Rag darbari, p.65

Rag Darbari, page 65

 

Rag Darbari
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  बैजनाथ ने चालाकी के साथ सिर हिलाया जैसे वकील दौड़ रहा हो और इधर से उसने लँगड़ी लगा दी हो। उसने धीरे–से कहा, ‘‘अपनी बेर तो कुछ नहीं, मैंने कुछ पूछ लिया तो अदालत से शिकायत करते हो वकील साहब ?’’

  अदालत किसी ज़रूरी काग़ज़ को पढ़ने में लगी हुई थी, अत: वकील को अपनी प्रतिभा के सहारे ही इस गड्‌ढे से बाहर रेंगना ज़रूरी हो गया। उसने दाँत दबाकर कहा, ‘‘टके–टके पर पुलिस की तरफ़ से झूठी गवाही देते हो बेटा, और उलटे हमीं से जिरह करते हो।’’

  बैजनाथ ने चारों तरफ़ एक अहंकारपूर्ण दृष्टि डालकर वकील की ओर तरस के साथ देखा। सबको सुनाकर कहा, ‘‘अपना–अपना कारोबार है।’’

  अदालत ज़रूरी कागजों पर दस्तख़त कर चुकी थी। अब बड़े ही भोले ढंग से बोली, ‘‘आपस में बातचीत करना ठीक नहीं। हाँ वकील साहब, जिरह जारी रखिए।’’

  वकील ने कहा, ‘‘श्रीमन्, इस गवाह से जिरह करना मुश्किल है। हर सवाल का जवाब देने में अटकता है। इसे नोट कर लिया जाए।’’

  अदालत ने बैजनाथ की तरफ़ गहराई से देखा। बैजनाथ पब्लिक प्रॉसीक्यूटर की तरफ़ देखने लगा था। पब्लिक प्रॉसीक्यूटर अदालत की तरफ़ देख रहा था।

  अदालत ने वकील से कहा, ‘‘आगे चलिए।’’

  वकील ने सारस के ढंग से अपनी टाँगें बदलीं और इस तरह जिरह के एक ऐतिहासिक युग को समाप्त करके दूसरे में प्रवेश किया।

  ‘‘तुमने सरकार बनाम चुरई दफ़ा 379 के मुक़दमे में सबूत की ओर से गवाही दी थी ?’’

  ‘‘मुझे याद नहीं है।’’

  ‘‘यह गवाही तुमने इसी महीने में दी है।’’

  बैजनाथ थोड़ी देर सोचता रहा। फिर बोला, ‘‘इस महीने में मैंने एक गवाही दी थी। मैं अपने बाग के पास से निकल रहा था, एक आदमी एक पोटली लिये जा रहा था...’’

  ‘‘तुम्हें यह बताने की ज़रूरत नहीं कि तुमने गवाही में क्या कहा था। सिर्फ यह बताओ कि पिछले महीने में भी तुमने गवाही दी थी ?’’

  ‘‘गवाही दी थी, पर मुक़दमे का नाम हमें याद नहीं।’’

  इतनी देर बाद अब अदालत को भी गुस्सा आया। वह बोली, ‘‘यह कैसे हो सकता है ?’’

  ‘‘हम तो दिहाती आदमी हैं सरकार, पढ़े–लिखे नहीं हैं।’’

  वकील ने कहा, ‘‘श्रीमन्, इस चालाकी को भी नोट कर लिया जाय।’’

  बैजनाथ ने कहा, ‘‘श्रीमान क्या–क्या नोट करेंगे, आप ही नोट कीजिए। अपने मुंशी से कहिए, वह सब कुछ नोट कर लेगा।’’

  अदालत ने इस बार बैजनाथ को डाँटा। बहुत डाँटा। इतना डाँटा कि थोड़ी देर के लिए बैजनाथ सचमुच ही सहम गया। उसका चेहरा पीला पड़ गया। उधर डाँटते–डाँटते अदालत का चेहरा लाल हो गया। पर जब अदालत की डाँट दूसरे से तीसरे मिनट में पहुँची तो बैजनाथ सँभल गया। उसे अपने उस्ताद पण्डित राधेलाल की याद आ गई। उन्होंने समझाया था कि बेटा, गवाही देते समय कभी–कभी वकील या हाकिमे–इजलास बिगड़ जाते हैं। इससे घबराना न चाहिए। वे बेचारे दिन–भर दिमाग़ी काम करते हैं। उनका हाज़मा खराब होता है। वे प्राय: अपच, मंदाग्नि और बवासीर के मरीज़ होते हैं। इसीलिए वे चिड़चिड़े हो जाते हैं। उनकी डाँट–फटकार से घबराना न चाहिए। यही सोचना चाहिए कि वे तुम्हें नहीं, अपने हाज़मे को डाँट रहे हैं। यही नहीं, यह भी याद रखना चाहिए कि ये सब बड़े आदमी होते हैं, पढ़े–लिखे लोग। ये लोग तुम्हारा मामला समझ ही नहीं सकते। इसलिए जब वे बिगड़ रहे हों तो अपना दिमाग साफ़-सुथरा रखना चाहिए और यही सोचते रहना चाहिए कि अब किस तरकीब से उन्हें बुत्ता दिया जाए।

