Rag darbari, p.48

Rag Darbari, page 48

 

Rag Darbari
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  ‘‘अब बेचारा बाँभन क्या करे ! कुछ मन्त्र–जैसा बुदबुदाने लगा। इस पर हमारे पट्‌ठे ने हँसी–हँसी में ही उसे लँगड़ी देकर चित कर दिया। उसकी जाँघ की हड्‌डी टूट गई।

  ‘‘फिर तो रोना–पीटना मच गया। बाँभन चिल्लाने लगा। उधर उसकी जोरू भी चिंघाड़ने लगी कि देखो, यह मेरी इज़्ज़त ले रहा है। अब बोलो रंगनाथ बाबू, दुनिया में दुश्मन किसके नहीं होते ? इसी बात पर रपट लिखा दी गई और हमारा पट‌्ठा फँस गया।

  ‘‘अब बेटा बैठे हैं पुलिस के दरबे में...।’’

  बद्री पहलवान मौज में आकर हँसे। रंगनाथ ने कहा, ‘‘पर बद्री दादा, यह तो ठीक नहीं है। बेचारे की बीवी को भी...और उस बेचारे को भी....।’’

  वे हँसते रहे। बोले, ‘‘रंगनाथ बाबू, चाहे कहो चाहे न कहो, यही सच है। अपनी जोरू को जो क़ाबू में न रख पाया, वह उमर–भर बेचारा ही रहेगा। उसके ऊपर कहाँ तक रोओगे ? फिकिर तो हमें अपने पट्ठे की है। हँसी–मसखरी में ही हवालात तक पहुँच गया।’’

  बद्री पहलवान के बाहर चले जाने के कारण रंगनाथ आज छत पर अकेला ही रह गया था। इन दिनों जाड़ा अपनी तेज़ी पर था और उसका आनन्द लेने की नीयत से बद्री ने अपनी चारपाई कमरे के बाहर बरामदे में डलवा ली थी। रंगनाथ कमरे के अन्दर सोता था।

  रात के लगभग ग्यारह बजे थे। उसे नींद नहीं आ रही थी।

  चारपाई के पास लकड़ी के बक्से पर एक बैटरीवाला रेडियो था। लकड़ी के बक्से में कॉलिज के लिए किताबें आयी थीं। किताबें प्रिंसिपल के घर में और बक्स मरम्मत के बाद वैद्यजी के घर में आ गया था। रेडियो भी कॉलिज का था जो रंगनाथ के यहाँ आ जाने के बाद, वैद्यजी के घर पर मँगा लिया गया था। उसके आते ही रुप्पन बाबू वाला करिश्मा, जिसे कान में लगाकर स्थानीय रेडियोस्टेशन के हाल–चाल लिये जा सकते थे, अनावश्यक हो गया था। रेडियो को रात के कुछ घण्टों को छोड़कर हर समय चाहे कोई कमरे में हो या न हो, बेतक़ल्लुफ़ी से बजने दिया जाता था।

  इस समय रेडियो पर शास्त्रीय संगीत का एक प्रोग्राम अपनी आख़िरी मंज़िल पर पहुँच रहा था। दंगे की नौबत आ गई थी। वायलिन और तबलेवाले एक–दूसरे पर दो सौ मील फ़ी घण्टे की रफ़्तार से टूट रहे थे। लगता था, उनकी मोटरें टकराकर चूर–चूर होने ही वाली हैं। हाहाकार मचा था। अचानक वायलिन–वादक ने बड़े ज़ोर से एक ‘किर्रर्रर्रर्र’ की आवाज़ निकाली जो बरछी की तरह रंगनाथ के कलेजे में घुस गई। तब तक तबले का एक धड़ाका हुआ। वह संगीत–नाटक अकादमी तक की नींव हिला देने के लिए काफ़ी था। उसने उछलकर रेडियो की ओर देखा कि कहीं वह टूटकर बिखर तो नहीं गया है, पर वह अपनी जगह पर कैसाबियाब्लांका की तरह अडिग खड़ा था और संगीत–जगत् के घमासान जंग की आवाज़ों को पूर्ववत् प्रसारित कर रहा था। अब वायलिनवाला दुम दबाने लगा था और तबलेवाला जोश और ज़िद के साथ हमलावर होने लगा था। रंगनाथ ने थकान की एक साँस ली और रेडियो बन्द कर दिया।

  अँधेरा ! जाड़े की रात अपने पूरे ऐश्वर्य से प्रकट हुई। ऐसे मौक़े पर आदमी को ईश्वर के होने में भले ही विश्वास न हो, भूतों के बारे में विश्वास होने लगता है। रंगनाथ को एकदम से डर तो नहीं, पर कुछ अजीब–सा लगा जो ईमानदारी से पूछा जाय तो डर का ही दूसरा नाम था।

