Rag darbari, p.87

Rag Darbari, page 87

 

Rag Darbari
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  पैदावार अच्छी हुई, पर जैसाकि लोग समझते थे, ऐसा अचानक ही नहीं हुआ। अच्छी पैदावार के पीछे इन घटनाओं या घटनाओं के अभाव का भी हाथ था।

  अच्छी पैदावार पर किसानों ने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया, क्योंकि वे बुरी पैदावार पर भी ध्यान नहीं देते थे, पर बहुत–से दूसरे वर्ग ताली बजा–बजाकर नाचने लगे। नेता बोले कि यह हमारे व्याख्यान का नतीजा है, विकास अधिकारी आँकड़ों की मार्फ़त कहने लगे कि सब हमारे प्रयासों से हुआ है। सरकारी क्षोत्रों में लोग एक–दूसरे को बधाइयाँ देने लगे।

  अच्छी पैदावार का एक नतीजा यह भी निकला कि गयादीन को मुक़दमेबाज़ी से कुछ राहत मिली। कर्ज़ की वसूली के लिए उन्होंने कुछ दावे दायर कर रखे थे। उनमें प्रतिवादियों ने रुपये देकर सुलह कर ली। बहुत–से किसान अपनी ओर से रुपिया लेकर उनके यहाँ आने लगे और शादी–ब्याह का मौसम निकट होने के बावजूद रुपये की वसूली बढ़ी, निकासी कम हुई।

  एक दिन वे सात–आठ किसानों से घिरे हुए अपने हिसाब–किताब में व्यस्त थे कि उन्होंने देखा, वैद्यजी उनके घर की ओर आ रहे हैं।

  यह इतिहास था। बड़े आदमियों का जीवन–चरित्र ही हमारे यहाँ इतिहास माना जाता है और अगर उसकी परिभाषा न बदली तो भविष्य में हाई स्कूल में लड़कों की वार्षिक परीक्षा में अवश्य पूछा जाएगा कि ‘‘वैद्यजी के जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना क्या थी ?’’ और वे उत्तर में लिखेंगे, ‘‘वे फ़लाँ तारीख़ सन् फ़लाँ को अपना दरवाज़ा छोड़कर गयादीन नामक एक महासामन्त के घर पर गए थे।’’ इसी के साथ दूसरा सवाल होगा, ‘‘इस घटना का कारण क्या था ?’’ और लड़के जवाब लिखेंगे, ‘‘इस घटना का कारण उनके बड़े लड़के बद्री पहलवान का आचरण और गयादीन की लड़की बेला का दुराचरण था।’’

  जैसा एक महापुरुष दूसरे महापुरुष के साथ सुलूक करता है, गयादीन ने कुछ–कुछ उसी तरह वैद्यजी का स्वागत किया। एकान्त हो गया। वैद्यजी बोले, ‘‘एक बहुत महत्त्वपूर्ण विषय पर आपसे बात करने आया हूँ।’’

  गयादीन कुछ नहीं बोले। जो बात करने आया है, वह उनके चुप रहने पर भी अपनी बात तो कहेगा ही, वे जानते थे। कुछ क्षणों की ख़ामोशी के बाद वैद्यजी बोले, ‘‘जातिप्रथा के बारे में आपकी क्या राय है ?’’

  गयादीन के चेहरे पर उलझन का एक जाल–सा फैल गया। उन्होंने कहा, ‘‘भगवान की देन है। उन्होंने आपको ब्राह्‌मण बनाया है। मैं बनिया हूँ।’’

  ‘‘मैं यह नहीं मानता।’’ वैद्यजी मुस्कराकर बोले, ‘‘जाति–पाँति के कारण ही हमारे देश की यह दुर्दशा हुई है। इसीलिए मैं अपने पुत्रों का अन्तर्जातीय विवाह करना चाहता हूँ। किसी–न–किसी को इस दिशा में भी आगे तो आना ही पड़ेगा। महात्माजी कहा करते थे...।’’