  अदालत ने आख़िरी हिदायत की कि सवालों का जवाब सिर्फ़ ‘हाँ–नहीं’ में दिया जाना चाहिए। ज़िरह का टैंक अब समतल ज़मीन पर घरघराता हुआ चलने लगा।

  ‘‘आज से छ: महीने पहले तुमने सरकार बनाम बिसेसर के मुक़दमे में सबूत की ओर से गवाही दी थी ?’’

  ‘‘नहीं।’’ (यह उत्तर सच था क्योंकि बैजनाथ ने यह गवाही सात महीने पहले दी थी।)

  ‘‘साल–भर पहले तुमने सरकार बनाम छुन्नू के मुक़दमे में गवाही दी थी ?’’

  ‘‘नहीं।’’ (यह उत्तर भी सच था–छुन्नू का मुक़दमा चौदह महीने पहले हुआ था।)

  ‘‘...’’

  ‘‘नहीं’’

  ‘‘...’’

  ‘‘नहीं।’’

  ‘‘...’’

  ‘‘नहीं।’’

  ‘‘...’’

  ‘‘हाँ।’’

  ‘‘...’’

  ‘‘हाँ।’’

  ‘‘इस तरह तुम अब तक कई मुक़दमों में सरकारी गवाह रह चुके हो।’’

  ‘‘आपने ऐसे सिर्फ़ दो मुक़दमे गिनाये हैं।’’

  ‘‘इतने–इतने मुक़दमों में तुम पुलिस को बार–बार गवाही के लिए मिल जाते हो। इसकी कोई ख़ास वजह है ?’’

  बैजनाथ ने अदालत की ओर देखकर शहीदों की आवाज़ में कहा, ‘‘वजह यह है कि मैं जवाँमर्द आदमी हूँ।’’ उसकी छाती तन गई, ‘‘बदमाशों के ख़िलाफ़ गवाही देने की हमारे उधर किसी की हिम्मत नहीं पड़ती। मैं बेधड़क आदमी हूँ और गुण्डागर्दी के सख्त ख़िलाफ़ हूँ। इसलिए जो देखता हूँ, खुलेआम कहने में हिचकता नहीं हूँ।’’

  वकील ने उसे रोकने की कोशिश की, अदालत ने हाथ हिलाकर उसे गवाह के कटघरे से निकल जाने के लिए कहा, पर बैजनाथ का व्याख्यान बन्द नहीं हुआ। वह कहता रहा, ‘‘मैंने क़सम खायी है कि अपने क्षेत्र से मैं गुण्डों को भगाकर दम लूँगा। मैं अपनी बात पर अटल हूँ। इसमें यदि मेरे प्राण भी निकल जाएँ, तो मुझे इसकी चिन्ता नहीं।’’

  ‘‘तुम्हारा नाम ?’’

  ‘‘छोटे पहलवान।’’

  पब्लिक प्रॉसीक्यूटर ने उनकी बात में संशोधन किया। पेशकार से कहा, ‘‘लिखिए, छोटेलाल।’’

  छोटे पहलवान ने उसे इस तरह देखा मानो उन्हें सचमुच ही छोटा बना दिया गया हो। नाराज़गी में उन्होंने लार घूँटी। दूसरा सवाल हुआ, ‘‘बाप का नाम ?’’

  ‘‘कुसेहर।’’

  पब्लिक प्रॉसीक्यूटर ने फिर संशोधन किया, ‘‘कुसेहरप्रसाद।’’

  इस बार छोटे पहलवान ने उसे इस तरह देखा जैसे उनके बाप को किसी ने गाली दी हो।

  ‘‘जात ?’’

  ‘‘बाँभन।’’

  “ मुक़ाम।”

  ‘‘हम गँजहे हैं।’’

  ‘‘ठीक है; पर तुम्हारे गाँव का नाम क्या है ?’’

  ‘‘गंज।’’

  ‘‘कौन गंज ?’’

