Rag darbari, p.76

Rag Darbari, page 76

 

Rag Darbari
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  लड़ाई का यह अन्तिम दृश्य था। बद्री पहलवान ने व्यंग्यपूर्वक अपने पिता से कहा, ‘‘सुना ?’’

  रुप्पन बाबू झपटकर बाहर चले गए। वैद्यजी चारपाई के पास चुपचाप खड़े रहे। ऐसे मौक़े पर फ़िल्मी हीरो के बाप की तरह रँभाकर रोए नहीं। अपने भ्रष्टाचार की शिकायत पर कमीशन बैठाए जाने की सूचना पाकर किसी बड़े नेता की तरह उन्होंने यह वक्तव्य नहीं दिया कि पहले भ्रष्टाचार की एक सर्वमान्य परिभाषा निश्चित होनी चाहिए। अपनी रचनाओं की खराब आलोचना पढ़कर टेक्स्ट–बुक–कमिटी की कृपा से लखपती बननेवाले किसी साहित्यकार की तरह वे अवज्ञा की हँसी नहीं हँसे। अपने आचरण के विरुद्ध इतनी बड़ी चुनौती सुनकर उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया। वे चुपचाप खड़े रहे। उनके पेशे में जो सबसे आसान काम था उन्होंने वह तक नहीं किया; अपने मुँह से उन्होंने ‘हे राम’ तक नहीं निकाला !

  दोपहर ढल रही थी। एक हलवाई की दुकान पर एक हलवाई बैठा था जो दूर से ही हलवाई–सा जान पड़ता था। दुकान के नीचे एक नेता खड़ा था जो दूर से ही नेता–जैसा दिखता था, वहीं साइकिल का हैंडिल पकड़े एक पुलिस का सिपाही खड़ा था जो दूर से ही पुलिस का सिपाही दिखता था। दुकान पर रखी हुई मिठाइयाँ बासी और मिलावट के माल से बनी जान पड़ती थीं और थीं भी, दूध पानीदार और अरारूट के असर से गाढ़ा दिख रहा था, और था भी। पृथ्वी पर स्वर्ग का यह एक ऐसा कोना था जहाँ सारी सचाई निगाह के सामने थी। न कहीं कुछ छिपा था, न छिपाने की ज़रूरत थी।

  दुकान पर जलेबी, पेड़े और गट्टे रखे थे। उन्हीं की बगल में शीशे के छोटे–छोटे कण्टेनरों में कुछ रूखे–सूखे लकड़ी के टुकड़े–से पड़े थे जो बिस्कुट, केक और मस्क इत्यादि की परम्परा में बने हुए स्थानीय पदार्थ थे। जैसे शहर में, वैसे यहाँ पर भी, ये पदार्थ बता रहे थे कि पूरब पूरब है और पश्चिम पश्चिम है और दोनों मिठाइयों की मार्फत शिवपालगंज में मिलते हैं।

  वहीं रुप्पन बाबू और लंगड़ भी मिले।

  रुप्पन बाबू लंगड़ को कुछ उसी तरह से देखते थे जैसे पहले दर्जे में सफ़र करनेवाला तीसरे दर्ज़े के किसी ऐसे मुसाफ़िर को देखता है जिस पर बिना टिकट चलने का शुबहा किया जा रहा हो। पर आज रुप्पन बाबू उदासी के उस आलम में थे जिसमें विश्वमैत्री आदि पंचशील के सभी सिद्धान्तों को आसानी से अमल में लाया जा सकता है। इसलिए उन्होंने गिरी आवाज़ में पूछा, ‘‘क्या हो रहा है जी तुम्हारे मामले में ?’’

  ‘‘आज तो छुट्टी है, बापू ! पता नहीं चल पाया। वैसे नकल तो अब बन ही गई होगी।’’ लंगड़ ने पिछले दिनों की प्रगति बतानी शुरू की, ‘‘बन तो तभी गई थी, पर मैं लेने नहीं जा पाया। मुझे मियादी बुखार आ गया था। उस दिन सदर की कचहरी में गिरा तो फिर उठ नहीं पाया। फिर सोचा, मरना है तो अपने गाँव ही में मरें। उधर के ही एक ठाकुर वहाँ आए थे। अपने साथ लिये गए। वहाँ लोगों ने बताया कि मियादी बुखार है।

  ‘‘पर एक दिन गाँव में कई लोग मोटर पर आए। गाँव–भर की दीवालों पर गेरू से न जाने क्या–क्या अंग्रेज़ी में लिख गए। उसके बाद बापू, उन्होंने हमारा खून निकाला और मशीन में डालकर देखा। अब देखो तो बापू, कैसा अचम्भा है इस कलजुग का कि आदमी तो हम देसी और हमें बीमारी लग गई बिलायती। मोटर पर जो आए थे, वे बोले कि लंगड़ बड़ा आदमी है, उसे मलेरिया हुआ है।

