Rag darbari, p.6

Rag Darbari, page 6

 

Rag Darbari
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  वह लड़का अब खड़ा होकर रोने लगा। एक दूसरे लड़के ने कहा, ‘‘यह मास्टर मोतीराम का क्लास है।’’

  फिर प्रिंसिपल को बताने की ज़रूरत नहीं पड़ी कि मास्टर साहब कहाँ गए। क्लर्क ने कहा, “ सिकण्डहैण्ड मशीन चौबीस घण्टे की निगरानी माँगती है। कितनी बार मास्टर मोतीराम से कहा कि बेच दो इस आटाचक्की को, पर कुछ समझते ही नहीं हैं। मैं खुद एक बार डेढ़ हज़ार रुपया देने को तैयार था।’’

  प्रिंसिपल साहब ने क्लर्क से कहा, ‘‘छोड़ो इस बात को ! उधर के दर्ज़े से मालवीय को बुला लाओ।’’

  क्लर्क ने एक लड़के से कहा, ‘‘जाओ, उधर के दर्ज़े से मालवीय को बुला लाओ।’’

  थोड़ी देर में एक भला–सा दिखनेवाला नौजवान आता हुआ नज़र आया। प्रिंसिपल साहब ने उसे दूर से देखते ही चिल्लाकर कहा, ‘‘भाई मालवीय, यह क्लास भी देख लेना।’’

  मालवीय नज़दीक आकर छप्पर का एक बाँस पकड़कर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘एक ही पीरियड में दो क्लास कैसे ले सकूँगा ?’’

  रोनेवाला लड़का रो रहा था। क्लास के पीछे कुछ लड़के ज़ोर–ज़ोर से हँस रहे थे। बाकी इन लोगों के पास कुछ इस तरह भीड़ की शक्ल में खड़े हो गए थे जैसे चौराहे पर ऐक्सिडेंट हो गया हो।

  प्रिंसिपल साहब ने आवाज़ तेज़ करके कहा, ‘‘ज़्यादा कानून न छाँटो। जब से तुम खन्ना के साथ उठने–बैठने लगे हो, तुम्हें हर काम में दिक़्क़त मालूम होती है।’’

  मालवीय प्रिंसिपल साहब का मुँह देखता रह गया। क्लर्क ने कहा, ‘‘सरकारी बसवाला हिसाब लगाओ मालवीय। एक बस बिगड़ जाती है तो सब सवारियाँ पीछे आनेवाली दूसरी बस में बैठा दी जाती हैं। इन लड़कों को भी वैसे ही अपने दर्ज़े में ले जाकर बैठा लो।’’

  उसने बहुत मीठी आवाज़ में कहा, ‘‘पर यह तो नवाँ दर्ज़ा है। मैं वहाँ सातवें को पढ़ा रहा हूँ।’’

  प्रिंसिपल साहब की गरदन मुड़ गई। समझनेवाले समझ गए कि अब उनके हाथ हाफ़ पैंट की जेबों में चले जाएँगे और वे चीखेंगे। वही हुआ। वे बोले, ‘‘मैं सब समझता हूँ। तुम भी खन्ना की तरह बहस करने लगे हो। मैं सातवें और नवें का फ़र्क़ समझता हूँ। हमका अब प्रिंसिपली करै न सिखाव भैया। जौनु हुकुम है, तौनु चुप्पे कैरी आउट करौ। समझ्यो कि नाहीं ?’’

  प्रिंसिपल साहब पास के ही गाँव के रहनेवाले थे। दूर–दूर के इलाक़ों में वे अपने दो गुणों के लिए विख्यात थे। एक तो ख़र्च का फ़र्ज़ी नक्शा बनाकर कॉलिज के लिए ज़्यादा–से–ज़्यादा सरकारी पैसा खींचने के लिए, दूसरे गुस्से की चरम दशा में स्थानीय अवधी बोली का इस्तेमाल करने के लिए। जब वे फ़र्ज़ी नक्शा बनाते थे तो बड़ा–से–बड़ा अॉडीटर भी उसमें क़लम न लगा सकता था; जब वे अवधी बोलने लगते थे तो बड़ा–से– बड़ा तर्कशास्त्री भी उनकी बात का जवाब न दे सकता था।

  मालवीय सिर झुकाकर वापस चला गया। प्रिंसिपल साहब ने फटे पायजामेवाले लड़के की पीठ पर एक बेंत झाड़कर कहा, ‘‘जाओ। उसी दर्ज़े में जाकर सब लोग चुपचाप बैठो। ज़रा भी साँस ली तो खाल खींच लूँगा।’’

  लड़कों के चले जाने पर क्लर्क ने मुस्कराकर कहा, ‘‘चलिए, अब खन्ना मास्टर का भी नज़ारा देख लें।’’

