Rag darbari, p.15

Rag Darbari, page 15

 

Rag Darbari
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  रंगनाथ को बताया गया कि वह लड़का दस साल की उम्र में ही इतना तेज़ दौड़ने लगा था कि पन्द्रह साल के लड़के भी उसे पकड़ नहीं पाते थे। ग्यारह साल की उम्र में वह रेल में बिना टिकट चलने और टिकट–चेकर को धता देने में उस्ताद हो गया था। एक साल बाद वह मुसाफ़िरों के देखते–देखते उनका सामान कुछ इस तरह से गायब करने लगा जैसे लोकल अनीस्थीशिया देकर होशियार सर्जन अॉपरेशन कर डालते हैं और मेज़ पर लेटे हुए आदमी को पता ही नहीं चलता कि शरीर का एक हिस्सा कहाँ चला गया। इस तरह की चोरी में उसकी ख्याति सबसे ज़्यादा इस आधार पर हुई कि वह कभी पकड़ा नहीं गया। बाद में, चौदह वर्ष की अवस्था में, जब वह पकड़ा गया, तो पता चला कि वह ऊपर का शीशा तोड़कर दरवाजे़ की भीतरी सिटकनी खोलने की कला में दक्ष हो चुका है, बँगलों में चोरियाँ करता है और चोरियाँ भी रोशनदान से नहीं, बल्कि उपर्युक्त तरकीब से दरवाज़ा खोलकर, भले आदमियों की तरह क़ायदे के रास्ते मकान में घुसकर करता है।

  इस लड़के की प्रशंसा करते–करते किसी आदमी ने बहराम चोट्टा का भी ज़िक्र किया जो किसी ज़माने में उस क्षेत्र में ऐतिहासिक महत्त्व का चोर माना जाता था। पर उसका नाम सुनते ही एक लड़के ने बड़े ज़ोर–शोर से विरोध किया और बतर्ज़ विधान–सभा की स्पीचों के, बिना किसी तर्क के, सिर्फ़ आवाज़ ऊँची करके, साबित करने की कोशिश की कि ‘‘बहराम चोट्टा भी कोई चोट्टा था ! रामस्वरूप ने बारह साल की उम्र में जितना उठाकर फेंक दिया, वह बहराम चोट्टा के जनम–भर भी हिलाए न हिलेगा।’’

  रंगनाथ को इस बातचीत में पीढ़ी-संघर्ष की झलक दीख पड़ी। उसने सनीचर से पूछा, ‘‘क्या आजकल के चोट्‌टे सचमुच ही ऐसे तीसमारखाँ हैं? पहले भी तो एक–से–एक ख़तरनाक चोट्‌टे हुआ करते थे।’’

  सनीचर उस उम्र का था जिसे नयी पीढ़ीवाले पुरानी के साथ और पुरानी पीढ़ीवाले नयी के साथ लगाते हैं और आयु को लेकर पीढ़ियों में वैज्ञानिक विभाजन न होने के कारण जिसे दोनों वर्ग अपने से अलग समझते हैं। इसी कारण उसके ऊपर किसी भी पीढ़ी का समर्थन करने की मजबूरी न थी। साहित्य और कला के सैकड़ों अर्ध–प्रौढ़ आलोचकों की तरह सिर हिलाकर, अपनी राय देने से कतराते हुए, वह बोला, ‘‘भैया रंगनाथ, पहले के लोगों का हाल न पूछो। यहीं ठाकुर दुरबीनिसंह थे। मैंने उनके दिन भी देखे हैं। पर आजकल के लौण्डों के भी हाल न पूछो !’’

  आज से लगभग तीस साल पहले, जब आज की पीढ़ी पैदा नहीं हुई थी और हुई भी थी तो :

  यशस्वी रहें हे प्रभो ! हे मुरारे !

  चिरंजीव रानी व राजा हमारे !

  या

  ‘खुदाया, जार्ज पंजुम की हिफ़ाज़त कर, हिफ़ाज़त कर’ का कोरस गाने के लिए हुई थी, शिवपालगंज के सबसे प्रमुख गँजहा का नाम ठाकुर दुरबीनसिंह था। उनके माँ–बाप ने उनके नाम के साथ ‘दुरबीन’ लगाकर शायद चाहा था कि उनका लड़का हर काम वैज्ञानिक ढंग से करे। बड़े होकर उन्होंने ऐसा ही किया भी। जिस चीज़ में उन्होंने दिलचस्पी दिखायी, उसे बुनियाद से पकड़ा। उन्हें अंग्रेज़ी कानून कभी अच्छा नहीं लगा। इसलिए जब महात्मा गाँधी सिर्फ़ नमक–कानून तोड़ने के लिए दाण्डी–यात्रा की तैयारी कर रहे थे उन दिनों दुरबीनसिंह ने इण्डियन पेनल कोड की सभी दफाओं को एक–एक करके तोड़ने का बुनियादी काम शुरू कर दिया था।

