Rag darbari, p.35

Rag Darbari, page 35

 

Rag Darbari
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  सनीचर को भी प्रधान बनना था। अत: वह भी मन्दिर के बीचोंबीच घुटने मोड़कर किसी तरह बैठ गया और ‘जगदम्बिके’, ‘जगदम्बिके’, का नारा लगाने लगा। मंडप में मेले की ज़बरदस्त भीड़ थी और कोई किसी की बात सुन नहीं रहा था, पर वह गँजहा ही कैसा, जो कहीं पहुँचते ही वहाँ के रहनेवालों पर अपने बाँगड़ूपन की धाक न बैठा दे। लोग सनीचर से कुछ हटकर खड़े हो गए। उधर रुप्पन बाबू ने भी आँखें मूँद लीं और धड़ाक् से कोई वरदान माँगकर आँखों को एकदम से खोल दिया। उसके बाद उन्होंने वहाँ से मेला देखने की शुरुआत कर दी। उनके पास ही एक लड़की किसी मूर्ति के आगे झुकी हुई कुछ बुदबुदा रही थी। रुप्पन बाबू ने मान लिया कि असली मेला यही है।

  रंगनाथ हाथ जोड़कर सीधे मुख्य प्रतिमा के पास पहुँचा। उसने उसे देखा और फिर देखता ही रह गया।

  प्राचीन मूर्ति-कला के बारे में उसने जो कुछ पढ़ा था, उसे बिलकुल निरर्थक जान पड़ा। उसने सोचा, अगर यही देवी की मूर्ति है, तो अब तक उसने जो मूर्तियाँ खजुराहो में, भुवनेश्वर में या एलौरा के कैलास–मन्दिर में देखी थीं, वे क्या थीं ?

  एक बार आँख मूँदकर उसने ताक़त से अपना सब पढ़ा हुआ भूल जाने की कोशिश की। मन–ही–मन वह चीखने लगा, ‘बचाओ, बचाओ, मेरी भक्ति पर तर्क का हमला हो रहा है। बचाओ !’ पर उसने जब आँखें खोलीं तो उसे लगा कि उसकी भक्ति ग़ायब हो गई है और इतिहास की तोता–रटंत पढ़ाई उसे झकझोर रही है।

  बात यह थी कि इस मूर्ति की बनावट कुछ नये ढंग की थी। उसके सिर पर सिपाहियों का–सा शिरस्त्राण था, गर्दन के नीचे चौड़ा और सपाट सीना था। सीने के नीचे का हिस्सा ग़ायब था। जो लोग भक्ति की निगाह से नहीं, बल्कि अंग्रेज़ी इतिहास– लेखकों की किताबों के सहारे इस मन्दिर में आए हुए हों, वे केवल यह वक्तव्य दे सकते थे कि ‘‘इस मूर्ति के जितने अंश को मैं देख पाता हूँ, उससे मुझे यह प्रमाणित करने में संकोच नहीं कि यह लगभग बारहवीं शताब्दी के किसी सिपाही की मूर्ति है।’’

  अपने यहाँ की मूर्ति-कला पर और चाहे जो कुछ कहा जाए, उसके विरुद्ध कोई यह नहीं कह सकता कि हमारे देश की मूर्तियों में लिंग–भेद का कोई घपला है। छोटे–छोटे बाल कटाए हुए, कमीज़–पैंट पहनकर ‘गोल्फ़’ के मैदान में घूमनेवाली नारियों के बारे में हमें भले ही लिंग–सम्बन्धी धोखा हो जाए, पर यहाँ प्राचीन नारी-मूर्तियों को लेकर ऐसा होना सम्भव नहीं। पुरातत्त्व के विद्यार्थियों को गले के नीचे ही दो ऊँचे–ऊँचे पहाड़ देखने की आदत पड़ जाती है। कुछ और नीचे जाते ही पहाड़ पलटकर दूसरी ओर पहुँच जाते हैं। यह सब समझने की दिव्य दृष्टि पुरातत्त्व के भोंदू–से–भोंदू विद्यार्थी को भी मिल जाती है। फिर वह बौद्ध विहारों को गोपुरम् और गोपुरम् को स्तूप समझने की ग़लती भले ही कर बैठे, नारी-मूर्ति को पुरुष-मूर्ति मानने की भूल नहीं कर सकता।

  रंगनाथ ने पुजारी से पूछा, ‘‘यह किस देवता की मूर्ति है ?’’