  खन्ना मास्टर का असली नाम खन्ना था। वैसे ही, जैसे तिलक, पटेल, गाँधी, नेहरू आदि हमारे यहाँ जाति के नहीं, बल्कि व्यक्ति के नाम हैं। इस देश में जाति–प्रथा को खत्म करने की यही एक सीधी–सी तरकीब है। जाति से उसका नाम छीनकर उसे किसी आदमी का नाम बना देने से जाति के पास और कुछ नहीं रह जाता। वह अपने–आप ख़त्म हो जाती है।

  खन्ना मास्टर इतिहास के लेक्चरार थे, पर इस वक़्त इंटरमीजिएट के एक दर्ज़े में अंग्रेज़ी पढ़ा रहे थे। वे दाँत पीसकर कह रहे थे, ‘‘हिन्दी में तो बड़ी–बड़ी प्रेम–कहानियाँ लिखा करते हो पर अंग्रेज़ी में कोई जवाब देते हुए मुँह घोड़े–जैसा लटक जाता है !’’

  एक लड़का दर्ज़े में सिर लटकाए खड़ा था। वैसे तो घी–दूध की कमी और खेल–कूद की तंगी से हर औसत विद्यार्थी मरियल घोड़े–जैसा दिखता है, पर इस लड़के के मुँह की बनावट कुछ ऐसी थी कि बात इसी पर चिपककर रह गई थी। दर्ज़े के लड़के ज़ोर से हँसे। खन्ना मास्टर ने अंग्रेज़ी में पूछा, ‘‘बोलो, ‘मेटाफ़र’ का क्या अर्थ है ?’’

  लड़का वैसे ही खड़ा रहा। कुछ दिन पहले इस देश में यह शोर मचा था कि अपढ़ आदमी बिना सींग–पूँछ का जानवर होता है। उस हल्ले में अपढ़ आदमियों के बहुत–से लड़कों ने देहात में हल और कुदालें छोड़ दीं और स्कूलों पर हमला बोल दिया। हज़ारों की तादाद में आए हुए ये लड़के स्कूलों, कॉलिजों, यूनिवर्सिटियों को बुरी तरह से घेरे हुए थे। शिक्षा के मैदान में भभ्भड़ मचा हुआ था। अब कोई यह प्रचार करता हुआ नहीं दीख पड़ता था कि अपढ़ आदमी जानवर की तरह है। बल्कि दबी ज़बान से यह कहा जाने लगा था कि ऊँची तालीम उन्हीं को लेनी चाहिए जो उसके लायक हों, इसके लिए ‘स्क्रीनिंग’ होनी चाहिए। इस तरह से घुमा–फिराकर इन देहाती लड़कों को फिर से हल की मूठ पकड़ाकर खेत में छोड़ देने की राय दी जा रही थी। पर हर साल फेल होकर, दर्ज़े में सब तरह की डाँट–फटकार झेलकर और खेती की महिमा पर नेताओं के निर्झरपंथी व्याख्यान सुनकर भी वे लड़के हल और कुदाल की दुनिया में वापस जाने को तैयार न थे। वे कनखजूरे की तरह स्कूल से चिपके हुए थे और किसी भी कीमत पर उससे चिपके रहना चाहते थे।

  घोड़े के मुँहवाला यह लड़का भी इसी भीड़ का एक अंग था; दर्ज़े में उसे घुमा– फिराकर रोज़–रोज़ बताया जाता था कि जाओ बेटा, जाकर अपनी भैंस दुहो और बैलों की पूँछ उमेठो; शेली और कीट्स तुम्हारे लिए नहीं हैं। पर बेटा अपने बाप से कई शताब्दी आगे निकल चुका था और इन इशारों को समझने के लिए तैयार नहीं था। उसका बाप आज भी अपने बैलों के लिए बारहवीं शताब्दी में प्रचलित गँडासे से चारा काटता था। उस वक़्त लड़का एक मटमैली किताब में अपना घोड़े–जैसा मुँह छिपाकर बीसवीं शताब्दी के कलकत्ते की रंगीन रातों पर गौर करता रहता था। इस हालत में वह कोई परिवर्तन झेलने को तैयार न था। इसलिए वह मेटाफ़र का मतलब नहीं बता सकता था और न अपने मुँह की बनावट पर बहस करना चाहता था।

  कॉलिज के हर औसत विद्यार्थी की तरह यह लड़का भी पोशाक के मामले में बेतकल्लुफ़ था। इस वक्त वह नंगे पाँव, एक ऐसे धारीदार कपड़े का मैला पायजामा पहने हुए खड़ा था जिसे शहरवाले प्राय: स्लीपिंग सूट के लिए इस्तेमाल करते हैं। वह गहरे कत्थई रंग की मोटी कमीज़ पहने था जिसके बटन टूटे थे। सिर पर रूखे और कड़े बाल थे। चेहरा बिना धुला हुआ और आँखें गिचपिची थीं। देखते ही लगता था, वह किसी प्रोपेगैंडा के चक्कर में फँसकर कॉलिज की ओर भाग आया है।