  छोटे पहलवान ने अकड़कर कहा, ‘‘कोई सौ–दो सौ गंज थोड़े ही हैं।’’ फिर रुककर कहा, ‘‘शिवपालगंज।’’

  ‘‘कहो भगवान की क़सम, जो कहेंगे सच–सच कहेंगे।’’

  ‘‘कह दिया।’’

  ‘‘कह दिया नहीं, मुँह से कहो, भगवान की क़सम, सच–सच कहेंगे।’’

  ‘‘मुँह से ही कह दिया।’’

  अरदली अदालत का मुँह देखने लगा। वार्ताक्रम में ‘डेडलॉक’ पैदा हो गया था। अदालत ने छोटे पहलवान को ग़ौर से देखा, चढ़े हुए कल्ले, बैल की–सी गरदन; बक़ौल गयादीन–बिना सूँड़ का हाथी। उधर अदालत का व्यक्तित्व बुद्धिजीवी था। उसने अरदली को हुक्म दिया, ‘‘गवाह से कहो, बाहर जाकर मुँह साफ़ कर आए।’’

  ‘‘बाहर जाकर पहले मुँह साफ़ कर आओ।’’

  छोटे पहलवान ने अँगोछे से मुँह का फ़र्जी पसीना पोंछ डाला। फिर इत्मीनान से कटघरे का सहारा लेकर इस तरह झाँकने लगे जैसे कोई जहाज़ की रेलिंग के सहारे खड़ा हुआ समुद्र में जल–जन्तुओं को देखता है। अदालत ने हुक्म दिया :

  ‘गवाह का मुँह साफ़ कराओ।’’

  पब्लिक प्रॉसीक्यूटर ने छोटे पहलवान से कहा, ‘‘बाहर जाकर पान थूक आओ।’’

  छोटे पहलवान सचमुच ही इस समय बड़े आत्मविश्वास के साथ पान चबा रहे थे। उन्हें लगा, उनसे कहा जा रहा है कि अपना आत्मविश्वास थूक आओ। उन्होंने यह बात अनसुनी कर दी, पर धीरे–से पान हलक के नीचे उतार लिया और एक बार अँगोछे से फिर मुँह पोंछ डाला।

  अदालत ने अरदली को हुक्म दिया, ‘‘गवाह को हलफ़ दिलाओ।’’

  अरदली ने इस समझौते को विकृत निगाह से देखते हुए छोटे पहलवान से कहा, ‘‘कहो, भगवान की क़सम, जो कहेंगे सच–सच कहेंगे।’’

  ‘‘सच–सच कहेंगे।’’

  ‘‘भगवान की कसम।”

  ‘‘भगवान की क़सम।” छोटे पहलवान ने इधर–उधर देखते हुए इस बार अनायास कह दिया।

  पब्लिक प्रॉसीक्यूटर ने पहले छोटे पहलवान से जोगनाथ के घर में तलाशी सम्बन्धी सवाल पूछे। वे यहाँ तक जवाब देते गए कि दारोग़ाजी जोगनाथ के साथ ही उसके घर में घुसे थे।

  ‘‘फिर घर की तलाशी ली गई ?’’

  ‘‘हाँ।’’

  ‘‘क्या निकला ?’’

  ‘‘कुछ नहीं।’’

  पब्लिक प्रॉसीक्यूटर की निगाह मत्थे पर चढ़ गई। उसने ज़ोर देकर पूछा, ‘‘मैं पूछ रहा हूँ, तलाशी में क्या निकला ?’’

  ‘‘निकलेगा क्या ? घण्टा ?’’

  जोगनाथ और उसके वकील–दोनों साथ–साथ मुस्कराए। पीछे से सनीचर ने कहा, ‘‘शाबाश ! अड़े रहो बेटा।’’

  ‘‘यह कौन बोल रहा है ? क्या बदतमीज़ी है ?’’ अदालत ने गम्भीरतापूर्वक जिज्ञासा की, पर सनीचर तब तक अदालत के बाहर पहुँच चुका था।

  पब्लिक प्रॉसीक्यूटर ने कहा, ‘‘तलाशी में तीन ज़ेवरात निकले थे, जो तुम्हारे सामने रखे हुए हैं।’’

  जोगनाथ का वकील उछलकर सामने आ गया। अदालत से बोला, ‘‘श्रीमन्, यह तो जिरह है।’’

  पब्लिक प्रॉसीक्यूटर ने कहा, ‘‘हुजूर, गवाह ख़िलाफ़ हो गया है। मैं इससे जिरह करने की इजाज़त चाहूँगा।’’

  अदालत ने गम्भीरतापूर्वक कहा, ‘‘कीजिए।’’

  जोगनाथ के वकील ने ऐतराज़ किया, ‘‘श्रीमन्, ये लिखकर दें कि ये इस गवाह को ख़िलाफ़ मान रहे हैं।’’

  पब्लिक प्रॉसीक्यूटर ने अपनी फ़ाइल से एक दरख़्वास्त निकाली जो निश्चय ही पहले से लिखी रखी थी। दरख़्वास्त इजलास में पेश कर दी गई।

 

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