Rag darbari, p.46

Rag Darbari, page 46

 

Rag Darbari
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  ‘‘है क्या ? काग़ज़ है।’’

  वे उसे तने हुए सीने और धँसी हुई आँखों से देखते रहे। खन्ना मास्टर ने हितैषी की तरह कहा, ‘‘लाइए, पढ़ दूँ।’’

  ‘‘जाइए, अपना काम देखिए। मुझे पढ़ाने की मेहनत न कीजिए।’’ वे घृणापूर्वक बोले। खन्ना मास्टर ने साँस खींचकर कहा, ‘‘इस जनम में पढ़ाने से कहाँ बचत है !’’

  प्रिंसिपल का चचेरा भाई खन्ना मास्टर के चेहरे पर निगाह जमाए खड़ा हुआ था, मालिक के बँगले की चहारदीवारी के अन्दर खड़ा अल्सेशियन जैसे सड़क के देसी कुत्ते को ताक रहा हो। प्रिंसिपल साहब काफ़ी देर तक उस काग़ज़ को घूर–घूरकर देखते रहे। पुराने ज़माने के ऋषि होते तो काग़ज़ अब तक जलकर भस्म हो चुका होता। काफ़ी देर तक उसे देखकर उन्होंने उसे खन्ना मास्टर को ही वापस कर दिया।

  खन्ना ने चिढ़कर कहा, ‘‘यह क्या ?’’

  ‘‘है क्या ? काग़ज़ है।’’ कहकर प्रिंसिपल एक गड्‌ढे का निरीक्षण करने लगे।

  खन्ना मास्टर ने होंठ दबाए। आवाज़ सँभालकर बोले, ‘‘जो भी हो, लिखित प्रार्थना–पत्र पर आपको लिखित आदेश देना होगा।’’

  प्रिंसिपल एक मज़दूर से बात करने लगे थे। कह रहे थे, ‘‘ठीक है, ठीक है। अब बन्द करो। अबे गड्ढा खुद रहा है गड्ढा। कुआँ नहीं खुद रहा है। काफ़ी है।’’

  खन्ना मास्टर थोड़ी देर गुमसुम रहे। फिर बोले, ‘‘मुझे चार दिन के लिए बाहर जाना है। छुट्टी चाहिए। आपको लिखकर हुक्म देना पड़ेगा।’’

  प्रिंसिपल साहब पंजों के बल गड्‌ढे की गीली मिट्टी पर अनायास बैठ गए ताकि देखनेवाले देख लें कि कॉलिज के हित में वे नाली तक में लोटने में संकोच नहीं करते और मज़दूरों को गड्‌ढे की मेंड़ के बारे में विस्तारपूर्वक आदेश देने लगे।

  खन्ना मास्टर की बात अब पाश्र्वसंगीत की हैसियत से ऊपर उभरी। वे भी पंजे के बल गड्ढे के दूसरे किनारे पर जाकर बैठ गए। बोले, ‘‘मेरी बात का जवाब दे दीजिए, उसके बाद गड्ढे में कूदिएगा।’’

  प्रिंसिपल ने इतनी देर बाद उन्हें सीधे–साधे देखा। कहा, ‘‘गड्ढे में कूदूँगा तो ज़रूर, पर पहले तुमको ढकेलकर तब ऊपर से कूदूँगा। समझ गए खन्ना मास्टर !’’ कहकर उन्होंने अपने चचेरे भाई की तरफ़ देखा। चचेरे भाई ने एकदम से विनम्र मातहत आवाज़ में कहा, ‘‘मैं जाकर चपरासियों को बुलाए लाता हूँ। लगता है कि झगड़े का अंदेशा है। पर प्रिंसिपल साहब, मेरी प्रार्थना है कि तब तक आप कुछ न कहिएगा।’’

  ‘‘मैं क्या कहूँगा भइया, मैं तो सब चुपचाप सहता चला जाता हूँ। जिस दिन इनका घड़ा भर जाएगा, अपने–आप भक्ख से फूटेगा।’’

  प्रिंसिपल ने यह कहकर खन्ना मास्टर को शाप–जैसा दिया। वे एकदम से घबरा गए। उन्हें डर लगा कि प्रिंसिपल चिल्लाकर कहीं यह न कह बैठे कि खन्ना उन्हें मार रहा है। कहीं मुक़दमे में न फँस जाएँ। वे चुपचाप गड्ढे के पास से उठकर दूर खड़े हुए एक दूसरे मास्टर के पास चले गए और ज़ोर से, ताकि सारी दुनिया सुन ले, बोले, ‘‘धमकी मत दीजिए मास्टर साहब, नवाबी का ज़माना नहीं है। इतनी आसानी से खन्ना की जान नहीं निकलेगी। आपको बताए देता हूँ। मेरी देह पर हाथ लगाया तो ख़ून हो जाएगा। कहे देता हूँ। हाँ !’’

