Rag darbari, p.64

Rag Darbari, page 64

 

Rag Darbari
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  अॉनरेरी मजिस्ट्रेट का इजलास।

  गयादीन की गवाही हो रही थी। जिरह खत्म होने को आ रही थी। अचानक जोगनाथ के वकील ने सवाल किया :

  ‘‘तुम्हारे एक लड़की है ?’’

  ‘‘हाँ।’’

  ‘‘उसका नाम बेला है ?’’

  ‘‘हाँ।’’

  ‘‘उसकी उमर लगभग बीस साल है ?’’

  ‘‘हाँ।’’

  अदालत ने गयादीन को सन्देहपूर्वक, जिस तरह बीस साल की लड़की के बाप को देखना चाहिए, तीखी निगाह से देखा।

  ‘‘तुम्हारे घर पर कोई दूसरी स्त्री भी है?’’

  ‘‘हाँ। मेरी विधवा बहिन है।’’

  ‘‘पर वह हमेशा तुम्हारे यहाँ नहीं रहती है ?’’

  ‘‘नहीं, वह बराबर मेरे ही घर रहती है।’’

  वकील ने गरजकर कहा, ‘‘तुम हलफ़ ले चुके हो, झूठ बोलोगे तो मुक़दमा चल जाएगा। क्या यह सच नहीं है कि तुम्हारी बहिन ज़्यादातर अपनी ससुराल में रहती है और इन दिनों तुम्हारी लड़की घर पर अकेली रहती है ?’’

  गयादीन चुपचाप खड़े रहे। वकील ने गरजकर दोबारा कहा, ‘‘बोलते क्यों नहीं ?’’

  ‘‘क्या बोलूँ ? आप इतना गुस्सा हो रहे हैं कि कुछ बोलना कठिन है।’’

  वकील ने उसी तरह कहा, ‘‘मैं गुस्सा नहीं हो रहा हूँ।’’

  गयादीन कुछ नहीं बोले। तब वकील ने आवाज़ को धीमी बनाकर कहा, ‘‘तुम्हारा क्या जवाब है ?’’

  ‘‘मेरी विधवा बहिन बराबर मेरे घर पर रहती है।’’

  ‘‘तुम्हारी लड़की की शादी हो चुकी है ?’’

  ‘‘नहीं।’’

  ‘‘कब करने का इरादा है ?’’

  ‘‘करनेवाला तो भगवान है।’’

  भगवान का नाम सुनकर अदालत ने अपना सिर ऊपर उठाया। अभी तक अदालत कुछ दूसरे काग़ज़ात देख रही थी जिनका इस मुक़दमे से कोई सम्बन्ध न था। अब उसने वकील से कहा, ‘‘इन सवालों का मुक़दमे से कोई सम्बन्ध नहीं है।’’

  वकील ने कहा, ‘‘श्रीमान, मैं सम्बन्ध बाद में स्थापित करूँगा।’’

  अदालत की शह पाकर पब्लिक प्रॉसीक्यूटर भी अपने गवाह की रक्षा के प्रति सचेत हो गया था। उसने ऐतराज़ किया, ‘‘श्रीमान, ये सवाल अप्रासंगिक हैं।’’

  अदालत ने कड़ी निगाह से पब्लिक प्रॉसीक्यूटर को देखा। यही इस ऐतराज़ का जवाब था।

  उधर जोगनाथ के वकील ने यह देखकर कि अदालत का मूड ख़राब हो रहा है, गयादीन से उनकी लड़की के बारे में वार्तालाप करना बन्द कर दिया। दूसरा गवाह बुलाया गया।

  यह वही गवाह था जिसने जोगनाथ के मकान की तलाशी के समय प्रकट होकर और उसी क्षण वहाँ से भागकर पुलिस को सान्त्वना दी थी कि गवाही में उसे किसी भी समय तलब किया जा सकता है। उसका नाम बैजनाथ था और वह शिवपालगंज के पण्डित राधेलाल का चेला था–वही पण्डित राधेलाल जिन्हें झूठी गवाही देने में उच्चकोटि की दक्षता मिल चुकी थी, जिन्हें आज तक बड़े–से–बड़ा वकील भी जिरह में नहीं उखाड़ सका था और पकड़ में न आनेवाली झूठ बोल सकने के कारण ही पूरे ज़िले के मुक़दमेबाजों और गवाहों में अभूतपूर्व प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके थे। इधर कुछ दिनों से, जब से पूरबवाली प्रेयसी के प्रेम ने उन्हें कुछ–कुछ घरघुस्सा बना दिया था, वे गवाही के सहारे चलनेवाली प्राइवेट प्रैक्टिस के लिए काफ़ी समय नहीं निकाल पाते थे। फलत: उन्होंने पहले की अपेक्षा मुक़दमों में जाना बन्द कर दिया था। बड़े वकीलों और डॉक्टरों की तरह अब वे सामान्य प्रैक्टिस न करके विशेषज्ञोंवाली प्रैक्टिस करते थे, जो अब सिर्फ़ दीवानी के मुक़दमों और उसमें भी उत्तराधिकार के मुक़दमों तक सीमित थी। फौज़दारी के मुक़दमों में झूठी गवाही के स्तर को क़ायम रखने की दृष्टि से पिछले सालों में उन्होंने कुछ चेले तैयार कर लिये थे। उनमें बैजनाथ का स्थान सबसे ऊँचा था।