  गयादीन ने हाथ उठाकर उन्हें आगे बात करने से रोका। कहा, ‘‘लड़कों का बिरादरी के बाहर ब्याह करना हो तो कर लो महाराज ! पर इतने समझदार आदमी होकर महात्माजी को इन लड़के–लड़कियों के साथ न घसीटो।’’

  वैद्यजी लड़खड़ा गए। बोले, ‘‘मैं तो एक बात कह रहा था।’’

  ‘‘मैं भी।’’ कहकर गयादीन चुप हो गए।

  थोड़ी देर ख़ामोशी रही। सामने, नीम के पेड़ के नीचे एक भैंस बँधी हुई खूँटे के आसपास चक्कर काट रही थी और मुँह से तरह–तरह की आवाज़ें निकाल रही थी। उसे एक प्रेमी की फ़ौरन ज़रूरत थी। अगर कोई इन्सान जानवरों की बोली समझता होता तो उसे भैंस की चीख़–पुकार में किसी ऐसे फ़िल्मी गाने की बेचैनी का अहसास हो सकता था जिसे हीरोइन ने हीरो की अनुपस्थिति में भरे–बाज़ार तड़प–तड़पकर गाया हो। जैसा भी हो, वैद्यजी और गयादीन के बीच की ख़ामोशी को तोड़ने के लिए इसके सिवाय वहाँ उस समय कोई दूसरी आवाज़ नहीं थी।

  कुछ देर बाद वैद्यजी ही बोले, ‘‘तो अन्तर्जातीय विवाह के बारे में आपकी क्या राय है ?’’

  वे सिर झुकाए बैठे हुए थे। सुनकर उन्होंने धीरे–से गरदन उठायी और थोड़ी देर भैंस की उछल–कूद विरक्त भाव से देखते रहे। उधर ही देखते हुए बोले, ‘‘महाराज, ये बाँभन–ठाकुरों के घर की बातें हैं। इसमें हम बनिया–बक्काल क्या सलाह दे सकते हैं ?’’

  वैद्यजी मुस्कराते हुए बोले, ‘‘आप कैसी बातें करते हैं, गयादीनजी ? यह हम दोनों के परिवार का प्रश्न है। इसमें आप कुछ न बोलेंगे तो और कौन बोलेगा ?’’

  गयादीन ने अब अपना मुँह वैद्यजी की ओर धीरे–से घुमाया। जब वैद्यजी का चेहरा फोकस में आ गया तो उन्होंने अपनी सूनी और उदास निगाह ऐसे भाव से, जिसमें कोई लेन–देन न था, उस पर केन्द्रित कर दी। पूछा, ‘‘इसका मेरे परिवार से क्या मतलब महाराज ?’’

  वैद्यजी ने आश्चर्य के साथ अपनी भौंहें ऊपर चढ़ा लीं। बोले, ‘‘तो आप कुछ नहीं जानते ?’’

  गयादीन वैसे ही बैठे रहे। उनकी ख़ामोशी ने बताया, वे कुछ नहीं जानते।

  वैद्यजी अब तेज़ रफ़्तार से बोलने लगे, ‘‘बद्री को यही पसन्द है। सोलह वर्ष की अवस्था पा लेने पर पुत्र के साथ भी मित्र–जैसा व्यवहार करना पड़ता है। इसीलिए मैंने कोई आपत्ति नहीं प्रकट की। उसने सम्भवत: कन्या के विचार भी जान लिये हैं। अब आपको भी कोई आपत्ति न होनी चाहिए।’’

  इस बार भैंस इतने ज़ोर से उछली कि लगा वह खूँटे के साथ उड़कर आसमान में पहुँच जाएगी। पूरे माहौल पर ऐतराज़–सा दिखाते हुए गयादीन ने भौंहें सिकोड़ीं। पर खीझ प्रकट किये बिना ही बोले, ‘‘मेरी आपत्ति क्यों होगी ? आपके लड़के जहाँ चाहें ब्याह करें, मुझे क्यों बीच में लपेटते हो महाराज ?’’

