Rag darbari, p.24

Rag Darbari, page 24

 

Rag Darbari
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  चपरासी गाढ़े का साफ़ कुरता और साफ़ धोती पहने हुए था। उसके पैरों में खड़ाऊँ और माथे पर तिलक था। उसने शान्तिपूर्वक कहा, ‘‘जा रहा हूँ। खन्ना को बुलाये लाता हूँ। इतना नाराज़ क्यों हो रहे हैं ?’’

  प्रिंसिपल साहब दाँत पीसते हुए तिरछी निगाहों से मेज़ पर रखे हुए टीन के एक टुकड़े को देखते रहे। इस पर पॉलिश करके एक लाल गुलाब का फूल बना दिया गया था। नीचे तारीख और महीना बताने के लिए कैलेण्डर लगाया गया था। इसे शराब बनाने की एक प्रसिद्ध फ़र्म ने पं. जवाहरलाल नेहरू की यादगार में बनवाया था और मुफ़्त में चारों दिशाओं में इस विश्वास के साथ भेजा था कि जहाँ यह कैलेण्डर जाएगा वहाँ की जनता पं. जवाहरलाल नेहरू के आदर्शों को और इस फर्म की शराब को कभी न भूलेगी। पर इस वक़्त कैलेण्डर का प्रिंसिपल साहब पर कोई असर नहीं हुआ। पं. नेहरू के लाल गुलाब ने उन्हें शान्ति नहीं दी; न फेनदार बियर की कल्पना ने उनकी आँखों को मूँदने के लिए मजबूर किया। वे दाँत पीस रहे थे और पीसते रहे। अचानक, जिस वक़्त चपरासी का खड़ाऊँ दरवाज़े की चौखट पार कर रहा था, उन्होंने कहा, ‘‘रामाधीन इन्हें वाइस-प्रिंसिपली दिलायेंगे ! टुच्चे कहीं के !’’

  चपरासी घूम पड़ा। दरवाज़े पर खड़े–खड़े बोला, ‘‘गाली दे रहे हो, प्रिंसिपल साहब ?’’

  उन्होंने कहा, ‘‘ठीक है, ठीक है, जाओ, अपना काम करो।’’

  ‘‘अपना काम तो कर ही रहा हूँ। आप कहें तो अब न करूँ।’’

  प्रिंसिपल माथे पर झुर्रियाँ डालकर दीवार पर टँगे एक दूसरे कैलेण्डर को देखने लगे थे। चपरासी ने उसी तरह पूछा, ‘‘कहें तो खन्ना पर निगाह रखना बन्द कर दूँ।’’

  प्रिंसिपल साहब चिढ़ गए। बोले, ‘‘भाड़ में जाओ।’’

  चपरासी उसी तरह सीना ताने खड़ा रहा। लापरवाही से बोला, ‘‘मुझे खन्ना–वन्ना न समझ लीजिएगा। काम चौबीस घण्टे करा लीजिए, वह मुझे बरदाश्त है, पर यह अबे–तबे, तू–तड़ाक मुझे बरदाश्त नहीं।’’

  प्रिंसिपल साहब उसकी ओर देखते रह गए। चपरासी ने कहा, ‘‘आप बाँभन हैं और मैं भी बाँभन हूँ। नमक से नमक नहीं खाया जाता। हाँ !’’

  प्रिंसिपल साहब ने ठण्डे सुरों में कहा, ‘‘तुम्हें धोखा हुआ है। मैं तुम्हें नहीं, खन्ना के लिए कह रहा था। टुच्चा है। रामाधीन से मिलकर मीटिंग करने का नोटिस भिजवाता है।’’ चपरासी को यक़ीन दिलाने के लिए कि यह गाली खन्ना को ही समर्पित है, उन्होंने फिर कहा, ‘‘टुच्चा !’’

  ‘‘अभी बुलाये लाता हूँ।’’ चपरासी की आवाज़ भी ठण्डी पड़ गई। प्रिंसिपल साहब खड़ाउँओं की धीमी पड़ती हुई ‘खट्–खट्’ सुनते रहे। उनकी निगाह एक तीसरे कैलेण्डर पर जाकर केन्द्रित हो गई जिसमें पाँच–पाँच साल के दो बच्चे बड़ी–बड़ी राइफलें लिये बर्फ़ पर लेटे थे और शायद चीनियों की फ़ौज का इन्तज़ार कर रहे थे और इस तरह बड़े कलात्मक ढंग से बता रहे थे कि फैक्टरी में जूट के थैले सबसे अच्छे बनते हैं।

