Rag darbari, p.36

Rag Darbari, page 36

 

Rag Darbari
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  रुप्पन बाबू सिंह साहब के पास आकर खड़े हो गए। सिंह साहब के चेहरे पर चार–पाँच दिन की बढ़ी हुई दाढ़ी–मूँछ थी, होंठों के कोनों से तम्बाकू की पीक टपकने ही वाली थी। इस सबके बावजूद सिर्फ़ सोला हैट के कारण वे काफ़ी चुस्त दिख रहे थे।

  रुप्पन बाबू ने कहा, ‘‘कहिए सिंह साहब, क्या रंग है ?’’

  ‘‘रंग बदरंग है भाई ! दस–दस चालान करने पड़े। अब तो रुप्पन बाबू, इस उमर में हम इसी के हो गए। गवाही के लिए इजलास का चक्कर लगाते–लगाते पैर की खाल उड़ जाएगी।’’

  रुप्पन बाबू ने भीड़ के शोरगुल को अपनी आवाज़ से दबाते हुए कहा, ‘‘और क्या रखा है चालान में, सिंह साहब ! दस–पाँच रुपये ले–देकर बात खत्म कीजिए।’’

  सिंह साहब ने भी उसी तरह आवाज़ को ऊँचा करके कहा, ‘‘कौन है साला दस–पाँच रुपये देनेवाला ? उधर के खोंचेवालों का चालान किया था, सब साले दो–दो रुपये टिकाने को तैयार हैं। हमने भी कहा कि चालान ही चाहते हो तो लो, वही किए देते हैं।’’

  रुप्पन बाबू ने हाथ उठाकर कहा, ‘‘कहाँ के हैं वे खोंचेवाले ? बड़े जाहिल हैं।’’

  एक मोटा–तगड़ा आदमी उन्हीं के सामने खड़ा था। देखने में काफ़ी रोबीला था, पर जब बोला तो लगा कि कोई भारी–भरकम तरबूज सड़ गया है। पिनपिनाती आवाज़ में कहने लगा, ‘‘रोहूपुरवाले हैं बाबू साहब। इत्ती देर से निस्पिट्टर साहब की ख़ुसामद में खड़े हैं। पर ये दस रुपिया फ़ी खोंचे के रेट से नीचे ही नहीं उतर रहे हैं।’’

  रुप्पन बाबू ने कहा, ‘‘मान जाइए सिंह साहब, दो रुपये के रेट से भी बीस रुपया हो जाएगा। क्या बुरा है ? कौन गेहूँ बेचा है आपने ?’’

  वहाँ से गला फाड़कर सिंह साहब बोले, ‘‘दो रुपया ?’’ वे हँसे, ‘‘अब इतनी बेइज़्ज़ती तो न कराइए रुप्पन बाबू ?’’

  मोटा आदमी रुप्पन के रुख़ से प्रोत्साहित होकर कहने लगा, ‘‘अब बाबू साहब, ज़रा हमारी हैसियत तो देखें। साल–भर बाद तो यहाँ खोंचा लगाया है। दस रुपिया इधर चला गया तो बचेगा क्या ?’’

  बात मज़ाक से शुरू हुई थी, पर रुप्पन बाबू को अब खोंचेवालों की तरफदारी करने में मज़ा आने लगा। उन्होंने उसी तरह ऊँचे स्वर में कहा, ‘‘ठीक तो कहता है। फिर बचेगा क्या ? अब मान जाइए सिंह साहब, ढाई रुपये पर बात टूटने दीजिए। न आपकी रही, न इनकी।’’ कहकर वे उस मोटे आदमी से बोले, ‘‘जाओ, पचीस रुपये इसी वक्त सिंह साहब के हवाले करो...और कुछ मिठाई–विठाई भी।’’

  भागते हुए आदमी को सिंह साहब ने पुकारकर कहा, ‘‘ए देखो, मिठाई–विठाई मत लाना।’’ उन्होंने जनसाधारण को अपनी बात ठण्डे ढंग से समझाई, ‘‘साली रेंडी के तेल में बनी है कि महुए के तेल में–क्या पता ? बकरी की लेंड़ी–जैसी गँधाती है।’’

  रुप्पन बाबू और नज़दीक आ गए। घरेलू बातें होने लगीं। उन्होंने पूछा, ‘‘कोठी के क्या हाल हैं !’’