  खन्ना चीख़ना नहीं चाहते थे, पर फैल मचाने की सोचते–सोचते वे सचमुच ही फैल मचाने लगे। कुछ मास्टर उनके आस–पास आकर खड़े हो गए।

  अचानक वे फिर चीख़े, ‘‘मारिए, मारिए न मुझको। बुलाइए चपरासियों को। उन्हीं के हाथों बेइज़्ज़त कराइए। रुके क्यों हैं ?’’

  तमाशा हो रहा है, इस सही बात को समझते ही दोनों गुटों के कई मास्टर मौके पर पहुँच गए। लड़के अभी काफ़ी संख्या में नहीं आए थे। जो आए भी थे, उन्हें चपरासियों ने डाँटकर दूर भगा दिया। वे बरामदे में खड़े–खड़े पूरी कार्रवाई देखते रहे। मौके पर यह तमाशा ‘सिर्फ़ वयस्कों के लिए’ रह गया।

  प्रिंसिपल साहब इस बगटुट प्रदर्शन पर पहले तो घबराए, फिर अपने गुस्से पर लगाम लगाकर खन्ना मास्टर के पास पहुँचे। उन्होंने उनके हाथ से छुट्टी की दरख़्वास्त खींच लीं और ठण्डे सुरों में कहा, ‘‘चिल्लाओ नहीं खन्ना मास्टर ! तुमको धोखा हो गया है। लाओ, तुम्हारी दरख़्वास्त पर हुक्म लिख दूँ।’’

  इशारा पाते ही उनके चचेरे भाई ने उनके हाथ में एक फाउंटेन–पैन पकड़ा दी। बागवानी की किताब पर दरख़्वास्त टिकाकर वे उस पर कुछ लिखने लगे। लिखते–लिखते बोले, ‘‘हम लोगों की सिद्धान्त की लड़ाई है। उसमें मारपीट का क्या सवाल ? शान्ति से काम लेना चाहिए।’’

  खन्ना मास्टर खुद अपने तमाशे से तंग हो रहे थे। कहने लगे, ‘‘पहले इस काग़ज़ पर हुक्म कीजिए, तब दूसरी बात होगी।’’

  ‘‘वही कर रहा हूँ,’’ वे मुस्कराकर बोले, ‘‘लो !’’ कई शब्दों पर उन्होंने गुणा का निशान बनाकर काट दिया था। कुछ के ऊपर गोल दायरा बना दिया था। अन्त में उन्होंने उस पर अंग्रेज़ी में लिखा–‘ख़ारिज।’

  इसके पहले कि खन्ना मास्टर कुछ बोल सकें, उन्होंने दरख़्वास्त उनके हाथ में पकड़ाते हुए कहा, ‘‘स्पेलिंग बहुत कमज़ोर है। ‘हालीडे’ में ‘यल’ के बाद ‘वाई’ लिख दिया है। खन्ना में पता नहीं कि ‘के’ कैपिटल लिखा है या स्माल। इस सबका ध्यान रखना चाहिए।’’

  थोड़ी देर सन्न रहकर खन्ना मास्टर ने गैंडे की तरह मुँह फाड़कर आवाज़ निकाली, ‘‘निकलना अब कॉलिज के बाहर। वहीं सारी स्पेलिंग याद करा दूँगा।’’

  फिर संग्राम शुरू हो गया।

  यह सवेरे की बात है। दोपहर तक थाने पर दोनों पक्षों की ओर से रिपोर्टें भी लिखा दी गईं। उनसे प्रकट होता था कि मास्टरों ने दंगा किया था और एक–दूसरे की हत्या करनी चाही थी। यह देखते हुए कि उन्हें हत्या करने से रोकनेवाला कोई न था, वह बात साफ़ नहीं हो रही थी कि उन्होंने फिर सचमुच ही अपने दुश्मनों की हत्या क्यों नहीं की। पुलिस ने इसी नुक्ते को पकड़कर उल्टी तरफ़ से मामले की जाँच शुरू कर दी।

