Rag darbari, p.10

Rag Darbari, page 10

 

Rag Darbari
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  पर यहाँ लंगड़ कहता था, धरम से नकल लूँगा। बाबू कहता था, धरम से नक़ल दूँगा। फिर भी लड़ाई चल रही थी।

  रंगनाथ ने प्रिंसिपल साहब से इस ऐतिहासिक विपर्यय का मतलब पूछा। उसके जवाब में उन्होंने अवधी में एक कहावत कही, जिसका शाब्दिक अर्थ था : हाथी आते हैं, घोड़े जाते हैं, बेचारे ऊँट गोते खाते हैं। यह कहावत शायद किसी ज़िन्दा अजायबघर पर कही गई थी, पर रंगनाथ इतना तो समझ ही गया कि इशारा किसी सरकारी दफ्तर की लम्बाई, चौड़ाई और गहराई की ओर है। फिर भी, वह लंगड़ और नक़ल बाबू के बीच चलनेवाले धर्मयुद्ध की डिज़ाइन नहीं समझ पाया। उसने अपना सवाल और स्पष्ट रूप से प्रिंसिपल साहब के सामने पेश किया।

  उनकी ओर से क्लर्क बोला :

  ‘‘ये गँजहों के चोंचले हैं। मुश्किल से समझ में आते हैं।...’’

  लंगड़ यहाँ से पाँच कोस दूर एक गाँव का रहनेवाला है। बीवी मर चुकी है। लड़कों से यह नाराज़ है और उन्हें अपने लिए मरा हुआ समझ चुका है। भगत आदमी है। कबीर और दादू के भजन गाया करता था। गाते–गाते थक गया तो बैठे–ठाले एक दीवानी का मुक़दमा दायर कर बैठा।...

  “मुक़दमे के लिए एक पुराने फ़ैसले की नक़ल चाहिए। उसके लिए पहले तहसील में दरख़्वास्त दी थी। दरख़्वास्त में कुछ कमी रह गई, इसलिए वह ख़ारिज हो गई। इस पर इसने दूसरी दरख़्वास्त दी। कुछ दिन हुए, यह तहसील में नक़ल लेने गया। नक़लनवीस चिड़ीमार निकला, उसने पाँच रुपये माँगे। लंगड़ बोला कि रेट दो रुपये का है। इसी पर बहस हो गई। दो–चार वकील वहाँ खड़े थे; उन्होंने पहले नक़लनवीस से कहा कि, भाई दो रुपये में ही मान जाओ, यह बेचारा लँगड़ा है। नक़ल लेकर तुम्हारे गुण गायेगा। पर वह अपनी बात से बाल–बराबर भी नहीं खिसका। एकदम से मर्द बन गया और बोला कि मर्द की बात एक होती है। जो कह दिया, वही लूंगा।...

  ‘‘तब वकीलों ने लंगड़ को समझाया। बोले कि नक़ल बाबू भी घर–गिरिस्तीदार आदमी हैं। लड़कियाँ ब्याहनी हैं। इसलिए रेट बढ़ा दिया है। मान जाओ और पाँच रुपये दे दो। पर वह भी ऐंठ गया। बोला कि अब यही होता है। तनख्वाह तो दारू–कलिया पर ख़र्च करते हैं और लड़कियाँ ब्याहने के लिए घूस लेते हैं। नक़ल बाबू बिगड़ गया। गुर्राकर बोला कि जाओ, हम इसी बात पर घूस नहीं लेंगे। जो कुछ करना होगा, क़ायदे से करेंगे। वकीलों ने बहुत समझाया कि ‘ऐसी बात न करो, लंगड़ भगत आदमी है, उसकी बात का बुरा न मानो,’ पर उसका गुस्सा एक बार चढ़ा तो फिर नहीं उतरा।

  ‘‘सच तो यह है रंगनाथ बाबू कि लंगड़ ने गलत नहीं कहा था। इस देश में लड़कियाँ ब्याहना भी चोरी करने का बहाना हो गया है। एक रिश्वत लेता है तो दूसरा कहता है कि क्या करे बेचारा ! बड़ा खानदान है, लड़कियाँ ब्याहनी हैं। सारी बदमाशी का तोड़ लड़कियों के ब्याह पर होता है।

  ‘‘जो भी हो, लंगड़ और नक़ल बाबू में बड़ी हुज्जत हुई। अब घूस के मामले में बात–बात पर हुज्जत होती ही है। पहले सधा काम होता था। पुराने आदमी बात के पक्के होते थे। एक रुपिया टिका दो, दूसरे दिन नक़ल तैयार। अब नये–नये स्कूली लड़के दफ़्तर में घुस आते हैं और लेन–देन का रेट बिगाड़ते हैं। इन्हीं की देखादेखी पुराने आदमी भी मनमानी करते हैं। अब रिश्वत का देना और रिश्वत का लेना–दोनों बड़े झंझट के काम हो गए हैं।