  पुजारी बहुत व्यस्त था। चिल्लाकर बोला, ‘‘कुछ जेब में से निकालकर पूजन चढ़ाओ, तब अपने–आप जान जाओगे कि कौन देवता हैं।’’

  रंगनाथ ने जिज्ञासा से आगे बढ़कर मूर्ति का गला छुआ, पुजारी ने उसे शंका के साथ देखा, फिर पढ़े–लिखे आदमी की तरह कहा, “ मूर्ति को छूने की सख़्त मुमानियत है।’’

  लड़की दर्शन करके बाहर चली गई थी। रुप्पन बाबू की समझ में मेला खत्म हो गया था। उन्होंने रंगनाथ का हाथ खींचकर कहा, ‘‘दर्शन तो हो गए, अब चलो, चला जाय।’’

  इतिहास सबसे बड़ा मूर्तिभंजक है। वही अब रंगनाथ के सिर पर चढ़कर बोला, ‘‘दर्शन क्या होंगे ? यह देवी की मूर्ति ही नहीं है।’’

  सुनते ही तीनों गँजहे रंगनाथ के पास सिमट आए। दो–चार लोग चौंककर उसकी ओर देखने लगे। तब किसी अजायबघर के असिस्टेण्ट क्यूरेटर की तरह रंगनाथ ने रुप्पन बाबू को समझाया, ‘‘देखते नहीं ! यह सरासर किसी सिपाही की मूर्ति है। यह देखो, यह है शिरस्त्राण, और यह देखो, यह है पीछे की तरफ़ से निकला हुआ तरकस। और यह देखो, बिलकुल सपाट...’’

  रंगनाथ सिपाही के वीरतापूर्ण वक्ष:स्थल का वर्णन पूरा नहीं कर पाया। उसके पहले ही पुजारी ने उछलकर उसे धक्का दिया और वह बिना किसी प्रयास के तीर की तरह भीड़ को चीरता हुआ, दरवाज़े के पास जाकर अटक गया।

  उधर पुजारी पूजा कराने और पैसे बटोरने के कारोबार को रोककर पूरी तबीयत से रंगनाथ को गालियाँ देने लगा। उसका मुँह छोटा था, पर बड़ी–बड़ी गालियाँ एक–दूसरे को लाँघती हुई बहुत टूटी–फूटी हालत में बाहर आकर गिरने लगीं। थोड़ी देर में मन्दिर के अन्दर गालियाँ–ही–गालियाँ हो गईं, क्योंकि भक्तों ने भी पुजारी की ओर से गालियों का उत्पादन शुरू कर दिया था।

  गँजहे बिलकुल भौंचक्के होकर मन्दिर के बाहर आ गए। पुजारी दरवाज़े पर आकर चीखने लगा था, ‘‘मैं तो सूरत देखकर ही पहचान गया था। ईसाई है। विलायतियों की औलाद। ज़रा–सी गिटपिट–गिटपिट सीख ली, और कहने लगा कि यह देवी ही नहीं हैं। चार दिन बाद कहना कि हमारे बाप हमारे बाप ही नहीं हैं।’’

  सनीचर और जोगनाथ पूरी घटना समझ नहीं पाए थे। फिर भी वे हाथ–पैर हिला– हिलाकर शोर मचाने लगे। तब तक रुप्पन बाबू में उनकी व्यवहार–बुद्धि लौट आयी। उन्होंने रंगनाथ का हाथ पकड़कर कहा, ‘‘चलो दादा।’’ फिर पुजारी की ओर देखकर ऊँची पर ठण्डी आवाज़ में कहने लगे, ‘‘देखो महाराज, मेले–ठेले के दिन ज़्यादा दम न लगाया करो। तुम्हारी उमर भी ढलने लगी है, गाँजा दिमाग पर चढ़ जाता है।’’

  पुजारी ने फिटफिटाकर कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि उन्होंने फिर कहा, ‘‘बस, बस, बस, बहुत ज़्यादा पैंतरा न दिखाओ। हम लोग शिवपालगंज के रहनेवाले हैं। ज़बान को अपनी बाँबी में बन्द रखो।’’

  कुछ दूर चलने पर रंगनाथ ने कहा, ‘‘ग़लती मेरी ही थी। मुझे कुछ कहना नहीं चाहिए था।’’

  रुप्पन बाबू ने सान्त्वना दी, ‘‘बात तो ठीक ही है। पर कसूर तुम्हारा भी नहीं, तुम्हारी पढ़ाई का है।’’

  सनीचर ने भी कहा, ‘‘पढ़कर आदमी पढ़े–लिखे लोगों की तरह बोलने लगता है। बात करने का असली ढंग भूल जाता है। क्यों न जोगनाथ ?’’

