Rag darbari, p.43

Rag Darbari, page 43

 

Rag Darbari
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  मैदान के एक कोने पर वन–संरक्षण, वृक्षारोपण आदि की कुछ योजनाएँ भी चालू की गई थीं। वे चलीं या नहीं, यह बहस की बात है। देखने में इतना ज़रूर आता था कि वहाँ नालियाँ खुदी पड़ी हैं और यह सुनने में आता था कि उनमें बबूल के बीज बोये गए थे। यह भी सुनने में आता था कि गँजहे अगर गँजहे न होते और पड़ोस के गाँववालों की तरह उद्यमी होते तो यहाँ भी ऊसर में बबूलों का जंगल लहरा रहा होता। पर नालियों में बबूल उगे ही नहीं जो कि मिट्टी की ख़राबी के कारण हुआ, और पूरी योजना से शिवपालगंज को इतना ही फ़ायदा हुआ कि वे नालियाँ लोगों के लिए सार्वजनिक शौचालयों के रूप में इस्तेमाल होने लगीं और इस तरह जो स्कीम जंगल के लिए बनी थी वह अब घर की हो गई।

  इस मैदान के दूसरे कोने पर एक बरगद का पेड़ था जो पूरी वीरानगी पर बलात्कार–जैसा कर रहा था। उसी के पास एक कुआँ था, जिसकी जगत पर रंगनाथ अकेला बैठा था।

  हिन्दुस्तान में पढ़े–लिखे लोग कभी–कभी एक बीमारी के शिकार हो जाते हैं। उसका नाम ‘क्राइसिस ऑफ़ कांशस’ है। कुछ डॉक्टर उसी में ‘क्राइसिस ऑफ़ फ़ेथ’ नाम की एक दूसरी बीमारी भी बारीकी से ढूँढ़ निकालते हैं। यह बीमारी पढ़े–लिखे लोगों में आमतौर से उन्हीं को सताती है जो अपने को बुद्धिजीवी कहते हैं और जो वास्तव में बुद्धि के सहारे नहीं, बल्कि आहार–निद्रा–भय–मैथुन के सहारे जीवित रहते हैं (क्योंकि अकेली बुद्धि के सहारे जीना एक नामुमकिन बात है)। इस बीमारी में मरीज़ मानसिक तनाव और निराशावाद के हल्ले में लम्बे–लम्बे वक्तव्य देता है, ज़ोर–ज़ोर से बहस करता है, बुद्धिजीवी होने के कारण अपने को बीमार और बीमार होने के कारण अपने को बुद्धिजीवी साबित करता है और अन्त में इस बीमारी का अन्त कॉफ़ी-हाउस की बहसों में, शराब की बोतलों में, आवारा औरतों की बाँहों में, सरकारी नौकरी में और कभी–कभी आत्महत्या में होता है।

  जिस दिन से रंगनाथ ने कॉलिज में मैनेजर का चुनाव देखा था, उसे अपने में इस बीमारी का शुबहा होने लगा था। वैद्यजी को देखते ही अचानक उसे वह दृश्य याद आ जाता जब प्रिंसिपल साहब चुनाव के बाद बरछी से बिंधे हुए सूअर की तरह चिचियाते हुए जय–जयकार करते कॉलिज से बाहर निकले थे। उसे ऐसा जान पड़ने लगा कि वैद्यजी के साथ रहते हुए वह डकैतों के किसी गिरोह का सदस्य हो गया है। जब प्रिंसिपल साहब उसके आगे खीसें निपोरकर कोई रोचक क़िस्सा बयान करते–और उनके पास ऐसे क़िस्सों की कमी नहीं थी–तो उस समय उसे बराबर अनुभव होता रहता कि यह आदमी किसी भी क्षण झपटकर किसी का भी गला दबोच सकता है।

  शहर होता तो वह किसी कॉफ़ी-हाउस में बैठकर दोस्तों के सामने इस चुनाव पर लम्बा–चौड़ा व्याख्यान दे डालता, उन्हें बताता कि किस तरह तमंचे के ज़ोर से छंगामल विद्यालय इंटर कॉलिज की मैनेजरी हासिल की गई है और मेज़ पर हाथ पटककर कहता कि जिस मुल्क में इन छोटे–छोटे ओहदों के लिए ऐसा किया जाता है, वहाँ बड़े–बड़े ओहदों के लिए क्या नहीं किया जाता होगा। यह सब कहकर, उपसंहार में अंग्रेज़ी के चार ग़लत–सही जुमले बोलकर, वह कॉफ़ी का प्याला खाली कर देता और चैन से महसूस करता कि वह एक बुद्धिजीवी है और प्रजातन्त्र के हक में एक बेलौस व्याख्यान देकर और चार निकम्मे आदमियों के आगे अपने दिल का गुबार निकालकर उसने ‘क्राइसिस ऑफ़ फ़ेथ’ को दबा लिया है।