  ‘‘लंगड़ को भी गुस्सा आ गया। उसने अपनी कण्ठी छूकर कहा कि जाओ बाबू, तुम क़ायदे से ही काम करोगे तो हम भी क़ायदे से ही काम करेंगे। अब तुमको एक कानी कौड़ी न मिलेगी। हमने दरख़्वास्त लगा दी है, कभी–न–कभी तो नम्बर आएगा ही।

  ‘‘उसके बाद लंगड़ ने जाकर तहसीलदार को सब हाल बताया। तहसीलदार बहुत हँसा और बोला कि शाबाश लंगड़, तुमने ठीक ही किया। तुम्हें इस लेन–देन में पड़ने की कोई ज़रूरत नहीं। नम्बर आने पर तुम्हें नक़ल मिल जाएगी। उसने पेशकार से कहा, देखो, लंगड़ बेचारा चार महीने से हैरान है। अब क़ायदे से काम होना चाहिए, इन्हें कोई परेशान न करे। इस पर पेशकार बोला कि सरकार, यह लँगड़ा तो झक्की है। आप इसके झमेले में न पड़ें। तब लंगड़ पेशकार पर बिगड़ गया। झाँय–झाँय होने लगी। किसी तरह दोनों में तहसीलदार ने सुलह करायी।

  ‘‘लंगड़ जानता है कि नक़ल बाबू उसकी दरख़्वास्त किसी–न–किसी बहाने खारिज करा देगा। दरख़्वास्त बेचारी तो चींटी की जान–जैसी है। उसे लेने के लिए कोई बड़ी ताकत न चाहिए। दरख़्वास्त को किसी भी समय खारिज कराया जा सकता है। फ़ीस का टिकट कम लगा है, मिसिल का पता ग़लत लिखा है, एक ख़ाना अधूरा पड़ा है– ऐसी ही कोई बात पहले नोटिस–बोर्ड पर लिख दी जाती है और अगर उसे दी गई तारीख़ तक ठीक न किया जाए तो दरख़्वास्त खारिज कर दी जाती है।

  ‘‘इसीलिए लंगड़ ने अब पूरी–पूरी तैयारी कर ली है। वह अपने गाँव से चला आया है, अपने घर में उसने ताला लगा दिया है। खेत–पात, फ़सल, बैल–बधिया, सब भगवान के भरोसे छोड़ आया है। अपने एक रिश्तेदार के यहाँ डेरा डाल दिया है और सवेरे से शाम तक तहसील के नोटिस–बोर्ड के आसपास चक्कर काटा करता है। उसे डर है कि कहीं ऐसा न हो कि नोटिस–बोर्ड पर उसकी दरख़्वास्त की कोई खबर निकले और उसे पता ही न चलेे। चूके नहीं कि दरख़्वास्त खारिज हुई। एक बार ऐसा हो भी चुका है।

  ‘‘उसने नक़ल लेने के सब क़ायदे रट डाले हैं। फ़ीस का पूरा चार्ट याद कर लिया है। आदमी का जब करम फूटता है तभी उसे थाना–कचहरी का मुँह देखना पड़ता है। लंगड़ का भी करम फूट गया है। पर इस बार जिस तरह से वह तहसील पर टूटा है, उससे लगता है कि पट्ठा नक़ल लेकर ही रहेगा।’’

  रंगनाथ ने अपने जीवन में अब तक काफ़ी बेवकूफ़ियाँ नहीं की थीं। इसलिए उसे अनुभवी नहीं कहा जा सकता था। लंगड़ के इतिहास का उसके मन पर बड़ा ही गहरा प्रभाव पड़ा और वह भावुक हो गया। भावुक होते ही ‘कुछ करना चाहिए’ की भावना उसके मन को मथने लगी, पर ‘क्या करना चाहिए’ इसका जवाब उसके पास नहीं था।

  जो भी हो, भीतर–ही–भीतर जब बात बरदाश्त से बाहर होने लगी तो उसने भुनभुनाकर कह ही दिया, ‘‘यह सब बहुत ग़लत है...कुछ करना चाहिए !’’