  वैद्यजी ऊब चुके थे। उन्होंने कहा, ‘‘मैं आपको लपेट नहीं रहा हूँ। कन्या तो आपकी ही है। इसीलिए आपसे बात कर रहा हूँ, पर आप जान–बूझकर अनजान बन रहे हैं। सोते को जगाया जा सकता है, पर कोई झूठमूठ सोने के बहाने पड़ा हो तो उसे कैसे जगाया जाए... !’’

  गयादीन ने विरोध में हाथ उठाकर उन्हें टोकना चाहा, पर वे कहते रहे, ‘‘जब बद्री ने निश्चय ही कर लिया है और पूरे समाज में बात फैल गई है, तो हमारा यही कर्त्तव्य है कि शान्तिपूर्वक इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लें। यह एक आदर्श विवाह माना जाएगा। दोनों सुख से रहेंगे। बद्री को मैं राजनीति में काढ़ रहा हूँ। यूनियन का मैनेजिंग डायरेक्टर उसे बना ही दिया है। कन्या को भी कुछ दिन बाद समाजसुधारक के कार्यों में लगा देंगे। महिलाओं का एक बोर्ड है। उसमें उसे कोई पद दिला देंगे। मोटर मिलती है। चपरासी साथ रहता है। कुछ समय बाद ए. मे. ले. का टिकट भी दिलाया जा सकता है। पति–पत्नी दोनों मिलकर सुखपूर्वक देश–सेवा करेंगे। हमें और क्या चाहिए ?’’

  वैद्यजी ने अपने उत्साह के कारण ध्यान नहीं दिया कि यह सुनते–सुनते गयादीन का चेहरा रुआँसा हो आया है। गयादीन ने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘महाराज, मेरी बनी हुई बात न बिगाड़ो। मेरी बिटिया पर ऐसे ही क्या कम मुसीबतें हैं ! माँ बचपन ही में मर गई थी। किसी तरह पाल–पोसकर बड़ा किया है। शहर में अगरवाल वैश्यों का एक परिवार है। वे लोग इसका उद्धार करने को तैयार हैं। लड़का पढ़ा–लिखा, नौकरी में लगा है। पन्द्रह दिन बाद ही ब्याह की तिथि है। अब इस बीच में तुम सब बड़े आदमी अगर झूठमूठ उसकी बदनामी करने लगोगे तो उसका क्या होगा महाराज ? खुद सोच लो। मेरी बिटिया पर कलंक लगाओगे तो तुम चाहे जितने बड़े नेता होओ, नरक में कीड़े–मकोड़े की तरह जाकर घिसटोगे। अब ज़्यादा हमारा मुँह न खुलवाओ।’’

  वैद्यजी सन्नाटे में आ गए। गयादीन ने फिर कहा, ‘‘तुम्हारे ये साँड–क्या नाम है उनका–छोटे रुप्पन, सनीचर-फ़टीचर न जाने मेरी बिटिया के बारे में क्या–क्या बातें उड़ाते रहते हैं। तुम भी इतने बड़े ज्ञानी होकर इन लौंडे–लफाड़ियों–जैसी बातें करने लगे हो। अब महाराज, यही विनती है कि तुम खुद अपना मुँह बन्द कर लो और अपने इन साँडों को हटक दो। लड़की का किसी प्रकार ब्याह निबट जाय, तब तक के लिए शान्त बने रहो। आज तुम्हारा जमाना है, सभी लोग तुम्हारे पाँव पर लोट रहे हैं। पर अपने को इतना न भूल जाओ। भले आदमियों को भी शिवपालगंज में रह लेने दो।’’

  वैद्यजी चुपचाप बैठे हुए सुनते रहे। भैंस की उछल–कूद को निर्विकार भाव से देखते रहने की भी एक हद होती है। उस हद तक पहुँचकर, एक दहाड़ के साथ आसमान तक उछलने का उसका एक नया किन्तु असफल प्रयास देखते हुए वे उठकर खड़े हो गए। चलते–चलते बोले, ‘‘आप अपने निर्णय के अनुसार कन्या का विवाह कर डालें और मेरे योग्य कोई सेवा हो तो बतायें। मेरी बात को भूल जाएँ। मुझे ग़लत सूचना दी गई थी। इसका मुझे खेद है।’’