  पर यहाँ शहर न था, बल्कि देहात था जहाँ, बक़ौल रुप्पन बाबू, अपने सगे बाप का भी भरोसा नहीं, और जहाँ, बकौल सनीचर, कोई कटी उँगली पर भी मूतनेवाला नहीं है। इसलिए रंगनाथ यहाँ अपनी बीमारी को दबा नहीं सका। उसके दिमाग़ में यह बात दिन–ब–दिन पक्की होती गई कि वह डकैतों के किसी गिरोह में आ गया है, उन डकैतों ने कॉलिज पर छापा मारकर उसे लूट लिया है और अब वे किसी दूसरी जगह छापा मारने की तैयारी कर रहे हैं। उसकी तबीयत अब वैद्यजी को गाली देने के लिए कुलबुलाती रहती और उससे भी ज़्यादा किसी ऐसे आदमी की तलाश में कुलबुलाती, जिसके सामने उन्हें विश्वासपूर्वक गाली दी जा सके।

  ऐसा साथी कहाँ मिलेगा ? खन्ना मास्टर लबाड़िया है। अगर उसके सामने कोई बात कह दी गई तो दूसरे दिन वह सारे गाँव में फैल जाएगी और सभी कहने लगेंगे कि वैद्यजी का भांजा अपने मामा को ही गालियाँ देता है और देखो, आजकल के पढ़े–लिखे लोगों की यही तमीज़ है। मालवीय मास्टर से इस विषय पर बात की जा सकती है, पर वह गुटबन्द होते हुए भी सीधा आदमी है और उसके सामने कोई भी बात करने में मज़ा नहीं आता। फिर कौन ? रुप्पन बाबू ?

  रंगनाथ को रुप्पन बाबू पर कुछ भरोसा था, क्योंकि कभी–कभी वे प्रिंसिपल को गालियाँ देकर कॉलिज के दुर्भाग्य की बात करते थे। उन्हें यह शिकायत थी कि वह पढ़ने–लिखने में जाहिल है, पर दुनियादारी में बड़ा उस्ताद है, पक्का तिकड़मी है, उसने पिताजी को फँसाकर इस हालत में डाल दिया है कि वह हर काम अपनी इच्छा से करता है; पर पिताजी समझते हैं कि वह काम उनकी अपनी इच्छा से हुआ है। उसने खन्ना मास्टर के साथ काफ़ी ज़्यादती की है। खन्ना मास्टर लाख बेवकूफ़ हों, फिर भी उन पर इतनी ज़्यादती नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह ठीक नहीं है कि पिताजी की मदद से एक बेवकूफ़ दूसरे बेवकूफ़ को मार दे।...

  यहाँ बरगद के पेड़ के नीचे, कुएँ की जगत पर बैठे हुए रंगनाथ ने इत्मीनान की एक गहरी साँस ली, क्योंकि बहुत दिन बाद आज पहली बार उसकी बीमारी उसे तंग नहीं कर रही थी। हुआ यह था हिम्मत करके उसने आज रुप्पन बाबू के सामने अपना आत्म–संकट खोलकर रख दिया था। उसने साफ़-साफ़ कहा था कि मामा को ऐसा न करना चाहिए; तमंचे के ज़ोर से मैनेजरी मिल भी गई तो क्या हुआ, चारों तरफ़ उनकी बदनामी तो हो ही गई।

  रुप्पन बाबू ने अपनी डण्डामार शैली में जवाब दिया था :

  ‘‘देखो दादा, यह तो पॉलिटिक्स है। इसमें बड़ा–बड़ा कमीनापन चलता है। यह तो कुछ भी नहीं हुआ। पिताजी जिस रास्ते में हैं उसमें इससे भी आगे कुछ करना पड़ता है। दुश्मन को, जैसे भी हो, चित करना चाहिए। यह न चित कर पाएँगे तो खुद चित हो जाएँगे और फिर बैठे चूरन की पुड़िया बाँधा करेंगे और कोई टका को भी न पूछेगा।