  जोगनाथ ने जवाब नहीं दिया, क्योंकि वह तब तक भीड़ के रेले में घुसकर नौजवान लड़कियों को धक्का देने में व्यस्त हो गया था और उसके चेहरे से लगता था कि वह इस काम में व्यस्त ही रहना चाहता है।

  सनीचर भी अब मेलेवाली चाल पर आ गया था। वह लम्बे–लम्बे डगों से मिठाई की उस दुकान की ओर चला जिधर छोटे पहलवान थे। उसने सैकड़ों बुड्ढों को दायें–बायें फेंका, कई औरतों के कन्धों पर प्रेम से हाथ रखा, उनकी छातियों के आकार–प्रकार का हाल–चाल लिया और यह सब ऐसी निस्संगता से किया जैसे भीड़ से निकलने के लिए ऐसा करना धर्म में लिखा हो। यह करने के लिए इस दुबले–पतले इन्सान में अचानक इतनी फुर्ती आ गई कि टॉनिक बनानेवाली कोई भी अमरीकी कम्पनी उसे ‘पेप्’ का विज्ञापन मानकर उसे पिंजड़े समेत खरीद सकती थी; यह दूसरी बात है कि अभी उसे बन्द करने के लिए पिंजड़ा बनवाया नहीं गया था।

  रंगनाथ बहुत नाराज़ हो रहा था। एक बार जब सनीचर का हाथ किसी नौजवान लड़की के गाल की ओर बढ़ रहा था, उसने उसे बीच में ही मरोड़ दिया और कहा, ‘‘यह क्या बदतमीज़ी है !’’

  सनीचर ने आँखें फैलाकर कहा, ‘‘बदतमीज़ी नहीं है गुरू, मेला है।’’ फिर अचानक विनम्र बनकर दाँत निकालते हुए बोला, ‘‘गुरू, देहाती मेले का मामला। यहाँ तो बस यही हेरा–फेरी का चमत्कार है गुरू।’’

  प्लैनिंग कमीशनवाले किसी समस्या को फुसलाने के लिए कोई नया अंग्रेज़ी फ़िकरा इस्तेमाल करके भी इतने खुश न होते होंगे जितना सनीचर ‘चमत्कार’ को मुँह से निकालकर हुआ। उसने मन–ही–मन तय किया कि प्रधान बनकर वह इस शब्द का प्रयोग दिन में कम–से–कम तीन बार नियमपूर्वक किया करेगा।

  मिठाई और चाट की दुकानों के आगे काफ़ी भीड़ थी। भारतीय मिठाइयों की सौन्दर्य-सम्राज्ञी बर्फ़ी ढेर–की–ढेर लगी थी और हर लड़का जानता था कि मारपीट में इसका इस्तेमाल पत्थर के टुकड़े–जैसा किया जा सकता है। इन मिठाइयों के बनाने में हलवाइयों और फूड–इंस्पेक्टरों को बड़े–बड़े वैज्ञानिक अनुसन्धान करने पड़े थे, उन्होंने बड़े परिश्रम से मालूम किया था कि खोये की जगह घुइयाँ, आलू–चावल का आटा, मिट्टी या गोबर तक का प्रयोग किया जा सकता है। वे सब समन्वयवाद के अनुयायी थे और उन्होंने क़सम खा ली थी कि वे बिना मिलावट के न तो कोई चीज़ बनायेंगे और न बेचेंगे।

  एक दुकान के किनारे छोटे पहलवान दिखायी दिए। वे भीड़ से कुछ पीछे हटकर एक मोढ़े पर बैठे थे और एक दोने से आलू के टुकड़े नीम की सींक से उठा–उठाकर खा रहे थे। सनीचर और जोगनाथ रुप्पन बाबू से अलग होकर छोटे के पास पहुँच गए। सनीचर ने कहा, ‘‘गुरू, हुकुम हो तो एकाध बर्फ़ी भी खा लूँ।’’

  छोटे सनीचर को देख करुणापूर्वक मुस्कराए। वरदान देनेवाली अदा से बोले, ‘‘खा ले पट्ठे। जोगनाथ को भी खिला दे।’’

  रंगनाथ का मन धूल, मक्खी और इसी तरह खाद्य पदार्थों को, जो मिठाई और चाट का वज़न बढ़ा रहे थे, देखकर उखड़ गया था। वह रुप्पन से बोला, ‘‘तुम खाओगे कुछ ?’’

  उन्होंने बेरुख़ी से कहा, ‘‘मुझे खाकर क्या करना है ?’’ कहकर उन्होंने भीड़ का सिंहावलोकन किया। कुछ दूरी पर उन्हें सिंह साहब दिखायी दिए, जो उन्हें रास्ते में पहले साइकिल पर मिल चुके थे और जिनके सिर पर जड़ा हुआ सोला हैट इस समय उन्हें सैनिटरी इन्स्पेक्टर ही नहीं, पुलिस के हाकिमों का भी रुतबा दे रहा था। सिंह साहब को कई लोग घेरे हुए थे। रुप्पन ने कहा, ‘‘जब तक ये भुखमरे मिठाई पर जुटे हैं, तब तक चलो, हम इस खड्‌डूस का हालचाल ले लें।’’

 

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