  बैजनाथ भीखमखेड़ा का रहनेवाला था, पर आसपास के गाँवों में गवाही के उद्देश्य से वह पहले ही मौजूद माना जाता था। इस तरह उसकी प्रैक्टिस भीखमखेड़ा ही में नहीं, आसपास के कई गाँवों में जम गई थी। यह भी सिर्फ़ आकस्मिक था कि जोगनाथ की गिरफ़्तारी के दिन वह शिवपालगंज ही में था, वैसे गवाही देने के लिए उसका वास्तव में वहाँ होना–न–होना अप्रासंगिक था।

  बैजनाथ ने सबूत का पूरा मुक़दमा दोहरा दिया। बताया, जोगनाथ के घर की तलाशी मेरी मौजूदगी में हुई, ये तीन जे़वर मेरे सामने बरामद हुए, इन्हें मेरे सामने मुहरबन्द किया गया, बरामदगी की रिपोर्ट मेरे सामने लिखी गई, इस पर मेरा दस्तख़त मेरे सामने ही हुआ, आदि–आदि।

  जोगनाथ के वकील ने जिरह शुरू की :

  ‘‘तुम भीखमखेड़ा में रहते हो ?’’

  ‘‘जी हाँ।’’

  ‘‘भीखमखेड़ा शिवपालगंज से दो मील है ?’’

  ‘‘मैं नहीं जानता।’’

  ‘‘फिर कितनी दूर है ?’’

  ‘‘शिवपालगंज में नौटंकी होती है तो भीखमखेड़ा में सुनायी देती है।’’

  ‘‘एक मील होगा ?’’

  ‘‘नहीं कह सकता।’’

  ‘‘आधा कोस ?’’

  ‘‘नहीं मालूम।’’

  ‘‘बीस मील।’’

  ‘‘नहीं मालूम। मैंने नापा नहीं है।’’

  अदालत ने गवाह को घूरकर कहा, ‘‘कितना फ़ासला है दोनों गाँवों में ?’’

  ‘‘बीच में कुछ खेत पड़ते हैं।’’

  ‘‘कितने खेत ?’’

  ‘‘दस–बीस–पचास खेत होंगे।’’

  ‘‘सही–सही बताओ, कितने खेत होंगे।’’

  ‘‘नहीं मालूम, मैंने गिना नहीं है।’’

  अदालत ने घूरकर पब्लिक प्रॉसीक्यूटर की तरफ़ देखा। उसने कहा, ‘‘श्रीमन्, गवाह सही कहता है। उसने खेत गिने नहीं हैं। पर दोनों गाँव पास–पास हैं, एक मील के फ़ासले पर हैं–दारोग़ा की ग़वाही में आ गया है।’’

  अदालत ने जोगनाथ के वकील से कहा, ‘‘तब फ़ासले के बारे में जिरह करने की क्या ज़रूरत है ! क्या आप दारोग़ा के बयान को चैलेंज करते हैं ?’’

  ‘‘चैलेंज नहीं करता हूँ श्रीमन्, पर जिरह तो करनी ही पड़ती है।’’

  ‘‘क्यों ?’’

  ‘‘यह दिखाने के लिए कि गवाह की अक़्ल कैसी है!’’

  ‘‘या यह दिखाने के लिए कि खुद आपकी अक़्ल कैसी है ?’’

