Rag darbari, p.20

Rag Darbari, page 20

 

Rag Darbari
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  रंगनाथ ने पुकारकर कहा, ‘‘लंगड़ हो क्या ?’’

  वह कुछ आगे निकल गया था। आवाज़ सुनकर वह वहीं रुक गया और पीछे मुड़कर देखते हुए बोला, ‘‘हाँ बापू, लंगड़ ही हूँ।’’

  ‘‘मिल गई नक़ल ?’’

  रंगनाथ के इस सवाल का जवाब सनीचर ने दिया, “नक़ल नहीं, इन्हें मिलेगा सिकहर*। उसी में एक टाँग लटकाकर झूला करेंगे।’’

  लंगड़ पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। वहीं से उसने पुकारकर कहा, “ नक़ल तो नहीं मिली बापू, आज नोटिस–बोर्ड पर ऐतराज़ छपा है।’’

  ‘‘क्या हुआ ? फिर से फ़ीस कम पड़ गई क्या ?’’

  “ फ़ीस नहीं बापू,’’ वह अपनी बात को सुनाने के लिए चिल्ला रहा था, ‘‘इस बार मुक़दमे के पते में कुछ गलती है। प्रार्थी के दस्तख़त ग़लत खाने में हैं। तारीख़ के ऊपर दो अंक एक में मिल गए हैं। एक जगह कुछ कटा है, उस पर दस्तख़त नहीं हैं। बहुत ग़लती निकाली गई है।’’

  रंगनाथ ने कहा, ‘‘वे दफ़्तरवाले बड़े शरारती हैं। कैसी–कैसी ग़लतियाँ निकालते हैं !’’

  जैसे गाँधीजी अपनी प्रार्थना–सभा में समझा रहे हों कि हमें अंग्रेज़ों से घृणा न करनी चाहिए, उसी वज़ह पर लंगड़ ने सिर हिलाकर कहा, ‘‘नहीं बापू, दफ़्तरवाले तो अपना काम करते हैं। सारी गड़बड़ी अर्ज़ीनवीस ने की है। विद्या का लोप हो रहा है। नये–नये अर्ज़ीनवीस ग़लत-फ़लत लिख देते हैं।’’

  रंगनाथ ने मन में इतना तो मंजूर कर लिया कि विद्या का लोप हो रहा है, पर लंगड़ के बताए हुए कारण से वह सहमत नहीं हो सका। वह कुछ कहने जा रहा था, तब तक लंगड़ ने ज़ोर से कहा, ‘‘कोई बात नहीं बापू, कल दरख़्वास्त ठीक हो जाएगी।’’

  वह खट्–खट्–खट् करता चला गया। सनीचर ने कहा, ‘‘जाने किस–किस देश के बाँगड़ू शिवपालगंज में इकट्ठा हो रहे हैं।’’

  रंगनाथ ने उसे समझाया, ‘‘सब जगह ऐसा ही है। दिल्ली का भी यही हाल है।’’

  वह सनीचर को दिल्ली के किस्से सुनाने लगा। जैसे भारतीयों की बुद्धि अंग्रेज़ी की खिड़की से झाँककर संसार का हालचाल देती है, वैसे ही सनीचर की बुद्धि रंगनाथ की खिड़की से झाँकती हुई दिल्ली के हालचाल लेने लगी। दोनों कुछ देर उसी में अटके रहे।

  अँधेरा हो चला था, पर अभी हालत ऐसी नहीं थी कि आँख के सामने खड़े हुए आदमी और जानवर में तमीज़ न की जा सके। वैद्यजी की बैठक में एक लालटेन लटका दी गई। सामने रास्ते से तीन नौजवान ज़ोर–ज़ोर से ठहाके लगाते हुए निकले। उनकी बातचीत किसी एक ऐसी घटना के बारे में होती रही जिसमें ‘दोपहर,’ ‘फण्टूश,’ ‘चकाचक,’ ‘ताश’ और ‘पैसे’ का ज़िक्र उसी बहुतायत से हुआ जो प्लानिंग कमीशन के अहलकारों में ‘इवैल्युएशन,’ ‘कोआर्डिनेशन,’ ‘डवटेलिंग’ या साहित्यकारों में ‘परिप्रेक्ष्य,’ ‘आयाम,’ ‘युगबोध,’ सन्दर्भ’ आदि कहने में पायी जाती है। कुछ कहते–कहते तीनों नौजवान बैठक से आगे जाकर खड़े हो गए। सनीचर ने कहा, ‘‘बद्री भैया इन जानवरों को कुश्ती लड़ना सिखाते हैं। समझ लो, बाघ के हाथ में बन्दूक दे रहे हैं। वैसे ही सालों के मारे लोगों का रास्ता चलना मुश्किल है। दाँव–पेंच सीख गए तो गाँव छोड़ देना होगा।’’