  पर डर अपने पूरे तीखेपन से हावी नहीं हो सका, क्योंकि उसी समय उसने रुप्पन बाबू के बारे में सोचना शुरू कर दिया और रुप्पन बाबू की याद आते ही उसे बेला नाम की लड़की याद आयी जिसे रंगनाथ ने कभी देखा न था, पर उसने सुन रखा था कि रुप्पन बाबू ने उसे एक प्रेम–पत्र लिखा है।

  उसे मालूम न था कि प्रेम–पत्र कितना लम्बा, चौड़ा और गहरा है, पर उड़ती हुई ख़बरों से उसे पता चला था कि उसमें सिनेमा के गानों के कुछ टुकड़े जोड़कर वाक्य बनाए गए हैं। मशहूर था कि उसे पहले बेला की बुआ ने घर के एक कोने में पड़ा हुआ पाया था। उसने उसे बाद में गयादीन के सामने पढ़ाया था। दो–तीन शुरुआती वाक्यों तक तो गयादीन की समझ में कुछ भी नहीं आया, पर उसके बाद ही उन्होंने पढ़ा, ‘‘मुझको अपने गल्ले (अर्थात् गले) लगा लो, ओ मेरे हमराही !’’ इसका अध्ययन करते ही उनके ज्ञान के कपाट धड़ाम से खुल गए और वे समझ गए कि यह सुझाव किसी ने बेला के विचारार्थ पेश किया है। आख़िरी पंक्ति तक पहुँचते–पहुँचते इस दस्तावेज़ की असलियत बिलकुल साफ़ हो गई थी, क्योंकि उसमें कहा था कि, ‘‘ये मेरा प्रेम–पत्र पढ़कर कि तुम नाराज़ न हो, कि तुम्मेरि जिन्दगी हो, कि तुम्मेरि बन्दगी हो।’’ दस्तावेज़ के लेखक थे–‘‘श्री रु.।’’

  सुना गया था कि गयादीन के अलावा इसे प्रिंसिपल साहब ही देख सके थे और वही भी शायद इसलिए कि गयादीन ने रुप्पन बाबू के नैतिक उत्थान–पतन को, न जाने क्यों, प्रिंसिपल साहब के साथ जोड़ दिया था। प्रिंसिपल ने उन्हें समझाने की कोशिश की थी कि यह प्रेम–पत्र नहीं है, बल्कि उच्चकोटि की कविताओं का एक संग्रह है जिसका साहित्यिक महत्त्व ‘रु.’ लिखा होने के कारण ही कम नहीं हो जाता; पर इस सान्त्वना के बावजूद गयादीन इस लिखा–पढ़ी को बदचलनी का सबूत मानते रहे और जब प्रिंसिपल साहब ने उन्हें कई कविताओं के कुछ ऐसे ही टुकड़े सुनाकर समझाने की कोशिश की कि साहित्य में ये चीज़ें इफ़रात से पायी जाती हैं तो गयादीन कहने लगे कि तुम्हारा साहित्य भी तुम्हारी बदचलनी का ही सबूत है। दोनों ने अन्त में यही तय किया कि इस दस्तावेज़ की बात कही नहीं जाएगी।

  उसी के दूसरे दिन शिवपालगंज में कई ख़बरें फैलीं। एक ख़बर यह थी कि खन्ना मास्टर के दल के किसी लड़के ने बेला को एक प्रेम–पत्र लिखा है और उसमें झूठमूठ रुप्पन का नाम जोड़ दिया है। दूसरी खबर यह थी कि बेला ने रुप्पन को एक प्रेम–पत्र लिखा था, जिसका जवाब रुप्पन ने भेजा था पर वह जवाबी पत्र गयादीन के हाथों पकड़ा गया और बेइज़्ज़ती से मारा गया। तीसरी ख़बर, जो सबसे ज़्यादा प्रसिद्ध हुई, यह थी कि बेला एक बदचलन लड़की है।

  यह इस तीसरी ख़बर का ही करिश्मा था कि रंगनाथ ने इस समय डरना छोड़कर बेला के बारे में सोचना शुरू कर दिया था। उस दिन मेले से लौटते समय उसने रुप्पन बाबू से प्रेम–पत्र के बारे में जो सुना था, उसके बाद उसकी हिम्मत नहीं हुई थी कि वह रुप्पन से इस विषय पर दुबारा बात करे। अब इस समय के एकान्त में बेला के बारे में उसकी जिज्ञासा शान्त करने के लिए सिर्फ़ कल्पना थी, हस्तमैथुन था और कुण्ठा थी और चूँकि काफ़ी हद तक ये चीज़ें हमारी कलाओं की प्रेरक शक्तियाँ हैं, इसलिए इस समय रंगनाथ एक कलाकार की हैसियत से इन क्षणों को जी रहा था।

