Rag darbari, p.75

Rag Darbari, page 75

 

Rag Darbari
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  रुप्पन बाबू के शान्ति–दूतवाले स्वरूप का असली विकास छंगामल विद्यालय इंटर कॉलिज के गृह–युद्धों में हुआ था, वैसे ही जैसे भारत का शान्ति–दूत कोरिया, स्वेज़ और अफ्रीका के झगड़ों में विकिसत हुआ था। पर रुप्पन बाबू अपने इस रूप में भारत से भी ज़्यादा तेज़ चाल चलने के आदी हो गए थे और कई बार दुल्की की जगह सरपट दौड़ने लगे थे। ज़्यादा रफ़्तार खींच देने से कभी–कभी मैदान तो चुक जाता था, पर उनकी रफ़्तार नहीं चुकती थी जिससे वे कई अवसरों पर शून्य में कबूतर की तरह उल्टे हुए नज़र आते थे।

  पर यह भी शान्ति–दूत के व्यवसाय का एक अंग है, इसलिए रुप्पन बाबू कभी इस तरह की कसरत से घबराते नहीं थे। पर उस दिन के गृह–युद्ध में सबसे बड़ी गड़बड़ी यह हुई कि दोनों फ़रीक़ों ने उन्हें शान्ति–दूत न समझकर एक तीसरा फ़रीक़ समझ लिया और उनसे वैसा ही सलूक बरतना शुरू कर दिया। एक प्रकार से यह संकट भी शान्ति–दूत के व्यवसाय का एक अंग है, पर जैसाकि पहले बताया जा चुका है, रुप्पन बाबू को शान्ति–दूत का जीवन–दर्शन मालूम न था। फलत: वे उदास हो गए और आधे दिन अकेले, निरुद्देश्य घूमते रहे और महसूस करते रहे कि शिवपालगंज कूड़ा है, नाबदान है, नाली है।

  दोपहर ढल रही थी और घर के अन्दर बरामदे में वैद्यजी और बद्री पहलवान को छोड़कर और कोई न था। वह मकान का मर्दाना हिस्सा था जहाँ स्त्रियाँ बहुत कम आती थीं। सन्नाटा था। रुप्पन बाबू बरामदे से लगे हुए कमरे में चुपचाप लेटे हुए थे। कॉलिज में आज छुट्टी थी और वे पिछली रात काफ़ी देर जागते रहे थे। इसलिए वे काफ़ी सो चुकने के बाद भी दोबारा सोने की कोशिश में थे। तभी उनको अपने पिता की शास्त्रीय आवाज़ सुन पड़ी, ‘‘मुझे ज्ञात नहीं था कि तुम इतने नीच हो !’’

  जिस कान में ऐसी बात पड़े और वह एकदम सीधा खड़ा न हो जाय, वह कुत्ते की पूँछ से भी बदतर है। रुप्पन बाबू ने कान खड़े कर लिये और धीरे–से झाँककर देखा। वैद्यजी चारपाई पर पल्थी मारे हुए बैठे थे और बद्री पहलवान पास ही चबूतरे पर पंजों के बल बैठे हुए थे। दोनों में बिना किसी घोषणा के और बिलकुल अनौपचारिक वातावरण में लड़ाई हो रही थी। माहौल इतना घरेलू था कि अगर रुप्पन बाबू ने वैद्यजी की यह बात न सुनी होती तो वे यही समझते कि उनके बड़े भाई और बाप अकेले में ‘कोअॉपरेटिव यूनियन में एक नये ग़बन की तात्कालिक आवश्यकता’ जैसे सामूहिक महत्त्व के विषय पर आरम्भिक परामर्श कर रहे हैं।

  जो भी हो, रुप्पन बाबू ने वह बात सुनी और उसी लपेट में वैद्यजी के मुँह से फिर दूसरी बात सुनी, ‘‘तुम मूर्ख भी हो। मैं इसकी कल्पना नहीं कर सकता था।’’

  बद्री पहलवान ने लापरवाही से, एक जम्हाई–सी लेते हुए कहा, ‘‘घर में गाली– गलौज करने से क्या फ़ायदा ? यह अच्छी बात नहीं है।’’

  शायद इस व्यावहारिक बात ने वैद्यजी पर वाजिब असर डाला। उन्होंने सोहराब मोदीवाली शैली बदल दी। मामूली बातचीत के ढंग पर उन्होंने कहा, ‘‘और जो तुमने किया है, वह अच्छी बात है? तुम्हें कुछ इसके परिणाम का भी पता है ? इससे मेरी आत्मा को कितना कष्ट हुआ ? जानते हो ?’’

