Rag darbari, p.4

Rag Darbari, page 4

 

Rag Darbari
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  रुप्पन बाबू बुरा मान गए, ‘‘आप तो मेरे कॉलिज के पीछे पड़े हैं।’’

  ‘‘मुझे लगता है कि रामाधीन के घर यह चिट्ठी आपके कॉलिज के किसी लड़के ने भेजी है। आपका क्या ख्याल है?’’

  ‘‘आप लोगों की निगाह में सारे जुर्म स्कूली लड़के ही करते हैं।’’ रुप्पन बाबू ने फटकारते हुए कहा, ‘‘अगर आपके सामने कोई आदमी ज़हर खाकर मर जाए, तो आप लोग उसे भी आत्महत्या न मानेंगे। यही कहेंगे कि इसे किसी विद्यार्थी ने ज़हर दिया है।’’

  ‘‘आप ठीक कहते हैं रुप्पन बाबू, ज़रूरत पड़ेगी तो मैं ऐसा ही कहूँगा। मैं बख्तावरसिंह का चेला हूँ। शायद आप यह नहीं जानते।’’

  इसके बाद सरकारी नौकरों की बातचीत का वही अकेला मज़मून खुल गया कि पहले के सरकारी नौकर कैसे होते थे और आज के कैसे हैं। बख्तावरसिंह की बात छिड़ गई। दारोग़ा बख्तावरसिंह एक दिन शाम के वक़्त अकेले लौट रहे थे। उन्हें झगरू और मँगरू नाम के दो बदमाशों ने बाग में घेरकर पीट दिया। बात फैल गई, इसलिए उन्होंने थाने पर अपने पीटे जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी।

  दूसरे दिन दोनों बदमाशों ने जाकर उनके पैर पकड़ लिये। कहा, ‘‘हुज़ूर माई–बाप हैं। गुस्से में औलाद माँ–बाप से नालायक़ी कर बैठे तो माफ़ किया जाता है।’’

  बख्तावरसिंह ने माँ–बाप का कर्त्तव्य पूरा करके उन्हें माफ़ कर दिया। उन्होंने औलाद का कर्त्तव्य पूरा करके बख्तावरसिंह के बुढ़ापे के लिए अच्छा–ख़ासा इन्तज़ाम कर दिया। बात आई–गई हो गई।

  पर कप्तान ने इस पर एतराज़ किया कि, ‘‘टुम अपने ही मुकडमे की जाँच कामयाबी से नहीं करा सका टो डूसरे को कैसे बचायेगा ? अँढेरा ठा टो क्या हुआ ? टुम किसी को पहचान नहीं पाया, टो टुमको किसी पर शक करने से कौन रोकने सकटा !’’

  तब बख्तावरसिंह ने तीन आदमियों पर शक किया। उन तीनों की झगरू और मँगरू से पुश्तैनी दुश्मनी थी। उन पर मुक़दमा चला। झगरू और मँगरू ने बख्तावरसिंह की ओर से गवाही दी, क्योंकि मारपीट के वक्त वे दोनों बाग़ में एक बड़े ही स्वाभाविक कारण से, यानी पाख़ाने की नीयत से, आ गए थे। तीनों को सज़ा हुई। झगरू–मँगरू के दुश्मनों का यह हाल देखकर इलाके की कई औलादें बख्तावरसिंह के पास आकर रोज़ प्रार्थना करने लगीं कि माई–बाप, इस बार हमें भी पीटने का मौक़ा दिया जाए। पर बुढ़ापे का निबाह करने के लिए झगरू और मँगरू काफ़ी थे। उन्होंने औलादें बढ़ाने से इन्कार कर दिया।

  रुप्पन बाबू काफ़ी देर हँसते रहे। दारोग़ाजी खुश होते रहे कि रुप्पन बाबू एक क़िस्से में ही खुश होकर हँसने लगे हैं, दूसरे की ज़रूरत नहीं पड़ी। दूसरा क़िस्सा किसी दूसरे लीडर को हँसाने के काम आएगा। हँसना बन्द करके रुप्पन बाबू ने कहा, ‘‘तो आप उन्हीं बख्तावरसिंह के चेले हैं !’’

  ‘‘था। आज़ादी मिलने के पहले था। पर अब तो हमें जनता की सेवा करनी है। गरीबों का दुख–दर्द बँटाना है। नागरिकों के लिए...।’’

  रुप्पन बाबू उनकी बाँह छूकर बोले, ‘‘छोड़िए, यहाँ मुझे और आपको छोड़कर तीसरा कोई भी सुननेवाला नहीं है।’’

  पर वे ठण्डे नहीं पड़े। कहने लगे, ‘‘मैं तो यही कहने जा रहा था कि मैं आज़ादी मिलने के पहले बख्तावरसिंह का चेला था, अब इस ज़माने में आपके पिताजी का चेला हूँ।’’

  रुप्पन बाबू विनम्रता से बोले, ‘‘यह तो आपकी कृपा है, वरना मेरे पिताजी किस लायक हैं ?’’