  ‘‘क्या बतायें बापू, उसी के बाद मोटरवालों ने गाँव में बड़ा काम किया। दो–तीन लोग एक–एक मशीन लेकर चाराें तरफ़ कुआँ–ताल, गड़हा–गड़ही, सभी पर किर्र-किर्र करते हुए घूमे। दो आदमी बराबर हर घर के आगे जा–जाकर गेरू से मलेरिया महारानी की इस्तुति अंग्रेज़ी में लिख गए। उन अच्छरों का प्रताप, बापू, कि सारे मच्छर भाग गए। हम भी, बापू, महीना–भर दुख भोगकर आपका दर्शन करने को फिर से उठकर खड़े हो गए।’’

  नेता बोला, ‘‘क्या बात सुनायी है, लँगड़ऊ, तुमने–कि :

  लिखे देख अँगरेज़ी अच्छर

  भागे मलेरिया के मच्छर।’’

  हलवाई ने नेता की तारीफ़ सुनायी, ‘‘क्या कवित्त सुनाया है आपने भी ! जलेबी खाइए इसी बात पर।’’

  नेता ने बिना तकल्लुफ मक्खियाँ उड़ाकर चार–पाँच जलेबियाँ थाल से निकाल लीं और खाना शुरू कर दिया। उधर सिपाही लंगड़ से बोला, ‘‘तो कहो कि मरते–मरते बचे।’’

  ‘‘यह तो ठीक है बापू, पर मैं जानता था कि मैं मरूँगा नहीं। भगवान के दरबार में ऐसा अन्धेर नहीं हो सकता। जब तक मुझे तहसील से नकल नहीं मिल जाती, मैं मर नहीं सकता।’’

  लंगड़ की आवाज़ में न जाने कितने कबीर, तुलसी, रैदास आकर सुर भरने लगे। वह बोला, ‘‘बिना नकल देखे मेरी जान नहीं निकल सकती। मैं सत्ता की लड़ाई लड़ रहा हूँ।’’

  सिपाही बोला, ‘‘तुम साले बाँगड़ू हो। दो रुपये के पीछे ज़िन्दगी बरबाद किये हो। ठोंक क्यों नहीं देते हो दो रुपये ?’’

  लंगड़ सिर हिलाकर बोला, ‘‘तुम यह बात न समझोगे बापू, यह सत्ता की लड़ाई है।’’

  रुप्पन बाबू ने बात बदलकर पूछा, ‘‘तो अब हो क्या रहा है ?’’

  लंगड़ ने कहा, ‘‘कल–परसों तक मिल ही जाएगी। अभी से जाकर तहसील के आगे पड़ूँगा।’’

  नेता ने कहा, ‘‘वहीं अपनी झोंपड़ी डाल लो। दौड़–धूप बच जाएगी।’’

  रुप्पन बाबू बेंच पर बैठ हुए थोड़ी देर पैरों की पिण्डलियाँ झटकते रहे। फिर हलवाई से बोले, ‘‘एक कुल्हड़ दूध निकालो।’’ कुछ सोचकर बोले, ‘‘एक कुल्हड़ लंगड़ को भी दो।’’

  लंगड़ के साथ दूध पीकर रुप्पन बाबू जैसे ही उठने को हुए, नेता ने कहा, ‘‘तो कैसा रहेगा लँगड़ऊ ? वहीं तहसील के आगे झोंपड़ी डलवायी जाय ?’’

  लंगड़ ने वैष्णवजनवाली शैली में हँसकर प्रकट किया कि नेता बेवकूफ़ है और वह स्वयं विनम्र है।

  नेता ने कहा, ‘‘कुछ दिनों में भूख–हड़ताल शुरू कर देना। अच्छा रहेगा। अखबार में नाम छपेगा। नकल मिले या मिले, नाम हो जाएगा। सोच लो लँगड़ऊ।’’

  लंगड़ इस बार जैसी हँसी हँसा वह सिर्फ़ वैष्णवजन की न थी। उस पर कबीर– स्कूल, वर्धा–स्कूल और सेवापुरी–स्कूल की छाप तो थी ही, कुछ लखनऊ–स्कूल का असर था, जिसका इसके सिवा कोई जवाब नहीं होता कि आप भी दाँत खोलकर ‘हें–हें–हें’ करने की कोशिश करें। नेता ने ऐसा ही किया। साथ ही उसने ताली बजाकर कहा, ‘‘अरे, वाह रे लँगड़ऊ !’’