  वे बड़े अफ़सोस के साथ बोले, ‘‘कोठी नहीं, अब तो उसे मकान ही कहिए।’’ कहकर वे चुप हो गए। फिर मरी–मरी आवाज़ में कहने लगे, ‘‘अधूरा पड़ा है। सोचता हूँ, इसी हालत में नीलाम कर दूँ।’’

  रंगनाथ भीतर–ही–भीतर खौल रहा था। मन्दिर में गालियाँ सुनने के बाद उसका मन किसी से लड़ने को उतावला था। उसने कहा, ‘‘इतनी–इतनी रिश्वत लेकर भी आपकी कोठी नहीं बन पायी ?’’

  सिंह साहब इस बात से नाराज़ नहीं हुए। सिर्फ़ भौंह के इशारे से उन्होंने रुप्पन बाबू से पूछा कि ये कौन हैं। रुप्पन बाबू ने बताया कि हमारे दादा हैं–फूफा के लड़के। इनकी बात का बुरा न मानना चाहिए। कुछ ज़्यादा पढ़े–लिखे हैं, इसलिए कभी–कभी उल्टी बातें करने लगते हैं। उन्होंने आश्वासन दिया, ‘‘पर कोई बात नहीं, जैसे भी हों, घर के आदमी हैं।’’

  रंगनाथ ने होंठ दबाए और एक लम्बी साँस खींची। सिंह साहब ने उन्हें समझाना शुरू किया, ‘‘वे दिन लद गए भैया ! कोठीवाला ज़माना गया। घूस से अब कोठी नहीं बनती। घर पर छप्पर बना रहे, यही बहुत है। देख नहीं रहे हो, रेट की क्या हालत है ? दस–दस चालान लिखते–लिखते हाथ घिस गए और मिला क्या ? बगला मारा पखना हाथ।’’

  मोटा आदमी लौट आया। आकर उसने पचीस रुपये के नोट सिंह साहब के हाथ में रख दिए। नोट एक–एक रुपये के थे। अपनी बात रोककर उन्होंने नोटों को दो बार क़ायदे से गिना। एक नोट कुछ ज़्यादा गन्दा हो गया था, उसे बदलवाया। फिर कमीज़ के अन्दर बनियानवाली जेब में उन्हें धीरे–से रख लिया।

  रंगनाथ उनका मुँह देख रहा था। वे बोले, ‘‘हालत देख ली ज़माने की ? पहले पता लग जाता कि घूस लेनेवाले हाकिम हैं तो हज़ार आदमी घेर लेते थे। पैसा देते थे और अहसान ऊपर से मानते थे। अब कोई पास नहीं फटकता। कोई आया भी तो, जैसे ये रुप्पन बाबू हैं न, वैसा ही कोई आदमी साथ लेकर आता है। मुरव्वत में मामला बिगड़ जाता है।’’

  रुप्पन बाबू को समझाते हुए उन्होंने फिर कहा, ‘‘क्या हुआ था दीनानाथ तहसीलदार के साथ ? जानते हैं आप ? कभी वैद्यजी से पूछिएगा। चार महीना यहीं शिवपालगंज में आकर बैठे रहे। किसी ने एक कौड़ी नहीं दी। तब एक दिन इजलास में ही गरम हो गए। दो–चार वकील सामने खड़े थे। उनसे बोले कि माजरा क्या है ? क्या लोग इस धोखे में पड़ गए कि मैं पैसा नहीं छूता ? अगर ऐसा है तो आप लोग तहसील के आख़िरी छोर तक ऐलान करा दें कि मैं घूस लेता हूँ। कोई धोखे में न रहे !

  ‘‘तिस पर भी लोग समझे कि मज़ाक है। उनका मुँह ही ऐसा था कि ईमानदार दिखते थे। किसी को इत्मीनान ही न हो कि ये घूस चाहते हैं। बाद में जब बड़े–बड़े आदमी बीच में आए, खुद बैदजी ने चार–छ: जगह कहा, तब कहीं लोग सिफ़ारिशें छोड़कर उनके पास नोट लेकर आने लगे।

  ‘‘अब बताइए रुप्पन बाबू, कहीं इस तरह से पैसा इकट्ठा होता है ? इस तरह तो, बस, नमक–रोटी चल जाए, इतना बहुत है।

  ‘‘घूस लेना भी अब बड़ी ज़लालत का काम है। उसमें कुछ बचा नहीं है। लेनेवाले और न लेनेवाले अब समझ लो, बराबर ही हैं। सबकी हालत खराब है।’’

  उनकी बात पड़ोस की दुकान पर होनेवाले गुलगपाड़े के कारण टूट गई। किसी ने कहा, ‘चल गई ! चल गई !’ जिसका मतलब था, लाठी चल गई।

