  ‘‘बद्री भैया ने थाने पर पूछा तो उन्होंने बताया कि एक सौ नौ का पक्का केस है...

  (प्रिंसिपल ने सोचा : प्रधान हो जाने के बाद साला अंग्रेज़ी छाँट रहा है, ‘केस’ कहता है।)

  ‘‘...कहा कि यह एक खँडहर में छिपा था। इसके साथ दो–तीन आदमी भी थे। पुलिस की ललकार सुनकर वे भाग गए, यह पकड़ा गया। इसका नाम पूछा तो सही नाम नहीं बताया, कभी रामपरसाद बताया, कभी स्यामपरसाद। आखिर में कहा कि मेरा नाम जोगनाथ है। पूछा गया कि यहाँ क्या कर रहे हो तो आँय–साँय बकने लगा। अपने वहाँ होने की कोई वजह नहीं बतायी...।’’

  प्रिंसिपल साहब बोले, ‘‘और उसका वहाँ पर कोई जीविका का साधन नहीं नज़र आया। उसकी तलाशी ली गई तो उसके पास सेंद लगानेवाला एक लोहे का टुकड़ा मिला...।’’

  छोटे पहलवान इतनी देर बाद बोले, ‘‘एक टार्च भी निकली।’’

  सनीचर किलकारी मारकर हँसा। बोला, ‘‘तो समझ लो प्रिंसिपल साहब, जोगनाथ इसी पहाड़े में फँस गया है। आज छुट्टी का दिन था, इसलिए हम लोग लौट आए। कल फिर जाना पड़ेगा–ज़मानत का चक्कर। सोचता हूँ, जब रोज़–रोज़ यही करना है तो दुकान बन्द ही क्यों न कर दूँ।’’

 

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