  पर गयादीन से बेला के भविष्य के बारे में उन्होंने जो सुना था, उस पर उन्हें खेद न था। वे बहुत हल्के और प्रसन्न होकर वापस लौटे।

  वैद्यजी के चले जाने पर गयादीन थोड़ी देर तक उसी तरह बैठे रहे। उनका चेहरा चतुर आदमी जैसा नहीं लगता था। उस पर उलझन और परेशानी थी, जो पहली निगाह में देखने से जान पड़ता था, भैंस की गर्मी को लेकर है। पर इतिहास साक्षी है कि भैंसों ने आज तक मानव–जाति को किसी भारी उलझन में नहीं डाला है, गयादीन की उलझन भी इस समय भैंस के कारण नहीं, बेला के भविष्य को लेकर थी।

  उन्होंने वैद्यजी से एक अधूरी बात को पूरी बनाकर कहा था। बेला की शादी अभी तय नहीं हुई थी। जो नौजवान शिवपालगंज में कुछ दिनों से ‘बच्चे न पैदा करने से लाभ’ बताने के लिए आने लगा था, उसी को गयादीन ने दामाद की हैसियत से ख़रीदने की बात सोची थी। वे उससे मिलने के दूसरे दिन ही शहर जाकर उसके बाप से मिल आए थे। उसकी वहाँ पर कपड़े की एक दुकान थी जो पहले अच्छी चलती थी, पर दो साल से पड़ोस में एक पंजाबी दुकानदार के आ जाने से बिगड़ गई थी। दुकान एक ऐसी सड़क पर थी जिस पर कुछ दूर आगे लड़कियों का एक कॉलिज और उससे भी कुछ आगे यूनिवर्सिटी थी। कई साल से कॉलिज और यूनिवर्सिटी की लड़कियाँ छोटे-मोटे कपड़ों की खरीदारी नौजवान के बाप की दुकान पर करती आ रही थीं। ये लड़कियाँ फैशनेबुल थीं। और बेवकूफ़ थीं और पता नहीं क्यों, रोज़ खरीदते रहने पर भी, उन्हें कपड़ों की हमेशा कमी बनी रहती थी। इस कारण नौजवान के बाप की दुकान बड़ी धूम से चलती थी और उसी की आमदनी से नौजवान ने एम. ए. पास करके बच्चों की रोकथामवाली नौकरी हासिल कर ली थी और नौजवान की बहन ने बी. ए. पास करके एक अमीर शौहर हथिया लिया था। पर पंजाबी की दुकान बिलकुल पड़ोस में खुल जाने से पूरा नक्शा ही बदल गया था, क्योंकि उस दुकान पर एक बाईस साल का खूबसूरत लड़का सवेरे से ही दाढ़ी–मूँछ साफ़ करके, तंग पतलून और चुस्त टी–शर्ट पहनकर बैठ जाता था और लड़कियाँ अब उधर ही जाकर कपड़े खरीदने लगी थीं। वह उन्हें ‘बहनजी’ कहकर सम्बोधित करता, फ़िल्मी तारिकाओं के नाम पर डिज़ाइन किये हुए कपड़े दिखाता और नये क़िस्म की चोलियों और पायजामों के बारे में लड़की को इक्का–दुक्का देखकर कभी–कभी बिना माँगी हुई सलाह देने लगता था। अब लड़कियाँ जिस रफ्तार से कपड़े खरीद रही थीं उससे यही लगता था कि कपड़ों की उन्हें पहले से भी ज़्यादा कमी है; और शायद वे दिन को नया कपड़ा लेती हैं और रात में उसे उतारकर किसी को दे देती हैं। संक्षेप में नौजवान के बाप की हालत बिगड़ रही थी।

 

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