Rag darbari, p.54

Rag Darbari, page 54

 

Rag Darbari
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  काँसों की फुनगियाँ एक जगह पगडण्डी के आर–पार झूल रही थीं। उन्हें हटाकर निकल जाने के बजाय रंगनाथ ने उन्हें पकड़ लिया और एक मोटी–सी गाँठ लगा दी। रास्ता कुछ हद तक साफ़ हो गया। कुछ आगे काँस के एक दूसरे झाड़ में भी उसने इसी तरह की एक गाँठ लगा दी।

  वकील का बाप खड़ा होकर रंगनाथ की इस हरकत को देखता रहा। जब काँस की फुनगी पर एक बड़ी–सी गाँठ लग गई तो उसने पूछा, ‘‘यह क्या है ?’’

  ‘‘क्या ?’’

  ‘‘यह गाँठ जो लगा दी है ?’’

  ‘‘वह ? गाँठ ?’’ वह बताने जा रहा था कि यह रास्ते पर काँस को फैलने से रोक देगी। पर वकील के बाप का चेहरा देखकर वह रुक गया। उससे लगता था कि वह किसी भारी रहस्य का पता जानना चाहता है। रंगनाथ ने मन में सोचा, ऐसा चाहते हो तो वही सही। उसने कहा, ‘‘किसी से कहना नहीं। मामा ने बताया कि रास्ते में काँस का एक जंगल है। वहाँ फुनगी में गाँठ लगा देना। हनुमानजी प्रसन्न होते हैं।’’

  वकील के बाप ने संशयपूर्वक कहा, ‘‘पहले कभी नहीं सुना था।’’

  ‘‘मैंने भी नहीं सुना था।’’ लापरवाही से कहकर वह आगे बढ़ा। वकील का बाप अब उसके पीछे हो लिया था और वकालत के बारे में फिर से बातें करने लगा था, ‘‘ए.मे., बी.ए. में कुछ नहीं रखा है। पहले हमारे यहाँ एक कविता कही जाती थी कि क्या है, देखो, याद नहीं आ रही है, हाँ, आखिर में है कि ‘पास हैं मिडिल मुलु घास छीलि आवै ना।’ अब उसी को बदलकर कहा जा सकता है कि ‘बी. ए. भये पास मुलु घास छीलि आवै ना।’ आजकल ए. मे., बी. ए. टकासेर बिकते हैं। तुमको तो वकालत पास करना था। वकील बनकर ठाठ से कचहरी में तख्त डालकर बैठते। जिसका मामा गँजहा हो, ऊपर से वैद्य और फिर नेता मुक़दमे की क्या कमी ! रोज़ दस–बीस मुक़दमे तो तुम्हारे मामा के ही लगे रहते होंगे।’’

  रंगनाथ ने इस सलाह के बारे में कोई राय नहीं ज़ाहिर की। बस, चलते–चलते रुककर उसने काँसों के झाड़ में तीसरी गाँठ लगा दी और कहा, ‘‘जय हनुमान की !’’

  वकील का बाप इस बार खड़ा हो गया था। रंगनाथ के मुँह से हनुमान का नाम निकलते ही उसके हाथ भी काँस के एक झाड़ पर पहुँच गए और एक गाँठ लगाने में व्यस्त हो गए। रंगनाथ को उसने समझाया, ‘‘सोचा, मैं भी एक गाँठ लगा दूँ। कुछ टेंट से थोड़े ही जाता है !’’

  रंगनाथ ने गम्भीरतापूर्वक जवाब दिया, ‘‘जय हनुमानजी की !’’

  वकील के बाप ने तत्काल गाँठ को प्रणाम करके दोहराया, ‘‘जय हनुमानजी की !’’

  एक काली–कलूटी औरत सिर पर एक गन्दी–सी पोटली रखे हुए उनके पीछे–पीछे आ रही थी। पहले वह काफ़ी दूर थी, पर गाँठ लगाने के लिए जब वे रुके तो वह उनके पास पहुँच गई। वह लगभग पैंतालीस साल की थी, पर चेहरे से बुड्‌ढी लगती थी। वैसे चेहरे के नीचे निगाह डालने पर मैदान काफ़ी भरा–पूरा नज़र आता था। उसके सलूके के दो बटन खुले थे, पर उसके मुँह के ऊपर मीराबाई की–सी तन्मयता थी और निश्चय ही उसे यह अहसास नहीं था कि उसके दो बटन खुले हुए हैं, या बटन खुल जाने से उसका कोई नफ़ा-नुकसान भी है। रंगनाथ ने पहली निगाह में ही यह प्राकृतिक दृश्य देख लिया और उनके बाद वह वकील के बाप को देखने लगा; पर वकील के बाप ने यह नहीं देखा कि वह उसे देख रहा है, क्योंकि वह खुद उसी प्राकृतिक दृश्य को देखने में तल्लीन हो गया था जिसे रंगनाथ पहले देखकर छोड़ चुका था।

  औरत ने बकरी की तरह मिमियाते हुए पूछा, ‘‘क्या कर रहे हो भैया ?’’