  बद्री पहलवान ने आज सवेरे शायद भंग नहीं पी थी। यह एक भौतिक सिद्धान्त है कि भंग न पीनेवालों को भंग पीने से जम्हाइयाँ आती हैं और भंग पीनेवालों को भंग न पीने से जम्हाइयाँ आती हैं। इसलिए उनके चेहरे पर जम्हाई का द्वितीय संस्करण छप गया। अपने कन्धे पर बैठे हुए मच्छर को उन्होंने दूसरे हाथ के एक मुलायम तमाचे से भगाया। पर मच्छर भी ऐसा था कि भगा नहीं, मर गया। इन सब कारर्वाइयों के बाद उन्होंने वैद्यजी की बात का जवाब दिया। कहा, ‘‘कष्ट की क्या बात है ! बताओ, जो कुछ तकलीफ़ होगी, दूर की जाएगी।’’

  वैद्यजी ने आवाज़ नीची करके कहा, ‘‘तुम इतने समझदार होकर गयादीन की कन्या से कैसे फँस गए।’’

  बद्री पहलवान कुछ क्षण चुपचाप बैठे रहे, फिर बोले, ‘‘आपसे बात करना बेकार है।’’ कहकर उन्होंने खूँटी से लटका हुआ कुरता उतारकर कन्धे पर डाला और दरवाज़े की ओर चले। वैद्यजी ने कहा, ‘‘अब भागे कहाँ जा रहे हो ?’’

  ‘‘भाग कौन रहा है ? कोई तुक की बात हो तो की जाय। घर के भीतर भी बेतुकी बातें होने लगेंगी, तो बस, हो चुका।’’

  वैद्यजी आवाज़ का गियर बदलकर बोले, ‘‘पर यह बात कभी तो करनी ही पड़ेगी।’’

  बद्री पहलवान ने अपने पैरों में ब्रेक लगाया और वहीं से कहा, ‘‘इस वक़्त तुम्हारी ज़बान से ऊँटपटाँग बातें निकल रही हैं। यह सब ठीक नहीं है। बात फिर कभी कर लेंगे।’’

  ‘‘फिर कब ? जब मेरी नाक कटकर गिर जाएगी ?’’

  बद्री पहलवान मजबूरी में लौट पड़े। कन्धे पर कुरता लटकाए हुए ही वे फिर चबूतरे पर पंजों के बल बैठ गए। बोले, ‘‘नाक–वाकवाली बात न करो। नाक है कहाँ ? वह तो पण्डित अजुध्यापरसाद के दिनों में ही कट गई थी।’’

  वैद्यजी ने कहा, ‘‘तुम अब नीचता की बात कर रहे हो।’’

  बद्री पहलवान पंजों की कमानी पर उचकने लगे। उनकी आवाज़ का साइलेंसर टूट गया। भर्राए गले से बोले, ‘‘कर रहे हैं तो अब कर ही लेने दो। तुम कहते हो कि मैं बेला से फँस गया हूँ। तुम हमारे बाप हो, तुमको कैसे समझाया जाय ! फँसना–फँसाना चिड़ीमार का काम है। तुम्हारे ख़ानदान में तुम्हारे बाबा अजुध्यापरसाद जैसे रघुबरा की महतारी से फँसे थे। इसे कहते हैं फँसना ! हाँ ! नहीं तो क्या !’’ रुककर वे तेज़ी से बोले, ‘‘खै़र, अब यह बात बन्द करो।’’

  वैद्यजी ने अपनी आवाज़ का ऐक्सिलेटर दबाया। बोले, ‘‘तुम्हारा ख़ानदान ! तुम्हारे बाबा ! तुम ऐसी भाषा बोलते हो ! यह ख़ानदान हमारा ही है ! तुम्हारा नहीं है ? ये पूर्वज तुम्हारे नहीं हैं ?’’

  जैसे चौराहे की लाल बत्ती चमक रही हो, बद्री की गाड़ी झटके से रुक गई। वे थमकर बोले, ‘‘हुआ न वही ? एक सच्ची बात कह दी, तो उसी में चिढ़ गए। ख़ैर, जाने दो।’’

  वैद्यजी ने कहा–जैसे क्लच और ऐक्सिलेटर साथ–साथ दबाकर कोई नौसिखिया गाड़ी चलाने की कोशिश कर रहा हो–‘‘नहीं, बद्री जाने नहीं दूँगा। आज यह बात समाप्त होनी चाहिए। हम ब्राह्‌मण हैं, वह वैश्य है। पर यह केवल जाति की बात नहीं है, सिद्धान्त की बात है ! ऐसे आचरणवाली लड़की को...। छोटे ने अदालत में क्या कहा था ?’’