  वे उठ खड़े हुए। सड़क की ओर देखते हुए, उन्होंने कहा, ‘‘लगता है, रामाधीन आ रहा है। मैं जाता हूँ। इस डकैतीवाली चिट्ठी को ज़रा ठीक से देख लीजिएगा।’’

  रुप्पन बाबू अठारह साल के थे। वे स्थानीय कॉलिज की दसवीं कक्षा में पढ़ते थे। पढ़ने से, और खासतौर से दसवीं कक्षा में पढ़ने से, उन्हें बहुत प्रेम था; इसलिए वे उसमें पिछले तीन साल से पढ़ रहे थे।

  रुप्पन बाबू स्थानीय नेता थे। उनका व्यक्तित्व इस आरोप को काट देता था कि इण्डिया में नेता होने के लिए पहले धूप में बाल सफ़ेद करने पड़ते हैं। उनके नेता होने का सबसे बड़ा आधार यह था कि वे सबको एक निगाह से देखते थे। थाने में दारोग़ा और हवालात में बैठा हुआ चोर–दोनों उनकी निगाह में एक थे। उसी तरह इम्तहान में नक़ल करनेवाला विद्यार्थी और कॉलिज के प्रिंसिपल उनकी निगाह में एक थे। वे सबको दयनीय समझते थे, सबका काम करते थे, सबसे काम लेते थे। उनकी इज़्ज़त थी कि पूँजीवाद के प्रतीक दुकानदार उनके हाथ सामान बेचते नहीं, अर्पित करते थे और शोषण के प्रतीक इक्केवाले उन्हें शहर तक पहुँचाकर किराया नहीं, आशीर्वाद माँगते थे। उनकी नेतागिरी का प्रारम्भिक और अन्तिम क्षेत्र वहाँ का कॉलिज था, जहाँ उनका इशारा पाकर सैकड़ों विद्यार्थी तिल का ताड़ बना सकते थे और ज़रूरत पड़े तो उस पर चढ़ भी सकते थे।

  वे दुबले–पतले थे, पर लोग उनके मुँह नहीं लगते थे। वे लम्बी गरदन, लम्बे हाथ और लम्बे पैरवाले आदमी थे। जननायकों के लिए ऊल–जलूल और नये ढंग की पोशाक अनिवार्य समझकर वे सफ़ेद धोती और रंगीन बुश्शर्ट पहनते थे और गले में रेशम का रूमाल लपेटते थे। धोती का कोंछ उनके कन्धे पर पड़ा रहता था। वैसे देखने में उनकी शक्ल एक घबराए हुए मरियल बछड़े की–सी थी, पर उनका रोब पिछले पैरों पर खड़े हुए एक हिनहिनाते घोड़े का–सा जान पड़ता था।

  वे पैदायशी नेता थे क्योंकि उनके बाप भी नेता थे। उनके बाप का नाम वैद्यजी था।

  3

  दो बड़े और छोटे कमरों का एक डाकबँगला था जिसे डिस्ट्रिक्ट बोर्ड ने छोड़ दिया था। उसके तीन ओर कच्ची दीवारों पर छप्पर डालकर कुछ अस्तबल बनाए गए थे। अस्तबलों से कुछ दूरी पर पक्की ईंटों की दीवार पर टिन डालकर एक दुकान–सी खोली गई थी। एक ओर रेलवे–फाटक के पास पायी जानेवाली एक कमरे की गुमटी थी। दूसरी ओर एक बड़े बरगद के पेड़ के नीचे एक कब्र–जैसा चबूतरा था। अस्तबलों के पास एक नये ढंग की इमारत बनी थी जिस पर लिखा था, ‘सामुदायिक मिलन–केन्द्र, शिवपालगंज।’ इस सबके पिछवाड़े तीन–चार एकड़ का ऊसर पड़ा था जिसे तोड़कर उसमें चरी बोई गई थी। चरी कहीं–कहीं सचमुच ही उग आयी थी।