  प्रिंसिपल साहब इस कैलेण्डर पर निगाह जमाकर बैठे हुए खन्ना का इन्तज़ार करते रहे और सोचते रहे कि इसे वाइस-प्रिंसिपली का शौक न चर्राया होता तो कितना अच्छा होता! वे भूल गए कि सबके अपने–अपने शौक हैं। रामाधीन भीखमखेड़वी को चिट्ठी के आरम्भ में उर्दू-कविता लिखने का शौक है; खुद उन्हें अपने दफ़्तर में रंग–बिरंगे कैलेण्डर लटकाने का शौक है, और चपरासी को, जो कि क्लर्क ही की तरह वैद्यजी का रिश्तेदार था, अकड़कर बात करने का शौक है।

  प्रिंसिपल साहब खन्ना का इन्तज़ार करते रहे। उधर होनेवाली घटना को ऐतिहासिक बनाने के लिए बाहर के बरामदे में क्लर्क साहब आकर खड़े हो गए। दीवार के पीछे और खिड़की के नीचे ड्रिल-मास्टर टाँग पसारकर खड़े–खड़े, पेशाब करने के बजाय बीड़ी पीने लगे। इस बात का ख़तरा नहीं रहा कि खन्ना और प्रिंसिपल साहब का संवाद जनता तक पहुँचने के पहले ही हवा में उड़ जाएगा।

  रात रंगनाथ और बद्री छत पर कमरे में लेटे थे और सोने के पहले की बेतरतीब बातें शुरू हो गई थीं। रंगनाथ ने अपनी बात ख़त्म करते हुए कहा, ‘‘पता नहीं चला कि प्रिंसिपल और खन्ना में क्या बात हुई। ड्रिल-मास्टर बाहर खड़ा था। खन्ना मास्टर ने चीख़कर कहा, ‘आपकी यही इन्सानियत है !’ ’’ वह सिर्फ़ इतना ही सुन पाया।

  बद्री ने जम्हाई लेते हुए कहा, “ प्रिंसिपल ने गाली दी होगी। उसी के जवाब में उसने इन्सानियत की बात कही होगी। यह खन्ना इसी तरह बात करता है। साला बाँगड़ू है।’’

  रंगनाथ ने कहा, ‘‘गाली का जवाब तो जूता है।’’

  बद्री ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। रंगनाथ ने फिर कहा, ‘‘मैं तो देख रहा हूँ, यहाँ इन्सानियत का ज़िक्र ही बेकार है।’’

  बद्री ने सोने के लिए करवट बदल ली। ‘गुड नाइट’ कहने की शैली में बोले, ‘‘सो तो ठीक है। पर यहाँ जो भी क–ख–ग–घ पढ़ लेता है, उर्दू भूँकने लगता है। बात–बात में इन्सानियत–इन्सानियत करता है ! कल्ले में जब बूता नहीं होता, तभी इन्सानियत के लिए जी हुड़कता है।’’

  बात ठीक थी। शिवपालगंज में इन दिनों इन्सानियत का बोलबाला था। लौण्डे दोपहर की घनी अमराइयों में जुआ खेलते थे। जीतनेवाले जीतते थे, हारनेवाले कहते थे, ‘यही तुम्हारी इन्सानियत है ? जीतते ही तुम्हारा पेशाब उतर आता है। टरकने का बहाना ढूँढ़ने लगते हो।’

  कभी–कभी जीतनेवाला भी इन्सानियत का प्रयोग करता था। वह कहता, ‘क्या इसी का नाम इन्सानियत है ? एक दाँव हारने में ही पिलपिला गए। यहाँ चार दिन बाद हमारा एक दाँव लगा तो उसी में हमारा पेशाब बन्द कर दोगे ?’

  ताड़ीघर में मज़दूर लोग सिर को दायें–बायें हिलाते रहते। 1962 में भारत को चीन के विश्वासघात से जितना सदमा पहुँचा था, उसी तरह के सदमे का दृश्य पेश करते हुए वे कहते, ‘बुधुवा ने पक्का मकान बनवा डाला। कारखानेवालों के ठाठ हैं। हमने कहा, पाहुन आए हैं। ताड़ी के लिए दो रुपये निकाल दो, तो उसने सीधे बात नहीं की, पिछल्ला दिखा के चला गया। बताओ नगेसर, क्या यही इन्सानियत है ?’