  ‘क्या मामला है ?’, ‘क्या मामला है ?’ कहते हुए कई लोग दुकानों पर झपटने लगे। एक आदमी ने ऐसा दिखाया जैसे सारा मामला बर्फ़ियों के थाल में ही कहीं छिपा हो। उसने वहाँ से एक मुट्ठी बर्फ़ी झपटकर उठा ली और आवाज़ लगायी, ‘‘क्या मामला है ?’’ कुछ देर तक मामले की छानबीन इसी ढंग से होती रही। किसी को लड्डुओं में मामला छिपा हुआ नज़र आया, किसी को बताशों में। अच्छा–खासा गोलमाल मचा हुआ था।

  अचानक दो–तीन सिपाही हाथों में बेंत लपलपाते हुए मौक़े पर प्रकट हो गए। बेंतों के इस्तेमाल में उन्होंने विवेक से नहीं, बल्कि उदारता से काम लिया और इस तरह थोड़ी देर में कुछ ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि कहने को हो गया कि स्थिति क़ाबू में आ चुकी है। भीड़ कुछ तितर-बितर हो गई। जिस दुकान पर मुख्य घटना हुई थी उसका मालिक पीठ पर पड़े हुए बेंत की चोट सहलाता हुआ सिसक रहा था। एक तरफ़ छोटे पहलवान, जोगनाथ और सनीचर खड़े थे। रुप्पन और रंगनाथ भी उनके सामने आकर खड़े हो गए। स्टेज तैयार हो गया।

  एक सिपाही ने पूछा, ‘‘बोल बे, क्या हुआ ? पीठ को इस तरह सहला रहा है जैसे किसी ने ऐटम बम दाग़ दिया हो।’’

  दुकानदार ने सिसकना बन्द कर दिया और जनता को सम्बोधित करते हुए बोला, ‘‘जो हुआ सो हुआ, अब हमें कुछ नहीं कहना है।’’

  छोटे पहलवान अपनी जगह खड़े–खड़े हाथ की कोहनी को मल–मलकर धूल की बत्तियाँ निकाल रहे थे। उसी को देखते हुए बोले, ‘‘इस तरह कोई गँजहों को चूना नहीं लगा सकता। हमारे रुपये का हिसाब तो पड़ा ही है।’’

  रुप्पन बाबू अब मैदान में उतर आए। मत्थे पर गिरी हुई जुल्फ़ों को पीछे झटककर उन्होंने सिपाहियों पर अपने पढ़े–लिखे होने का रोब डाला। कहा, ‘‘ये पहलवान हमारे साथ हैं। इन लोगों को यतीम समझकर मनमाना न कर बैठना। बात ठीक से चलेगी तो हम पूरा–पूरा सहयोग देंगे। ज़रा भी टेढ़े–मेढ़े चले तो कॉलिज का सात सौ इस्टूडेण्ट कल ही मैदान में उतर आएगा।’’

  एक सिपाही बोला, ‘‘आप अभी कुछ मत बोलिए भाई साहब। हम आपको पहचान रहे हैं। जो होगा, ठीक ही होगा।’’

  इसके बाद वह दुकानदार की ओर घूमकर बोला, ‘‘तुम्हारा क्या बयान है ?’’

  दुकानदार चौकन्ना हो गया। उसका हाथ पीठ से अपने–आप ही हट गया। बोला, ‘‘बयान ? बयान तो मैं न दूँगा सरकार ! बयान तो तभी होगा जब हमारा वकील भी मौजूद होगा।’’

  सिपाही ने धमकाकर कहा, ‘‘अबे, तेरा बयान कौन लिख रहा है ? मैं तो पूछता हूँ, हुआ क्या ?’’

  वह बोला, ‘‘हुआ यह धर्मावतार कि वे पहलवान पहले आकर पीछे मोढ़े पर बैठ गए। इन्होंने दो पत्ते पालक के खाए, फिर दो पत्ते कचालू के। कचालू का दूसरा पत्ता खा रहे थे तभी ये इधरवाले दो गँजहे आ गए।’’ उसने सनीचर और जोगनाथ को टेढ़ी निगाह से देखकर कहा, ‘‘इन लोगों ने आध–आध पाव बर्फ़ी माँगी। इन्हें बर्फ़ी दी गई।’’

  सिपाही ने छोटे पहलवान को देखकर कहा, ‘‘यह सब ठीक है ?’’

  छोटे पहलवान, जैसे गाली दे रहे हों, बोले, ‘‘ठीक है।’’

 

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