  क्लर्क ने शिकारी कुत्ते की तरह झपटकर यह बात दबोच ली। बोला, ‘‘क्या कर सकते हो रंगनाथ बाबू ? कोई क्या कर सकता है ? जिसके छिलता है, उसी के चुनमुनाता है। लोग अपना ही दुख–दर्द ढो लें, यही बहुत है। दूसरे का बोझा कौन उठा सकता है ? अब तो वही है भैया, कि तुम अपना दाद उधर से खुजलाओ, हम अपना इधर से खुजलायें।’’

  क्लर्क चलने को उठा खड़ा हुआ। प्रिंसिपल ने चारों ओर निगाह दौड़ाकर कहा, ‘‘बद्री भैया दिखायी नहीं पड़ रहे हैं।’’

  वैद्यजी ने कहा, ‘‘एक रिश्तेदार डकैती में फँस गए हैं। पुलिस की लीला अपरम्पार है। जानते ही हो। बद्री वहीं गया था। आज लौट रहा होगा।’’

  सनीचर चौखट के पास बैठा था। मुँह से सीटी–जैसी बजाते हुए बोला, ‘‘जब तक नहीं आते तभी तक भला है।’’

  प्रिंसिपल साहब भंग पीकर अब तक भूल चुके थे कि आराम हराम है। एक बड़ा–सा तकिया अपनी ओर खींचकर वे इत्मीनान से बैठ गए और बोले, ‘‘बात क्या है ?’’

  सनीचर ने बहुत धीरे–से कहा, ‘‘कोअॉपरेटिव यूनियन में ग़बन हो गया है। बद्री भैया सुनेंगे तो सुपरवाइज़र को खा जाएँगे।’’

  प्रिंसिपल आतंकित हो गए। उसी तरह फुसफुसाकर बोले, ‘‘ऐसी बात है !’’

  सनीचर ने सिर झुकाकर कुछ कहना शुरू कर दिया। वार्तालाप की यह वही अखिल भारतीय शैली थी जिसे पारसी थियेटरों ने अमर बना दिया है। इसके सहारे एक आदमी दूसरे से कुछ कहता है और वहीं पर खड़े हुए तीसरे आदमी को कानोंकान खबर नहीं होती; यह दूसरी बात है कि सौ गज़ की दूरी तक फैले हुए दर्शकगण उस बात को अच्छी तरह सुनकर समझ लेते हैं और पूरे जनसमुदाय में स्टेज पर खड़े हुए दूसरे आदमी को छोड़कर, सभी लोग जान लेते हैं कि आगे क्या होनेवाला है। संक्षेप में, बात को गुप्त रखने की इस हमारी परम्परागत शैली को अपनाकर सनीचर ने प्रिंसिपल साहब को कुछ बताना शुरू किया।

  पर वैद्यजी कड़ककर बोले, ‘‘क्या स्त्रियों की भाँति फुस–फुस कर रहा है? कोअॉपरेटिव में ग़बन हो गया तो कौन–सी बड़ी बात हो गई ? कौन–सी यूनियन है जिसमें ऐसा न हुआ हो ?’’

  कुछ रुककर, वे समझाने के ढंग पर बोले, ‘‘हमारी यूनियन में ग़बन नहीं हुआ था, इस कारण लोग हमें सन्देह की दृष्टि से देखते थे। अब तो हम कह सकते हैं कि हम सच्चे आदमी हैं। ग़बन हुआ है और हमने छिपाया नहीं है। जैसा है, वैसा हमने बता दिया है।’’

  साँस खींचकर उन्होंने बात समाप्त की, ‘‘चलो अच्छा ही हुआ। एक काँटा निकल गया...चिन्ता मिटी।’’

  प्रिंसिपल साहब तकिये के सहारे निश्चल बैठे रहे। आख़िर में एक ऐसी बात बोले जिसे सब जानते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘लोग आजकल बड़े बेईमान हो गए हैं।’’

  यह बात बड़ी ही गुणकारी है और हर भला आदमी इसका प्रयोग मल्टी–विटामिन टिकियों की तरह दिन में तीन बार खाना खाने के बाद कर सकता है। पर क्लर्क को इसमें कुछ व्यक्तिगत आक्षेप-जैसा जान पड़ा। उसने जवाब दिया, ‘‘आदमी आदमी पर है। अपने कॉलिज में तो आज तक ऐसा नहीं हुआ।’’

  वैद्यजी ने उसे आत्मीयता की दृष्टि से देखा और मुस्कराए। कोअॉपरेटिव यूनियनवाला ग़बन बीज–गोदाम से गेहूँ निकालकर हुआ था। उसी की ओर इशारा करते हुए बोले, ‘‘कॉलिज में ग़बन कैसे हो सकता है ! वहाँ गेहूँ का गोदाम नहीं होता।’’

 

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