  यानी इन्सानियत का प्रयोग शिवपालगंज में उसी तरह चुस्ती और चालाकी का लक्षण माना जाता था जिस तरह राजनीति में नैतिकता का। यह दूसरी बात है कि बद्री पहलवान इसे कल्ले की कमज़ोरी समझते थे। यह सन्देश देकर और नैतिकता पर उसे लागू करने के लिए रंगनाथ को जागता छोड़कर वे बात–की–बात में सो गए।

  रंगनाथ कम्बल ओढ़े छत की ओर देखता हुआ लेटा रहा। दरवाज़ा खुला था और बाहर चाँदनी फैली थी। थोड़ी देर उसने सोफिया लारेन और एलिज़ाबेथ का ध्यान किया, पर कुछ क्षण बाद ही इसे चरित्रहीनता की अलामत मानकर वह अपने शहर के धोबी की लड़की के बारे में सोचने लगा जो धुलाई के कपड़ों से अपने लिए पोशाक निकालते वक़्त पिछले दिनों बिना बाँह के ब्लाउज़ों को ज़्यादा तरजीह देने लगी थी। कुछ देर में इस परिस्थिति को भी कुछ घटिया समझकर फ़िल्मी अभिनेत्रियों पर उसने दोबारा ध्यान लगाया और इस बार राष्ट्रीयता और देश–प्रेम के नाम पर लिज़ टेलर आदि को भुलाकर वहीदा रहमान और सायरा बानू का सहारा पकड़ा। दो–चार मिनट बाद ही वह इस नतीजे पर पहुँचने लगा कि हर बात में विलायत से प्रेरणा लेना ठीक नहीं है और ठीक से मन लग जाए तो देश–प्रेम में भी बड़ा मज़ा है। अचानक उसे नींद–सी आने लगी और बहुत कोशिश करने पर भी सायरा बानू के समूचे जिस्म के सामने उसके ध्यान का रक़बा छोटा पड़ने लगा। उसमें कुछ शेर और भालू छलाँगें लगाने लगे। उसने एक बार पूरी कोशिश से सायरा बानू को धड़ से पकड़कर घसीटना चाहा, पर वह हाथ से बाहर फिसल गई और उसी सौदे में शेर और भालू भी बाहर निकल गए। तभी उसके दिमाग में खन्ना मास्टर की बनती–बिगड़ती हुई तस्वीर दो–एक बार लुपलुपायी और एक शब्द गूँजने लगा, ‘इन्सानियत !’ ‘इन्सानियत !’

  पहले लगा, कोई यह शब्द फुसफुसा रहा है। फिर जान पड़ा, इसे कोई मंच पर बड़ी गम्भीर आवाज़ में पुकार रहा है। उसके बाद ही ऐसा जान पड़ा, कहीं दंगा हो रहा है और चारों ओर से लोग चीख़ रहे हैं, ‘इन्सानियत ! इन्सानियत ! इन्सानियत !!!’

  वह जाग पड़ा और जागते ही शोर सुनायी दिया, ‘‘चोर ! चोर ! चोर ! जाने न पाए ! पकड़ लो ! चोर ! चोर ! चोर !’’

  एकाध क्षणों के बाद पूरी बात ‘चोर ! चोर ! चोर !’ पर आकर टूट रही थी, जैसे ग्रामोफोन की सुई रिकॉर्ड में इसी नुक्ते पर फँस गई हो। उसने देखा, शोर गाँव में दूसरी तरफ़ हो रहा था। बद्री पहलवान चारपाई से कूदकर पहले ही नीचे खड़े हो गए हैं। वह भी उठ बैठा। बद्री ने कहा, ‘‘छोटे कहता ही था। चोरों का एक गिरोह आसपास घूम रहा है। लगता है, गाँव में भी आ गए।’’

  दोनों जल्दी-जल्दी कपड़े पहनकर बाहर आए। कपड़े पहनने का अर्थ यही नहीं कि बद्री ने चूड़ीदार पैजामा और शेरवानी पहनी हो। नंगे बदन पर ढीली पड़ी हुई तहमद उन्होंने कमर के चारों ओर कस ली और एक चादर ओढ़ लिया। बस, कपड़े पहनने की क्रिया पूरी हो गई। रंगनाथ परमहंसों की इस गति तक नहीं पहुँच पाया था। उसने कमीज़ डाल ली। दरवाज़े तक पहुँचते–पहुँचते उसके क़दम और भी तेज़ हो गए। तब तक चारों ओर से ‘चोर ! चोर ! चोर !’ के नारे उठने लगे थे। शोर हाथों–हाथ इतना बढ़ गया कि अंग्रेज़ों ने अगर उसे 1921 में सुन लिया होता तो हिन्दुस्तान छोड़कर वे तभी अपने देश भाग गए होते।

  दोनों ज़ीने से उतरकर नीचे आए। बैठक से बाहर निकलते–निकलते बद्री पहलवान ने रंगनाथ से कहा, ‘‘तुम यहीं दरवाज़ा बन्द करके घर पर बैठो। मैं बाहर जाकर देखता हूँ।’’

  उधर रुप्पन बाबू घर के अन्दर से धोती का छोर कन्धे पर लपेटते हुए सड़फड़– सड़फड़ वहीं पहुँच गए और बोले, ‘‘आप दोनों घर पर रहें। मैं बाहर जाता हूँ।’’

 

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