  रंगनाथ को बोलने की ज़रूरत नहीं पड़ी। वकील का बाप पहले ही बोल पड़ा, ‘‘दिखायी नहीं देता ? हनुमानजी की गाँठ लगा रहे हैं।’’

  औरत ने गठरी सिर से उतारकर नीचे रख दी और कहा, ‘‘हम ज़नाना हैं। हमारे लिए कोई मनाही तो नहीं है ?’’

  ‘‘भगवान् के दरबार में तो सब एक हैं–क्या मर्दाना, क्या ज़नाना !’’ वकील के बाप ने आत्म–विश्वास से कहा, जैसे इस वक़्त वह सीधे भगवान् का दरबार देखकर लौट रहा हो। औरत ने अपने दोनों हाथ काँस के एक झाड़ में खोंस दिए और श्रद्धापूर्वक बोली, ‘‘जय बजरंगबली की !’’

  बादाम तो नहीं मिला, पर नाई की एक दुकान पर बैठा हुआ सनीचर मिल गया। चिकित्सा-विज्ञान की दुनिया में प्राकृतिक चिकित्सावाले क्लीनिक की जो हैसियत होती है, नाइयों के जगत् में वह हैसियत इस दुकान की थी। यानी, दुकान कहीं नहीं थी और सब जगह थी। गर्द–भरी कच्ची सड़क के किनारे नीम का एक पेड़ था। उसी के नीचे नाई बोरा बिछाकर बैठा था। उसके आगे एक ईंट गड़ी हुई थी। ईंट के ऊपर सनीचर न बैठा था, न खड़ा था, सिर्फ़ था।

  नाई उसके पीछे बालों पर मशीन चला रहा था। सिर के किनारे का झाड़–झंखाड़ कट चुका था, सिर के असली हिस्से पर बड़े–बड़े बाल इस तरक़ीब से छोड़ दिए गए थे कि दूर से गोल टोपी की तरह दिखें। संक्षेप में, सनीचर अंग्रेज़ी ढंग के बाल कटा रहा था।

  उसने रंगनाथ की आवाज़ सुनी और नाई के ज़ोरदार हाथ और मशीन के दबाव के बावजूद सिर को मोड़ा। कनखियों से देखते हुए बोला, ‘‘शिवपालगंज के सब नाई एक जगह ग़मी में चले गए हैं। सोचा कि चलकर एक बार यहीं बाल कटवा लिये जाएँ।’’

  बात कुछ रोब से कही गई थी, जैसे सनीचर हर चौथे दिन बाल कटवाता ही रहता हो। पर सच बात तो यह थी–और इसे रंगनाथ भी जान गया था बालों के मामले में सनीचर का रवैया बिलकुल अपने ढंग का था। यानी साल–भर तक न तो वह खुद उन्हें छूता, न किसी को छूने देता और फिर अचानक किसी दिन वह उन पर एक किनारे से उस्तरा चलवाने के लिए बैठ जाता है। रंगनाथ समझ नहीं पाया कि इस हजामत के पीछे कौन–सी विचारधारा काम कर रही है। वह चुपचाप खड़ा रहा।

  नाई ने रंगनाथ को रुका देखकर बाल काटने बन्द कर दिए और सनीचर की खोपड़ी को दो उँगलियों से ठेलकर कहा, ‘‘उठो ! अब हो गया।’’ सुनते ही वह ईंट के ऊपर एक पाँव टेककर खड़ा हो गया। जेब से एक दुअन्नी निकालकर उसने नाई को दी और जब नाई ने उसे बिना देखे ही खोटी बताकर वापस लौटा दिया तो बिना किसी प्रतिवाद के उसने एक दूसरी दुअन्नी उसके हाथ में टिका दी और रंगनाथ की ओर आँख मारकर इशारे से बताया कि उसने पहले नाई के साथ मज़ाक किया था। इसके बाद जैसे कोई सिपहसालार लड़ाई के मैदान में फ़तह पाकर जिस्म पर दुश्मनों का खून लसेटे हुए, अकड़ के साथ वापस लौट रहा हो, अपने बदन पर बालों के लच्छे बिखराए हुए, वह रंगनाथ के पास आकर खड़ा हो गया। रंगनाथ उससे दो हाथ दूर हट गया। सनीचर ने उससे वहाँ तक आने का कारण पूछा और रंगनाथ ने उसे अपने बादाम–सम्बन्धी अनुभव बताए।