  स्वभाव से वे बड़े परोपकारी थे। परोपकार एक व्यक्तिवादी धर्म है और उसके बारे में हर व्यक्ति की अपनी–अपनी धारणा होती है। कोई चींटियों को आटा खिलाता है, कोई अविवाहित प्रौढ़ाओं का मानसिक स्वास्थ्य ठीक रखने के लिए अपने मत्थे पर ‘प्रेम करने के लिए हमेशा तैयार’ की तख्ती लगाकर घूमता है, कोई किसी को सीधे रिश्वत न लेनी पड़े, इसलिए रिश्वत देनेवालों से खुद सम्पर्क स्थापित करके दोनों पक्षों के बीच दिन–रात दौड़–धूप करता रहता है। ये सब परोपकार–सम्बन्धी व्यक्तिगत धारणाएँ हैं और दुरबीनसिंह की भी परोपकार के विषय में अपनी धारणा थी। वे कमज़ोर आदमियों की रक्षा करने के लिए हमेशा व्याकुल रहते थे। इसीलिए लड़ाई–भिड़ाई के हर मौके पर वे बिना बुलाए पहुँच जाते थे और कमज़ोर की तरफ़ से लाठी चला दिया करते थे। उन शान्तिपूर्ण दिनों में ये सब बातें बँधी दर से चलती थीं और सारे इलाके में मशहूर था कि शहर में जैसे बाबू जयरामप्रसाद वकील मारपीट के मुक़दमे में खड़े होने के लिए पचास रुपया हर पेशी पर लेते हैं, उसी तरह दुरबीनसिंह भी मुक़दमे के पहलेवाली मारपीट के लिए पचास रुपया लेते हैं। बड़ी लड़ाइयों में, जहाँ आदमी जमा करने पड़ते, यह रकम प्रति व्यक्ति के हिसाब से बढ़ती जाती थी, पर उसकी भी दरें निश्चित थीं और उसमें कोई धोखेबाजी नहीं थी। उनके आदमियों को गोश्त और शराब भी देनी पड़ती थी, पर वे स्वयं इन मौकों पर गोश्त नहीं खाते थे और शराब नहीं पीते थे। इससे उनका पेट हल्का और दिमाग साफ़ रहता था जो कि युद्ध के समय बड़ी ही वांछनीय स्थिति है; और चूँकि गोश्त और शराब देखकर भी ‘नहीं’’ कहनेवाला आदमी सदाचारी कहलाता है, इसलिए वे सदाचारी कहलाते थे।

  दुरबीनसिंह की एक विशेषता यह भी थी कि वे सेंध नहीं लगाते थे। वे दीवार फाँदने के उस्ताद थे। और कहीं भी आसानी से पोल जम्प के चैम्पियन हो सकते थे। शुरू में रुपये की कमी होने पर वे कभी–कभी दीवार फाँदने का काम करते थे। बाद में वे ऐसा काम सिर्फ़ कभी–कभी अपने नये चेलों को व्यावहारिक प्रशिक्षण देने की नीयत से ही करने लगे थे। यह वह ज़माना था जब चोर चोर थे और डाकू डाकू। चोर घर में सिर्फ़ चोरी करने के लिए घुसते थे और एक पाँच साल का बच्चा भी पैर फटफटा दे तो वे जिस सेंध से अन्दर आए थे उसी से विनम्रतापूर्वक बाहर निकल जाते थे। डाकुओं की दिलचस्पी मारपीट में ज़्यादा होती थी, माल लूटने में कम। इस परिप्रेक्ष्य में दुरबीनसिंह ने अपने इलाके में चोरी करते समय घर में जग जानेवालों को पीटने का चलन चलाया और यह तरीक़ा उनके समसामयिक चोरों में बड़ा ही लोकप्रिय हो गया, इस तरह दुरबीनसिंह ने चोरों और डकैतों के बीच के फ़ासले को कम करने का एक बुनियादी काम किया और उनकी पद्धतियों (मेथडालॉजी) में क्रान्तिकारी परिवर्तन किए।