  उसी दिन दोपहर को वैद्यजी की बैठक में इस घटना पर विचार–विमर्श हुआ। वहाँ सामान्य नागरिकों की मुख्य प्रतिक्रिया यही रही कि घटना को कुछ और महत्त्वपूर्ण होना चाहिए था, यानी अपने किसी साथी की हड्डी नहीं टूटी तो कोई हर्ज़ नहीं, कम–से–कम इतनी चोट तो लगनी ही चाहिए थी कि ख़ून निकल आता। उससे दुश्मनों के ख़िलाफ़ और भी अच्छा मुक़दमा बन सकता था। सनीचर ने यह सोचकर कि गाँव–प्रधान बनने के पहले नेतागिरी का एक काम और कर लिया जाय, बिना किसी फ़ीस के अपनी सेवाएँ अर्पित कर दीं और कहा कि प्रिंसिपल साहब चाहें तो मैं उनके हाथ में बरछी भोंककर खून निकाल सकता हूँ, अभी कुछ बिगड़ा नहीं है, यह भी खन्ना के नाम लिख जाएगा। छोटे पहलवान ने उसे दुतकारकर चुप कर दिया।

  उस दोपहर रंगनाथ और रुप्पन बाबू सारी बातें चुपचाप सुनते रहे और कुछ भी नहीं बोले जो कि शिवपालगंज में बेवकूफ़ी की अलामत थी, पर वास्तव में वे भीतर–ही–भीतर प्रिंसिपल पर जलते–भुनते रहे और बहुत बाद में रुप्पन बाबू ने बाहर आकर कहा कि यह साला पिताजी को अभी कचहरी के रास्ते पर लिये जा रहा है और बाद में उन्हें जेल में ले जाकर छोड़ेगा।

  उस दोपहर वैद्यजी प्रिंसिपल की ज़बानी खन्ना मास्टर की कहानी गम्भीरतापूर्वक सुनते रहे और पूरी बात सुनकर उन्होंने एक ऐसी बात कही जिसका इस मामले से कोई सम्बन्ध न था। बात बड़ी सात्विक थी और आदमी को एकदम नीरोग बना देती थी।

  उन्होंने कहा :

  ‘‘ज़िला विद्यालय–निरीक्षक का धर्म देखकर मैं तो दंग रह गया। गत मंगलवार शहर गया था। देखा, एक व्यक्ति हनुमानजी के मन्दिर में पृथ्वी पर साष्टांग लेट रहा है। वह उठा तो मैं अवाक् रह गया। ये हमारे विद्यालय–निरीक्षकजी थे। आँखों से उनकी, जो है सो, प्रेमाश्रु टपक रहे थे। मैंने नमस्कार किया तो प्रतिनमस्कार में उन्होंने भरे गले से कुछ ‘हाऊ–हाऊ’ जैसा कहा, फिर आँखें मूँद लीं।

  ‘‘भैंस का उत्तम घृत लिये जाइएगा चार–छ: सेर। ऐसा धार्मिक आदमी वनस्पति खा–खाकर अपना धर्म नष्ट कर रहा है।

  ‘‘समय की लीला !’’

  एक पुराने श्लोक में भूगोल की एक बात समझाई गई है कि सूर्य दिशा के अधीन होकर नहीं उगता। वह जिधर ही उदित होता है, वही पूर्व दिशा हो जाती है। उसी तरह उत्तम कोटि का सरकारी आदमी कार्य के अधीन दौरा नहीं करता, वह जिधर निकल जाता है, उधर ही उसका दौरा हो जाता है।

  इस नये सौर-सिद्धान्त के अन्तर्गत एक महापुरुष उसी दिन शाम के लगभग चार बजे शहर से मोटर भगाते हुए देहात की ओर आए। सड़क के दोनों ओर प्रजा के खेतों पर निगाह डालते हुए उन्होंने अपने–आपको धन्यवाद दिया कि उनके पिछले साल के व्याख्यान के कारण इस साल रबी की फ़सल अच्छी होनेवाली है। काश्तकार उनके बताये तरीके से खेती कर रहे हैं। उन्हें यह मालूम हो गया है कि खेत जोतना चाहिए। और उनमें खाद ही नहीं, बीज भी डालना चाहिए। वे सब बातें समझने–बूझने लगे हैं और नयी समझदारी के बारे में उनकी घबराहट छूट चुकी है। किसान प्रगतिशील हो रहे हैं और संक्षेप में वे इसी मामले में पिछड़े हैं कि वे आज भी किसान हैं।

  मोटर तेज़ी से भागी जा रही थी और सड़क पर टेढ़े–मेढ़े चलते हुए मुसाफ़िर आँधी के पत्तों की तरह उड़–उड़कर किनारे होते चले जा रहे थे। उन्होंने फिर अपने को धन्यवाद दिया कि इतने आलसी नागरिक उनकी वेगवती मोटर के असर से इतने फुर्तीले हो गए हैं। साथ ही वे इतने चतुर भी हो गए हैं कि ऐसी तेज़ मोटर के नीचे उनका अँगूठा तक नहीं कुचलता। सन्तोष के साथ उन्होंने अपने–आपसे, फिर भारतवर्ष से कहा, ‘‘शाबाश ! तेरा भविष्य उज्ज्वल है।’’

 

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