  रुप्पन बाबू जिस मनोदशा में थे उसमें उन्हें नेता का यह मज़ाक बुरा लगा। अचानक उन्हें अहसास हुआ कि वह आदमी ‘लँगड़ऊ’ कहकर लंगड़ का मज़ाक उड़ा रहा है। और हम लोग भी उसे लंगड़ कहते हैं, वह क्या है ? उसका असली नाम क्या है ?

  यह सोचते ही सोचने के बाँध के फाटक सरक गए। रुप्पन बाबू को अचानक कई नाम याद आ गए। लँगड़े को वहाँ लंगड़ कहा जाता था, एक अन्धा उनके दरवाजे़ आया करता था और लोग उसे ‘सूरे’ कहते थे। जिसके कान कुश्ती लड़ते–लड़ते टूट गए हों उसका शुभनाम ‘टुट्‌टे’ था। वैद्यजी के मरीज़ों में एक काना आदमी था। जिसे देखते ही वे पूछते थे, ‘‘कहो शुक्राचार्य, तुम्हारे क्या समाचार हैं ?’’ एक बुड्ढ़ा था जिसे ‘बहरे बाबा’ कहकर इज़्ज़त दी जाती थी। जिसके मुँह पर चेचक के दाग थे उसे शिवपालगंज में छत्ताप्रसाद कहा जाता था और इशारा मधुमक्खियों के छत्ते की ओर था। छाँगुरराम तो छ: उँगलीवाले होंगे ही।

  अपंगों और अंगहीनों के लिए यही परम्परागत प्रेम है–यह बात रुप्पन बाबू ने इस भाषा में सोची : यह अगर दोबारा इसे लँगड़ऊ कहेगा तो जूतों से बात करूँगा। उसी जोश में उन्होंने बिगड़कर कहा, ‘‘ए ऐंचातानापरशाद, तुम इन्हें लँगड़ऊ क्यों कहते हो ?’’

  नेता की आँखें कुछ ऐसी थीं कि :

  उधर देखती हैं, इधर देखती हैं,

  न जाने किधर से, किधर देखती हैं।

  एक तरह से ऐंचातानापरशाद का नाम भी हमारी उस सांस्कृतिक परम्परा के–जिसमें गणेश को गजानन और इन्द्र को सहस्राक्ष कहकर उनके आरम्भिक जीवन की दुर्घटनाओं की ओर इशारा किया जाता है–अनुकूल था। रुप्पन बाबू ने सोचा था कि ऐंचातानापरशाद कहे जाने पर नेता बिलकुल उखड़ जाएगा, पर उस पर इस विशेषण का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, क्योंकि जिसे रुप्पन बाबू ने यहाँ ऐंचातानापरशाद कहा था उसे अपने गाँव में सिर्फ़ ऐंचाताना के नाम से पुकारते थे। नेता रुप्पन बाबू से ‘परशाद’ का प्रसाद पाकर वैसे ही कृतार्थ हो गया जैसे दिन–भर धूल–धक्कड़, गाली–गलौज सुनने के बाद अदालत के सामने हाज़िर होनेवाला भोंदू नामक मुलज़िम ‘श्री भोंदू’ की पुकार सुनकर कृतार्थ होता है।

  नेता ने रुप्पन बाबू से कहा, ‘‘तो इनको और क्या कहें ? लँगड़े हैं, इसलिए लंगड़ कहते हैं।’’

  रुप्पन बाबू ने, जैसाकि दूध पीनेवाले दूध की प्रत्येक दुकान पर करते हैं, खाली कुल्हड़ सामने सड़क पर फेंक दिया। करोड़ों मक्खियाँ उस पर लालायित होकर झपटीं, पर उनके पास रुप्पन बाबू को धन्यवाद देने के लिए उपयुक्त शब्द न थे। दो मुसाफ़िर जिनके पैरों के पास गिरकर कुल्हड़ फूटा था, उछलकर सड़क के किनारे पहुँच गए, पर गालियाँ देने या ऐतराज करने की उनमें हिम्मत न थी। रुप्पन बाबू ने इस सब पर ध्यान नहीं दिया। वे ऐंचातानापरशाद से बोले, ‘‘किसी को बुरा नाम लेकर चिढ़ाना न चाहिए। उसका असली नाम लेना चाहिए।’’

  नेता ने लंगड़ की ओर मुँह करके पूछा, ‘‘तुम्हारा असली नाम क्या है ?’’

  ‘‘अब तो सब लंगड़ ही कहकर पुकारते हैं, बापू’’ उसने सोचकर जवाब दिया, ‘‘वैसे माँ–बाप का दिया हुआ असली नाम लंगड़परशाद है।’’

 

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