  पर वक़्त की बात ! (शिवपालगंज में जो बात भी वक़्त के ख़िलाफ़ पड़ती थी, वक़्त की बात हो जाती थी) यही ठाकुर दुरबीनसिंह अपने नशेबाज भतीजे का एक ज़ोरदार तमाचा बुढ़ापे में खाकर कुएँ की जगत से नीचे गिर गए। उनकी रीढ़ टूट गई। कुछ दिनों तक कोने में रखी हुई अपनी लाठी को देख–देखकर दुरबीनसिंह अपने भतीजे के मुँह में उसे ठूँस देने का संकल्प करते रहे और अन्त में लाठी और भतीजे के मुँह को यथावत् छोड़कर वे शिवपालगंज की मिट्टी को वीर–विहीन बनाते हुए वीरगति को प्राप्त हुए, यानी, ‘टें’ हो गए।

  सनीचर ने दुरबीनसिंह के विषय में अपना संस्मरण सुनाया :

  ‘‘भैया रंगनाथ, अँधेरी रात थी और मैं भोलूपुर के तिवारियों के बाग के बीच से आ रहा था। तब हमारा भी बचपना था और हम बाघ–बकरी को एक निगाह से देखते थे। देह में ऐसा जोश कि हवा में डण्डा मारते और पत्ता भी खड़क जाए तो छिटककर माँ की गाली देते थे। तो, अँधेरी रात थी और हम हाथ में डण्डा लिये सटासट चले आ रहे थे, तभी एक पेड़ के पीछे से किसी ने कहा, ‘खबरदार !’

  ‘‘हमने समझा कि कोई जिन्न आ गया। उनके सामने तो लाठी–डण्डा सभी बेकार। मैंने लाल लँगोटवाले का ध्यान किया, पर भैया, लाल लँगोटवाला तो तभी काम देगा जब भूत, प्रेत, जिन्न से मुचेहटा हो। यहाँ पेड़ के पीछे से एक काला–कलूटा, गँठी देह का जवान निकलकर मेरे सामने आया और बोला, ‘जो कुछ हो, चुपचाप रख दो। धोती–कुरता भी उतार दो।’

  ‘‘मैंने मारने को डण्डा ताना तो क्या देखा कि चारों तरफ़ से पाँच–छ: आदमी घेरा डाले हुए हैं। सब बड़ी–बड़ी लाठियाँ और भाले लिये हुए। हमने भी कहा कि चलो सनीचर, तुम्हारी भी जोड़-बाक़ी आज से फिस्स। डण्डा मेरा तना–का–तना रह गया, चलाने की हिम्मत न पड़ी !

  ‘‘एक बोला, ‘तान के रह क्यों गया ? चलाता क्यों नहीं ? असल बाप की औलाद हो तो चला दे डण्डा।’

  ‘‘बड़ा गुस्सा लगा। पर भैया, मैं जब गुस्से में बोला तो रोना आ गया। मैंने कहा, ‘जान न लो, माल ले लो।’

  ‘‘दूसरे ने कहा, ‘साले की अधेला–भर की जान, उसके लिए सियार-जैसा फें–फें कर रहा है। इतना माल छोड़े दे रहा है। अच्छी बात है। धर दे सब माल।’

  ‘‘बस भैया, एक झोला था, उसमें सत्तू था। एक बढ़िया मुरादाबादी लोटा था। मामा के घर से मिला था। फस्ट किलास सूत की डोरी। लोटा क्या था, बिलकुल बाल्टी था। कुएँ से दो सेर पानी खींचता था। पूड़ियाँ थीं असली घी की। तब यह बनास्पती साला कहाँ चला था ! सब उन्होंने गिनकर धरा लिया। फिर धोती उतरवायी, टेंट में एक रुपया था, उसे भी छीन लिया। कुरता और लँगोटा पहने हुए जब मैं खड़ा हो गया, तो एक ने कहा, ‘अब मुँह में ताला लगाए चुपचाप अपने घर चले जाओ। चूँ–भर किया तो इसी बाग़ में खोदकर गाड़ दूँगा।’

  ‘‘मैं चलने को हुआ तो एक ने पूछा, ‘कहाँ रहता है ?’

  ‘‘मैंने कहा, ‘गँजहा हूँ।’

  ‘‘फिर न पूछो, भैया ! सब लुटेरे खड़े–खड़े मुँह तकने लगे। किसी एक ने मुझसे शिवपालगंज के मुखिया का नाम पूछा, दूसरे ने लम्बरदार का, तीसरे ने कहा, ‘ दुरबीनसिंह को जानते हो ?’

  ‘‘मैंने कहा, ‘ दुरबीनसिंह की तरफ़ से लाठी भी चलाने जा चुका हूँ। जब रंगपुर में जमावड़ा हुआ था! सुलह न होती तो हज़ारों लोग वहीं खेत हो जाते। दुरबीनिसंह को गाँव के रिश्ते काका कहता हूँ।’

 

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