  अदालत के मुँह से यह बात सुनकर सफ़ाई के वकील का चेहरा तमतमाया, पर तब तक अदालत ज़ोर से हँसने लगी थी जिससे साबित हो गया कि बात अपमान की नहीं, मज़ाक की है। ऐसा होते ही बारी–बारी से जिस–जिसकी समझ में आता गया कि यह मज़ाक था, वह हँसता गया। आख़िर में जोगनाथ का वकील भी हँसा। अदालतों का एक अलिखित कानून है कि अदालत और वकील अकबर–बीरबल–विनोद के पैमाने पर कभी–कभी हाज़िरजवाबी दिखाते हैं और एक–दूसरे से मज़ाक करते हैं। इस अनावश्यक रस्म का पालन हो जाने के बाद अदालत ने वे सब सवाल अस्वीकृत कर दिए जो भीखमखेड़ा और शिवपालगंज के फ़ासले के सिलसिले में किए गए थे। पर ये सवाल तब अस्वीकृत हुए जब उनके जवाब काग़ज़ पर लिखे जा चुके थे।

  बैजनाथ से आगे सवाल होने शुरू हुए :

  ‘‘अब तक पुलिस की ओर से तुम कितने मुक़दमों में गवाही दे चुके हो ?’’

  ‘‘याद नहीं है।’’

  ‘‘मैं कहता हूँ कि तुम अब तक पुलिस की ओर से साठ मुक़दमों में गवाही दे चुके हो।’’

  ‘‘कहते रहिए, मुझे याद नहीं है।’’

  ‘‘इसके पहले भी तुम कभी पुलिस के गवाह बनकर किसी मुक़दमे में आए हो ?’’

  ‘‘पुलिस का गवाह किस चिड़िया का नाम है ?’’

  ‘‘तुम सवाल के जवाब में सवाल मत करो। सीधा जवाब दो।’’

  ‘‘तुम मुझसे तुम–तड़ाक् मत करो। मैं कोई गबडू–घुसडू आदमी नहीं हूँ।’’ यह फटकार सुनकर वकील ने अदालत से रक्षा की प्रार्थना की। अदालत ने कहा, ‘‘सवाल का जवाब ठीक–ठीक दो !’’

  बैजनाथ ने झुककर कहा, ‘‘सवाल भी तो हो ग़रीबपरवर ! ये पूछते हैं कि मैं पुलिस का कितनी बार गवाह रहा हूँ। मैं पुलिस–वुलिस क्या जानूँ ! मैं तो सच्चाई की गवाही देता हूँ। जो मालूम हो उसे कहने में हिचक नहीं, चाहे पुलिसवाला बुला ले, चाहे सफ़ाईवाले बुला लें।’’

  अदालत के कुछ कहने के पहले ही जोगनाथ के वकील को गुस्सा आ गया। वास्तव में वे एक ऐसे वकील थे जो अपने गुस्से के लिए मशहूर थे और उनके दलाल प्राय: नये मुक़दमेबाज़ों को उनका गुस्सा दिखाने के लिए ही इजलासों में पकड़ ले जाया करते थे। गुस्सा ही उनकी विद्या, उनकी बुद्धि, उनका कानूनी ज्ञान, उनका अस्त्र-शस्त्र और कवच था। वही उनका साइनबोर्ड, उनका विज्ञापन, उनका पितु–मातु–सहायक–स्वामि–सखा था। जब वे गुस्सा करते थे तो दूसरे लोग काँपें या नहीं, वे खुद थर–थर काँपने लगते थे; समझदार अदालतें उनके गुस्से से अप्रभावित रहकर चुपचाप काम करती रहती थीं और उसे खाँसने और छींकने की श्रेणी का मामूली व्यवसाय समझकर उस पर कोई राय नहीं देती थीं। अगर किसी अदालत ने उनके गुस्से का बुरा माना तो उस अदालत की निन्दा में वकील साहब बार असोसिएशन में भाषण देते थे और असोसिएशन प्रस्ताव पास करता था।

  यह अदालत समझदार थी, इसलिए उसने इस गुस्से पर ध्यान नहीं दिया। उधर वकील ने दहाड़कर पूछा, ‘‘मेरा सीधा–सा सवाल है, काइयाँपंथी मत दिखाओ, बोलो, सरकारी मुक़दमों में सबूत की ओर से तुमने अब तक कितनी बार गवाही दी है ?’’

  बैजनाथ ने कहा, ‘‘तो मेरा भी सीधा–सा सवाल है, वकील साहब ! बताओ, डकैतों और हत्यारों की तरफ़ से तुमने अब तक कितने मुक़दमों में पैरवी की है ?’’

  वकील ने अपने गुस्से के जवाब में लोगों को सहमते या अकड़ते हुए देखा था, इतने इत्मीनान से बदतमीजी करते हुए नहीं। इस जवाब के सामने उनका गुस्सा दुम हिलाने लगा, फिर चित्त होकर अदालत को चारों टाँगें दिखाता हुआ लेट गया। वकील की आँखें अदालत की ओर उठ गईं। उसने कहा, ‘‘श्रीमन्, अब आप ही देखें इस गवाह के रवैये को। यह बेहूदे ढंग से बात कर रहा है। इससे अदालत की मानहानि हो रही है।’’

 

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