  अचानक नौजवानों ने एक विशेष प्रकार का ठहाका लगाया।

  सब वर्गों की हँसी और ठहाके अलग–अलग होते हैं। कॉफ़ी-हाउस में बैठे हुए साहित्यकारों का ठहाका कई जगहों से निकलता है, वह किसी के पेट की गहराई से निकलता है, किसी के गले, किसी के मुँह से और उनमें से एकाध ऐसे भी रह जाते हैं जो सिर्फ़ सोचते हैं कि ठहाका लगाया क्यों गया है। डिनर के बाद कॉफ़ी पीते हुए, छके हुए अफ़सरों का ठहाका दूसरी ही क़िस्म का होता है। वह ज़्यादातर पेट की बड़ी ही अन्दरूनी गहराई से निकलता है। उस ठहाके के घनत्व का उनकी साधारण हँसी के साथ वही अनुपात बैठता है जो उनकी आमदनी का उनकी तनख्वाह से होता है। राजनीतिज्ञों का ठहाका सिर्फ़ मुँह के खोखल से निकलता है और उसके दो ही आयाम होते हैं, उसमें प्राय: गहराई नहीं होती। व्यापारियों का ठहाका होता ही नहीं है और अगर होता भी है तो ऐसे सूक्ष्म और सांकेतिक रूप में, कि पता लग जाता है, ये इनकम–टैक्स के डर से अपने ठहाके का स्टॉक बाहर नहीं निकालना चाहते। इन नौजवानों ने जो ठहाका लगाया था, वह सबसे अलग था। यह शोहदों का ठहाका था, जो आदमी के गले से निकलता है, पर जान पड़ता है, मुर्ग़ों, गीदड़ों और घोड़ों के गले से निकला है।

  ठहाका सुनते ही सनीचर ने अधिकार–भरी आवाज़़ में कहा, ‘‘यहाँ खड़े–खड़े क्या उखाड़ रहे हो ? जाओ, रास्ता नापो।’’

  नौजवान अपनी हँसी के पॉकेट बुक–संस्करण प्रकाशित करते हुए अपना रास्ता नापने लगे। तब तक अँधेरे से एक औरत छम–छम करती हुई निकली और लालटेन की धीमी रोशनी में लपलपाती हुई परछाईं छोड़ती दूसरी ओर निकल गई। वह बड़बड़ाती जा रही थी, जिसका तात्पर्य था कि कल के छोकरे जो उसके सामने नंगे–नंगे घूमा करते थे, आज उससे इश्कबाज़ी करने चले हैं। सारे मुहल्ले को यह समाचार देकर कि लड़के उसे छेड़ते हैं और वह अब भी छेड़ने लायक है, वह औरत वहीं अँधेरे में ग़ायब हो गई। सनीचर ने रंगनाथ से कहा, ‘‘न जाने वह काना इस कुतिया को कहाँ से घसीट लाया है ! जब निकलती है, तो कोई–न–कोई इसे छेड़ ही देता है।’’

  ‘काना’ से पं. राधेलाल का अभिप्राय था। उनकी एक आँख दूसरी से छोटी थी और इसी से गँजहे उनको काना कहने लगे थे।

  यह हमारी प्राचीन परम्परा है, वैसे तो हमारी हर बात प्राचीन परम्परा है, कि लोग बाहर जाते हैं और ज़रा–ज़रा–सी बात पर शादी कर बैठते हैं। अर्जुन के साथ चित्रांगदा आदि को लेकर यही हुआ था। यही भारतवर्ष के प्रवर्त्तक भरत के पिता दुष्यन्त के साथ हुआ था, यही ट्रिनिडाड और टोबैगो, बरमा और बैंकाक जानेवालों के साथ होता था, यही अमरीका और यूरोप जानेवालों के साथ हो रहा है और यही पण्डित राधेलाल के साथ हुआ। अर्थात् अपने मुहल्ले में रहते हुए जो बिरादरी के एक इंच भी बाहर जाकर शादी करने की कल्पना–मात्र से बेहोश हो जाते हैं वे भी अपने क्षेत्र से बाहर निकलते ही शादी के मामले में शेर हो जाते हैं। अपने मुहल्ले में देवदास पार्वती से शादी नहीं कर सका और एक समूची पीढ़ी को कई वर्षों तक रोने का मसाला दे गया था। उसे विलायत भेज दिया जाता तो वह निश्चय ही बिना हिचक किसी गोरी औरत से शादी कर लेता। बाहर निकलते ही हम लोग प्राय: पहला काम यह करते हैं कि किसी से शादी कर डालते हैं और फिर सोचना शुरू करते हैं कि हम यहाँ क्या करने आए थे। तो पं. राधेलाल ने भी, सुना जाता है, एक बार पूरब जाकर कुछ करना चाहा था, पर एक महीने में ही वे इस ‘कुतिया’ से शादी करके शिवपालगंज वापस लौट आए।