  इन्हीं सब इमारतों के मिले–जुले रूप को छंगामल विद्यालय इंटरमीजिएट कॉलिज, शिवपालगंज कहा जाता था। यहाँ से इंटरमीजिएट पास करनेवाले लड़के सिर्फ़ इमारत के आधार पर कह सकते थे कि हम शांतिनिकेतन से भी आगे हैं; हम असली भारतीय विद्यार्थी हैं; हम नहीं जानते कि बिजली क्या है, नल का पानी क्या है, पक्का फ़र्श किसको कहते हैं; सैनिटरी फिटिंग किस चिड़िया का नाम है। हमने विलायती तालीम तक देसी परम्परा में पायी है और इसीलिए हमें देखो, हम आज भी उतने ही प्राकृत हैं ! हमारे इतना पढ़ लेने पर भी हमारा पेशाब पेड़ के तने पर ही उतरता है, बन्द कमरे में ऊपर चढ़ जाता है।

  छंगामल कभी ज़िला–बोर्ड के चेयरमैन थे। एक फर्जी प्रस्ताव लिखवाकर उन्होंने बोर्ड के डाकबँगले को इस कॉलिज की प्रबन्ध–समिति के नाम उस समय लिख दिया था जब कॉलिज के पास प्रबन्ध–समिति को छोड़कर और कुछ नहीं था। लिखने की शर्त के अनुसार कॉलिज का नाम छंगामल विद्यालय पड़ गया था।

  विद्यालय के एक–एक टुकड़े का अलग–अलग इतिहास था। सामुदायिक मिलन– केन्द्र गाँवसभा के नाम पर लिये गए सरकारी पैसे से बनवाया गया था। पर उसमें प्रिंसिपल का दफ्तर था और कक्षा ग्यारह और बारह की पढ़ाई होती थी। अस्तबल–जैसी इमारतें श्रमदान से बनी थीं। टिन–शेड किसी फौजी छावनी के भग्नावशेषों को रातोंरात हटाकर खड़ा किया गया था। जुता हुआ ऊसर कृषिविज्ञान की पढ़ाई के काम आता था। उसमें जगह–जगह उगी हुई ज्वार प्रिंसिपल की भैंस के काम आती थी। देश में इंजीनियरों और डॉक्टरों की कमी है। कारण यह है कि इस देश के निवासी परम्परा से कवि हेैं। चीज़ को समझने के पहले वे उस पर मुग्ध होकर कविता कहते हैं। भाखड़ा–नंगल बाँध को देखकर वे कह सकते हैं, ‘‘अहा ! अपना चमत्कार दिखाने के लिए, देखो, प्रभु ने फिर से भारत–भूमि को ही चुना।’’ अॉपरेशन–टेबल पर पड़ी हुई युवती को देखकर वे मतिराम–बिहारी की कविताएँ दुहराने लग सकते हैं।

  भावना के इस तूफान के बावजूद, और इसी तरह की दूसरी अड़चनों के बावजूद, इस देश को इंजीनियर पैदा करने हैं, डॉक्टर बनाने हैं। इंजीनियर और डॉक्टर तो असल में वे तब होंगे जब वे अमरीका या इंगलैण्ड जाएँगे, पर कुछ शुरुआती काम–टेक–अॉफ स्टेजवाला–यहाँ भी होना है। वह काम भी छंगामल विद्यालय इंटर कॉलिज कर रहा था।

  साइंस का क्लास लगा था। नवाँ दर्ज़ा। मास्टर मोतीराम, जो एक तरह बी. एस–सी. पास थे, लड़कों को आपेक्षिक घनत्व पढ़ा रहे थे। बाहर उस छोटे–से गाँव में छोटेपन की, बतौर अनुप्रास, छटा छायी थी। सड़क पर ईख से भरी बैलगाड़ियाँ शकर मिल की ओर जा रही थीं। कुछ मरियल लड़के पीछे से ईख खींच–खींचकर भाग रहे थे। आगे बैठा हुआ गाड़ीवान खींच–खींचकर गालियाँ दे रहा था। गालियों का मौलिक महत्त्व आवाज़ की ऊँचाई में है, इसीलिए गालियाँ और जवाबी गालियाँ एक–दूसरे को ऊँचाई पर काट रही थीं और दर्ज़े में खिड़की के रास्ते घुसकर पार्श्व–संगीत का काम कर रही थीं। लड़के नाटक का मज़ा ले रहे थे, साइंस पढ़ रहे थे।

  एक लड़के ने कहा, ‘‘मास्टर साहब, आपेक्षिक घनत्व किसे कहते हैं ?’’

  वे बोले, “आपेक्षिक घनत्व माने रिलेटिव डेंसिटी।”

  एक दूसरे लड़के ने कहा, ‘‘अब आप, देखिए, साइंस नहीं अंग्रेज़ी पढ़ा रहे हैं।’’

  वे बोले, ‘‘साइंस साला अंग्रेज़ी के बिना कैसे आ सकता है ?’’

 

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