  लड़के ने पिछले साल किसी सस्ती पत्रिका से एक प्रेम–कथा नकल करके अपने नाम से कॉलिज की पत्रिका में छपा दी थी। खन्ना मास्टर उसकी इसी ख्याति पर कीचड़ उछाल रहे थे। उन्होंने आवाज़ बदलकर कहा, ‘‘कहानीकारजी, कुछ बोलिए तो, मेटाफ़र क्या चीज़ होती है ?’

  लड़के ने अपनी जाँघें खुजलानी शुरू कर दीं। मुँह को कई बार टेढ़ा–मेढ़ा करके वह आख़िर में बोला, ‘‘जैसे महादेवीजी की कविता में वेदना का मेटाफ़र आता है...।’’

  खन्ना मास्टर ने कड़ककर कहा, ‘‘शट–अप ! यह अंग्रेज़ी का क्लास है।’’ लड़के ने जाँघें खुजलानी बन्द कर दीं।

  वे ख़ाकी पतलून और नीले रंग का बुश्शर्ट पहने थे और आँखों पर सिर्फ़ चुस्त दिखने के लिए काला चश्मा लगाए थे। कुर्सी के पास से निकलकर वे मेज़ के आगे आ गए। अपने कूल्हे का एक संक्षिप्त भाग उन्होंने मेज़ से टिका लिया। लड़के को वे कुछ और कहने जा रहे थे, तभी उन्होंने क्लास के पिछले दरवाज़े पर प्रिंसिपल साहब को घूरते हुए पाया। उन्हें बरामदे में खड़े हुए क्लर्क का कन्धा–भर दीख पड़ा।

  वे मेज़ का सहारा छोड़कर सीधे खड़े हो गए और बोले, ‘‘जी, शेली की एक कविता पढ़ा रहा था।’’

  प्रिंसिपल ने एक शब्द पर दूसरा शब्द लुढ़काते हुए तेज़ी से कहा, ‘‘पर आपकी बात सुन कौन रहा है ? ये लोग तो तस्वीरें देख रहे हैं।’’

  वे कमरे के अन्दर आ गए। बारी–बारी से दो लड़कों की पीठ में उन्होंने अपना बेंत चुभोया। वे उठकर खड़े हो गए। एक गन्दे पायजामे, बुश्शर्ट और तेल बहाते हुए बालोंवाला चीकटदार लड़का था; दूसरा घुटे सिर, कमीज़ और अण्डरवियर पहने हुए पहलवानी धज का। प्रिंसिपल साहब ने उनसे कहा, ‘‘यही पढ़ाया जा रहा है ?’’

  झुककर उन्होंने पहले लड़के की कुर्सी से एक पत्रिका उठा ली। यह सिनेमा का साहित्य था। एक पन्ना खोलकर उन्होंने हवा में घुमाया। लड़कों ने देखा, किसी विलायती औरत के उरोज तस्वीर में फड़फड़ा रहे हैं। उन्होंने पत्रिका ज़मीन पर फेंक दी और चीखकर अवधी में बोले, ‘‘यहै पढ़ि रहे हौ ?’’

  कमरे में सन्नाटा छा गया। ‘महादेवी की वेदना’ का प्रेमी मौका ताककर चुपचाप अपनी सीट पर बैठ गया। प्रिंसिपल साहब ने क्लास के एक छोर से दूसरे छोर पर खड़े हुए खन्ना मास्टर को ललकारकर कहा, ‘‘आपके दर्ज़े में डिसिप्लिन की यह हालत है ! लड़के सिनेमा की पत्रिकाएँ पढ़ते हैं ! और आप इसी बूते पर ज़ोर डलवा रहे हैं कि आपको वाइस-प्रिंसिपल बना दिया जाए ! इसी तमीज़ से वाइस-प्रिंसिपली कीजिएगा ! भइया, यहै हालु रही तौ वाइस-प्रिंसिपली तो अपने घर रही, पारसाल की जुलाई माँ डगर–डगर घूम्यौ।’’ कहते–कहते अवधी के महाकवि गोस्वामी तुलसीदास की आत्मा उनके शरीर में एक ओर से घुसकर दूसरी ओर से निकल गई। वे फिर खड़ी बोली पर आ गए, ‘‘पढ़ाई–लिखाई में क्या रखा है ! असली बात है डिसिप्लिन ! समझे, मास्टर साहब ?’’

 

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