  किसी पूर्वी ज़िले की एक शकर–मिल में एक बार पं. राधेलाल को नौकरी मिलने की सम्भावना नज़र आयी। नौकरी चौकीदारी की थी। वे वहाँ जाकर एक दूसरे चौकीदार के साथ रुक गए। तब पं. राधेलाल की शादी नहीं हुई थी और उनके जीवन की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि औरत के हाथ का खाना नहीं मिलता। उनके साथी चौकीदार की बीवी ने कुछ दिनों के लिए इस समस्या को सुलझा दिया। वहाँ रहते हुए वह उसका बनाया हुआ खाना खाने लगे। और जैसी कि एक जगत्-प्रसिद्ध कहावत है, स्त्री पेट के रास्ते आदमी के हृदय पर क़ब्जा करती है, उसने पं. राधेलाल के पेट में सुरंग लगा दी और हृदय की ओर बढ़ने लगी। उन्हें उसका बनाया हुआ खाना कुछ ऐसा पसन्द आया और वह खुद अपनी बनायी हुई सुरंग में इस तरह फँस गई कि महीने–भर के भीतर ही वे उसे अपना खाना बनाने के लिए शिवपालगंज ले आए। चलते–चलते उसके घर से ही उन्होंने साल–दो साल के लिए खाने का इन्तज़ाम भी साथ में ले लिया। इस घटना के बाद मिल के क्षेत्र में लोगों ने सोचा कि पं. राधेलाल का साथी चौकीदार उल्लू है। शिवपालगंज में गँजहों ने सोचा कि राधेलाल मर्द का बच्चा है। अब तक उस क्षेत्र में पं. राधेलाल की प्रतिष्ठा ‘कभी न उखड़नेवाले गवाह’ के रूप में थी, अब वे ‘कभी न चूकनेवाले मर्द’ के रूप में भी विख्यात हो गए।

  वैसे, ‘कभी न उखड़नेवाले गवाह’ की ख्याति ही पं. राधेलाल की जीविका का साधन थी। वे निरक्षरता और साक्षरता की सीमा पर रहते थे और ज़रूरत पड़ने पर अदालतों में ‘दस्तख़त कर लेता हूँ,’ ‘मैं पढ़ा–लिखा नहीं हूँ’ इनमें से कोई भी बयान दे सकते थे। पर दीवानी और फ़ौजदारी क़ानूनों का उन्हें इतना ज्ञान सहज रूप में मिल गया था कि वे किसी भी मुक़दमे में गवाह की हैसियत से बयान दे सकते थे और जिरह में अब तक उन्हें कोई भी वकील उखाड़ नहीं पाया था। जिस तरह कोई भी जज अपने सामने के किसी भी मुक़दमे का फ़ैसला दे सकता है, कोई भी वकील किसी भी मुक़दमे की वकालत कर सकता है, वैसे ही पं. राधेलाल किसी भी मामले के चश्मदीद गवाह बन सकते थे। संक्षेप में, मुक़दमेबाज़ी की ज़ंजीर में वे भी जज, वकील, पेशकार आदि की तरह एक अनिवार्य कड़ी थे और जिस अंग्रेज़ी क़ानून की मोटर पर चढ़कर हम बड़े गौरव के साथ ‘रूल ऑफ़ लॉ’ की घोषणा करते हुए निकलते हैं, उसके पहियों में वे टाइराड की तरह बँधे हुए उसे मनमाने ढंग से मोड़ते चलते थे। एक बार इजलास में खड़े होकर जैसे ही वे शपथ लेते, ‘गंगा–कसम भगवान–कसम, सच–सच कहेंगे,’ वैसे ही विरोधी पक्ष से लेकर मजिस्ट्रेट तक समझ जाते कि अब यह सच नहीं बोल सकता। पर ऐसा समझना बिलकुल बेकार था, क्योंकि फ़ैसला समझ से नहीं क़ानून से होता है और पं. राधेलाल की बात समझने में चाहे जैसी लगे, क़ानून पर खरी उतरती थी।

  पं. राधेलाल की जो भी प्रतिष्ठा रही हो, उनकी प्रेयसी की स्थिति बिलकुल साफ़ थी। वह भागकर आयी थी, इसलिए कुतिया थी। लोग उससे मज़ाक कर सकते थे और हमेशा यह समझकर चल सकते थे कि उसे मज़ाक अच्छा लगता है। यह शिवपालगंज के नौजवानों का सौभाग्य था कि कुतिया ने भी उनको निराश नहीं किया। उसे सचमुच ही मज़ाक अच्छा लगता था और इसी से मज़ाक होने पर छूटते ही गाली देती थी, जो कि गँजहों में आत्माभिव्यक्ति का बड़ा जनप्रिय तरीक़ा माना जाता था।

 

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