  ‘‘पर इस कॉलिज के बारे में सुधार की ज़रूरत है। प्रिंसिपल हरामी है। दिन–रात गुटबन्दी की खिच–खिच लगाए रहता है। खन्ना मास्टर भी उल्लू के पट्ठे हैं, पर वे हरामी नहीं हैं। यह साला उन्हें बहुत दबा चुका है, अब खन्ना मास्टर को उबारना चाहिए। मैंने पिताजी से भी बात की थी, पर वे प्रिंसिपल को नहीं उखाड़ना चाहते।

  ‘‘मैंने सोचा है कि कुछ दिनों तक हम पिताजी से कुछ न बोलें, सिर्फ़ धीरे–से खन्ना मास्टर को उछाल दें। उससे प्रिंसिपल चित हो जाएगा। वह साला बहुत फूल गया है, उसका फूटना ज़रूरी है। एक बार जब चित हो जाएगा, तो पिताजी भी देख लेंगे कि वह कितना उस्ताद था।...’’

  रंगनाथ ने इत्मीनान की साँस इसीलिए ली थी। इतना तो निश्चित हो गया था कि वह अब रुप्पन बाबू के सामने इस विषय पर बात कर सकता है; यह भी साफ़ हो गया था कि रुप्पन बाबू के साथ वह खन्ना मास्टर से हमदर्दी दिखा सकता है, गिरे हुए को उबार सकता है, फूले हुए को फोड़ सकता है और संक्षेप में, अन्याय के मुक़ाबले सीधा न सही, दुबककर ही खड़ा होकर वह पहले–जैसी सेहत हासिल कर सकता है।

  उससे लगभग एक फर्लांग की दूरी पर रुप्पन बाबू एक पेड़ के सहारे काफ़ी देर से बैठे हुए अपने पेट की अन्दरूनी सफ़ाई कर रहे थे। अपनी इस निजी समस्या को सार्वजनिक ढंग से निबटाकर जब वे उठ खड़े हुए तो रंगनाथ भी अपनी जगह पर खड़ा हो गया। रुप्पन बाबू जब उसकी तरफ़ नहीं आए तो वही उनकी ओर चल दिया।

  प्रधान बनने के पहले ज़रूरी था कि सनीचर जनता को बता दे कि देखो भाइयो, मैं भी किसी से कम तिकड़मी नहीं हूँ और भला आदमी समझकर मुझे वोट देने से कहीं इनकार न कर बैठना। वह गाँव में कोई ऊँचा काम करके दिखाना चाहता था। उसने रंगनाथ से सुना था कि चुनाव के पहले बड़े–बड़े नेता अपने–अपने चुनाव–क्षेत्र में कहीं–न–कहीं का रुपया किसी–न–किसी तरकीब से ठेलों पर लादकर ले जाते हैं और जन–हित के नाम पर उसे नाली में फेंक देते हैं। सनीचर ने भी, बिना वैद्यजी से सलाह लिये, कुछ इसी तरह का करिश्मा दिखाना चाहा। इस काम के लिए उसने कालिकाप्रसाद नामक गँजहे को अपना साथी चुना।

  कालिकाप्रसाद का पेशा सरकारी ग्राण्ट और क़र्जे खाना था। वे सरकारी पैसे के द्वारा सरकारी पैसे के लिए जीते थे। इस पेशे में उनके तीन सहायक थे–क्षेत्रीय एम. एल. ए., खद्दर की पोशाक और उनका यह वाक्य, ‘‘अभी तो वसूली की बात ही न कीजिए। आपको कार्रवाई रोकने में दिक़्क़त न हो, इसलिए मैंने ऊपर भी दरख़्वास्त लगा दी है।’’

  अपने हिसाब से वे गाँव के सबसे ज़्यादा आधुनिक आदमी थे, क्योंकि उनका यह पेशा बिलकुल ही आधुनिक काल की उपज था। कालिकाप्रसाद प्रेमचन्द के उन कथानायकों में न थे जो लगान वसूलनेवाले अमीन को देखते ही घर के भीतर घुस जाते थे और बीवी से घबराहट में कहने लगते थे, ‘‘दरवाज़े पर सहना खड़ा है।’’ वे उनमें थे कि हज़ार रुपये की कुर्की लिये अमीन चबूतरे के नीचे खड़ा हुआ खुशामद कर रहा है और वे चबूतरे के ऊपर बैठे हुए निश्चिन्त भाव से कह रहे हैं, ‘‘आपको कार्रवाई रोकने में दिक़्क़त हो तो कहिए, ऊपर से लिखा लाऊँ।’’

 

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