  बद्री पहलवान उठकर खड़े हो गए। बोले, ‘‘बस ! बात बन्द ! और एक बात मैं कह लूँ, तब मेरी भी बात बन्द ! मैं बाबा अजुध्यापरसाद की चाल नहीं चल सकता। जो कुछ करूँगा, क़ायदे से करूँगा। इधर–उधर की गिचिर–पिचिर मुझे पसन्द नहीं है।’’

  वे दरवाज़े की ओर चल दिए, अचानक वैद्यजी चारपाई से उठकर खड़े हो गए और बिना जटा–जूट, दाढ़ी–मूँछ, कमण्डलु–कौपीन के, शाप देनेवाले पोज़ में तनकर, दोहरी ताक़तवाला हॉर्न–सा बजाते हुए बोले, ‘‘नीच ! तो मेरी बात भी सुन...।’’

  रुप्पन बाबू इस वार्तालाप को आश्चर्य से सुन रहे थे। पिछले दिन शहर में उन्हें वैद्यजी की बात से लगा था कि वे बेला की शादी बद्री से हो जाने देंगे और यदि कोई बाधा पड़ी तो वह गयादीन की ही ओर से होगी जिसे समझ लिया जाएगा। किन्तु इस बातचीत से उन्हें विदित हो गया कि वे जिसे संघर्ष का अन्त समझे हुए थे वह वास्तव में आरम्भ है।

  वे अपने को रोक न सके और लपलपाते हुए कमरे से बाहर आकर शान्ति–दूत का व्यवसाय सँभालने लगे। उन्होंने कहा, ‘‘पिताजी, अब कुछ कहने–सुनने से क्या होगा ! अब तो आप वही कहिए, जो कल आपने प्रिंसिपल के आगे कहा था। उसी को दोहराते जाइए। अब हम भी कहा करेंगे कि हम जातिप्रथा नहीं मानते। जब बद्री दादा बेला से फँस ही गए हैं तो...।’’

  रुप्पन की बात पूरी नहीं हो पायी। उन्हें अपनी गरदन टूटती हुई जान पड़ी। बात रोज़ की ही थी। बद्री पहलवान नित्यप्रति किसी–न–किसी की गरदन पर हाथ डालते ही थे। आज उन्होंने रुप्पन की गरदन पकड़ ली थी। पर रुप्पन की आँखें एक सेकण्ड में आँगन के दस चक्कर लगाकर आत्मलीन हो गईं। बद्री दाँत पीसकर कह रहे थे, ‘‘तुम घर ही में नेतागिरी करोगे ? मेरे लिए कहते हो कि मैं उससे फँस गया हूँ ! और वह भी मेरे मुँह पर कहते हो ! चिमिरखी कहीं के !’’

  रुप्पन की गरदन झकझोरकर उन्होंने बड़े ग़ैररस्मी ढंग से उन्हें आँगन के दूसरी ओर ठेल दिया और घबराहट में रुप्पन बाबू यह तक न तय कर पाए कि इस पद्धति से मिला हुआ ‘चिमिरखी’ का ख़िताब वे स्वीकार करें या वापस कर दें। उधर बद्री पहलवान वैद्यजी से कहते रहे, ‘‘इसे कहते हैं साक्षात् नेता ! इसने उसे खुद दो पन्ने की चिट्ठी भेजी थी ! न जाने कैसी गोलमाल की बातें थीं ! खुद फँसा था और कहता है कि मैं फँस गया हूँ।’’

  रुप्पन बाबू गिरते–गिरते सँभल गए थे। ऐंठकर बोले, ‘‘मैं इतना ज़लील नहीं कि तुमसे इस मामले की बात करूँ।’’ वैद्यजी से उन्होंने कहा, ‘‘पिताजी, अब इनसे कुछ भी बोलना बेकार है। इन्हें जो करना है करने दीजिए।’’

  पर वैद्यजी इस समय सलाह लेने के लिए नहीं, देने के लिए उद्यत थे। कड़ी आवाज़ में बोले, ‘‘जो भी हो रुप्पन, यह तुम्हारे बोलने का विषय नहीं है। मुझे तुम सबसे शिकायत है। मुझे तुम्हारे आचरण की भी ख़बर है।’’

  रुप्पन बाबू तैश में आ गए। ‘‘यह बात है !’’ उन्होंने अपनी गरदन को ऊँचा उठाकर सीना तानकर जवाब दिया, ‘‘तो मुझे भी आपके आचरण की खबर है।’’

 

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