  सनीचर ने कहा, ‘‘शिवपालगंज के बनिया–बक्काल सब मनमाने हो गए हैं। दो छटाँक बादाम तक नहीं रख सकते।’’ फिर जिस तरह दिल्ली से हिन्दुस्तान की गिरी हुई खाद्य–स्थिति के बारे में बार–बार आश्वासन मिलता है, उसने बड़प्पन के साथ कहा, ‘‘पर कोई बात नहीं, कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा।’’

  रंगनाथ को सनीचर की बातचीत में एक नये आत्म–विश्वास की झलक दीख पड़ी जो पिछड़े हुए देशों के विकास के लिए बहुत आवश्यक है। उसने सोचा, ऐसे आदमी को प्लानिंग कमीशन में होना चाहिए। तब तक सनीचर की बातचीत दो–चार मिनट आगे पहुँच गई थी। वह कह रहा था, ‘‘बाबू रंगनाथ, शिवपालगंज अब ठीक होकर रहेगा। इस तरह की मनमानी थोड़े ही चलेगी !’’ रंगनाथ को लगा कि बात अभी शिवपालगंज की दुकानों पर बादाम के अभाव को ही लेकर हो रही है और शायद सनीचर उसे कुछ ज़्यादा खींच रहा है; पर जब उसने आगे की बात सुनी तो उसे यक़ीन हो गया कि इन बातों का बादाम से सम्बन्ध नहीं है; वे सिर्फ़ बातें हैं जो हम लोग, बिना किसी खास मतलब के, एक तरह से यों ही करते रहते हैं।

  ‘‘...बाबू रंगनाथ, तुम समझते क्या हो ? यह शिवपालगंज–क्या कहते हैं उसे–पूरा ऐटम बम है। जब तक नहीं फूटता, तब तक नहीं फूटता। सिलिर-सिलिर करता रहता है। जब भड़ाक से फूटेगा, तब जान पड़ेगा कि ठण्डा था या गरम।’’

  उसने एक पुरानी बात दोहरायी, ‘‘घोड़े की लात घोड़ा ही सह सकता है।’’

  आज सनीचर की हालत अजीब–सी हो रही थी। वह बार–बार मुटि्‌ठयाँभींचता था और मुँह से सिसकारी भरता था। कभी तेज़ चाल चलने लगता, जैसे अभी–अभी वह घोड़े की लात खा चुका हो, पर सह न पाया हो; और कभी मुँह के भीतर कोई बात कहते–कहते उसे फेन की शक्ल में अपने होंठों के कोनों पर फैला लेता। यह सब तो था ही, ऊपर से आज उसने हजामत बनवायी थी। रंगनाथ ने यह सब ध्यान से देखा और सुना, पर समझ नहीं पाया।

  वे आम के एक भारी पेड़ के नीचे से निकले। एक चील बडे़ ज़ोर से बोली। सनीचर ने कहा, ‘‘यह साली भी बिना मतलब टाँय–टाँय कर रही है।’’ उसी साँस में उसने दूसरी एक बात कही, ‘‘रामाधीन बेटा इस बार खुद अखाड़े में उतर रहे हैं।’’

  इन दोनों बातों का सम्बन्ध रंगनाथ की समझ में नहीं आया। उसने पूछा, ‘‘किस अखाड़े में ?’’

  सनीचर ने ताज्जुब के साथ उसे देखा और जवाब देने से कतरा गया। फिर देह पर गिरे हुए बालों को हवा में बिखेरता हुआ बोला, ‘‘होगा, उसका भी इलाज होगा। देखते जाओ। ऐटम बम फूटने दो।’’

  आम का बाग़ ख़त्म हो गया। वे अब वहाँ आ गए थे जहाँ काँसों का जंगल था। पगडण्डी पर रंगनाथ आगे–आगे चला ताकि सनीचर के जिस्म पर गिरे हुए बाल उड़कर उसके ऊपर न आएँ।

  अचानक वह खड़ा हो गया।

  काँस के झाड़ों पर उन्हें एक अनोखा दृश्य दिखायी दिया। रास्ते के किनारे–किनारे, लगभग सौ गज तक काँसों की फुनगियों पर गाँठें बँधी थीं, जैसे कठपुतली के खेल में सिपाही लोग पूरे स्टेज पर मुरैठा बाँधकर तने खड़े हों। एक आदमी काँसों की फुनगी पर एक नयी गाँठ लगा रहा था।

 

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