  कैसी होगी वह ? ‘मधुमती’ में वैजयन्तीमाला की तरह ? ‘गोदान’ में शुभा खोटे जैसी। ‘अभियान’ में वहीदा रहमान जैसी ? नहीं। ये सब तो मादरे–हिन्द–जैसी हो चुकी हैं। बेला अभी बहुत ताज़ी होगी। कैसी होगी ? नहीं मालूम, पर जैसी भी हो जो भी हो वह ‘खुदा की क़सम लाजवाब’ होगी। एक फिल्मी गाने का यह टुकड़ा रंगनाथ के गले में हड्‌डी–जैसा अटक गया, पर वह मुस्कराया। अँधेरे में वह एक बहुत खूबसूरत, लगभग डेढ़ इंच चौड़ी मुस्कान मुस्कराया।

  बेला के बारे में उसने बहुत सोचा। इतना सोचा कि हर नाप और वज़न के सैकड़ों स्तन और नितम्ब उसके दिमाग़ में उभरने और अस्त होने लगे। वे जोड़ों में प्रकट हुए, गुच्छों की शक्ल में फूले और एक–दूसरे को धक्के देकर भाग गए। रंगनाथ ने बहुत चाहा कि इनमें से एक भरी–पूरी लड़की की तस्वीर निकल आए, पर वैसा न हो सका; उसकी कल्पना ने एक बार तो लड़की के पूरे धड़ को पकड़ लिया, पर उससे कुछ न हुआ क्योंकि उसका चेहरा गै़रहाज़िर बना रहा। कुछ देर में उसके दिमाग़ में कुछ छुटे हुए स्तनों के गोल दायरे–भर रह गए। अन्त में एक बार तनकर, फिर देह को ढीला करके वह रज़ाई के अन्दर ऊँघ गया।

  दूसरी रात को रंगनाथ जब छत पर अकेला लेटा, तो उसे बेला की याद नहीं आयी। उसे वैद्यजी का गुस्से में तपा हुआ वीर्यमय चेहरा याद आता रहा।

  दिन में सनीचर और कालिकाप्रसाद के प्रयासों से बनाए गए कोअॉपरेटिव फ़ार्म का उद्‌घाटन हुआ था। उद्घाटन के लिए आए हुए अफ़सर से वैद्यजी ने अपनी कोअॉपरेटिव यूनियन के ग़बन का जिक्र करते हुए उस प्रस्ताव का भी हवाला दिया था जिसके द्वारा सरकार से माँग की गई थी कि वह ग़बन की रक़म अनुदान के रूप में कोअॉपरेटिव यूनियन को दे दे। वैद्यजी ने ठण्डे सुरों में समझाया था कि अगर सरकार ऐसा नहीं करती तो उससे यह निष्कर्ष निकलेगा कि सरकारी अधिकारी सहकारिता के आन्दोलन को आगे नहीं बढ़ाना चाहते।

  यह अफ़सर निश्चय ही डेल कार्नेगी की किताबें पढ़कर आया होगा, तभी वह वैद्यजी की हर बात पर कहता रहा, ‘‘आप ठीक कहते हैं किन्तु....।’’ इस जुम्ले को उसने सात बार दोहराया। जब उसने आठवीं बार मुँह खोलकर कुछ आवाज़ निकाली तो उससे, ‘आपको अनुदान मिलेगा’ जैसा सुरीला संगीत नहीं निकला, बल्कि फिर वही पुराना जुम्ला नमूदार हुआ, ‘‘आप ठीक कहते हैं, किन्तु...।’’

  सुनते ही वैद्यजी दुर्वासा का क्रोध, हिटलर की तानाशाही और जवाहरलाल नेहरू की झुँझलाहट को एक में मिलाकर उस अफ़सर पर बिगड़ पड़े–

  ‘‘...आप लोग देश का उद्धार इसी प्रकार करेंगे ? यह ‘किन्तु’, ‘परन्तु,’ ‘तथापि ’ यह सब क्या है ? श्रीमान्, यह नपुंसकों की भाषा है। अकर्मण्य व्यक्ति इसी प्रकार अपने–आपको और देश को वंचित करते हैं। आपका निर्णय स्पष्ट होना चाहिए। किन्तु ! परन्तु ! थू: !’’

  इसके बाद वैद्यजी ने देश की दुर्दशा पर एक व्याख्यान दे डाला था। व्याख्यान दे चुकने के बाद वे एकदम से शान्त नहीं हुए, थोड़ी देर भुनभुनाते रहे। अफ़सर भी, विनम्रता के बावजूद, भुनभुनाता रहा। फिर दूसरे लोग भी भुनभुनाने लगे। सनीचर का जलसा पहले ही खत्म हो चुका था, इसलिए इस भुनभुनाहट ने उसकी सफलता पर कोई असर नहीं डाला, पर अन्त में बोलबाला भुनभुनाहट का ही रहा।

 

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