Rag darbari, p.13

Rag Darbari, page 13

 

Rag Darbari
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  रामाधीन ने कहा, ‘‘मैंने तो शेर लिखा है, कहा नहीं है।’’

  वे बोले, ‘‘ग़लत बात है। शेर लिखा नहीं जा सकता।’’

  ‘‘पर मैं तो लिख चुका हूँ।’’

  ‘‘नहीं, तुमने शेर कहा है। शेर कहा जाता है। यही मुहाविरा है।’’ उन्होंने रामाधीन को शेर कहने की कुछ आवश्यक तरकीबें समझाईं। उनमें एक यह थी कि शायरी मुहाविरे के हिसाब से होती है, मुहाविरा शायरी के हिसाब से नहीं होता। दूसरी बात शायर के उपनाम की थी। टाँडवी ने उन्हें सुझाया कि तुम अपना उपनाम ईमान शिवपालगंजी रखो। पर ईमान से तो उन्हें यह ऐतराज था कि उन्हें इसका मतलब नहीं मालूम; ‘शिवपालगंजी’ इसलिए ख़ारिज हुआ कि उनके असली गाँव का नाम भीखमखेड़ा था और उपनाम से ही उन्हें इसलिए ऐतराज हुआ कि अफ़ीम के कारोबार में उनके कई उपनाम चलते थे और उन्हें कोई नया उपनाम पालने का शौक़ न था। परिणाम यह हुआ कि वे शायरी के क्षेत्र में बाबू रामाधीन भीखमखेड़वी बनकर रह गए।

  ‘कलूटी लड़कियाँ हर शाम मुझको छेड़ जाती हैं।’–इस मिसरे से शुरू होनेवाली एक कविता उन्होंने अफ़ीम की डिबियों पर लिखी थी।

  पर शायरी की बात सिर्फ़ दानिश टाँडवी की सोहबत तक ही रही। जेल जाने पर उनसे आशा की जाती थी कि दूसरे महान् साहित्यिकों और कवियों की तरह अपने जेल–जीवन के दिनों में वे अपनी कोई महान् कलाकृति रचेंगे और बाद में एक लम्बी भूमिका के साथ उसे जनता को पेश करेंगे; पर वे दो साल जेल के खाने की शिकायत और कै़दियों से हँसी–मज़ाक करने, वार्डरों की गालियाँ सुनने और भविष्य के सपने देखने में बीत गए।

  शिवपालगंज में आकर गँजहा लोगों के सामने अपनी विशिष्टता दिखाने के लिए उन्होंने फिर से अपने नाम के साथ भीखमखेड़वी का खटखटा बाँधा। बाद में जब बिना किसी कारण के, सिर्फ़ गाँव की या पूरे भारत की सभ्यता के असर से वे गुटबन्दी के शिकार हो गए, तो उन्होंने एकाध शेर लिखकर यह भी साबित किया कि भीखमखेड़वी सिर्फ़ भूगोल का ही नहीं, कविता का भी शब्द है।

  कुछ दिन हुए, बद्री पहलवान ने शिवपालगंज से दस मील आगे एक दूसरे गाँव में आटाचक्की की मशीन लगायी थी। चक्की ठाठ से चली और वैद्यजी के विरोधियों ने कहना शुरू किया कि उसका सम्बन्ध कॉलिज के बजट से है। इस जन–भावना को रामाधीन ने अपनी इस अमर कविता द्वारा प्रकट किया था :

  क्या करिश्मा है ऐ रामाधीन भीखमखेड़वी,

  खोलने कॉलिज चले, आटे की चक्की खुल गई !

  गाँव के बाहर बद्री पहलवान का किसी ने रिक्शा रोका। कुछ अँधेरा हो गया था और रोकनेवाले का चेहरा दूर से साफ़ नहीं दिख रहा था। बद्री पहलवान ने कहा, ‘‘कौन है बे ?’’

  ‘‘अबे–तबे न करो पहलवान ! मैं रामाधीन हूँ।’’ कहता हुआ एक आदमी रिक्शे के पास आकर खड़ा हो गया। रिक्शेवाले ने एकदम से बीच सड़क पर रिक्शा रोक दिया। आदमी धोती–कुरता पहने था। पर धुँधलके में दूसरे आदमियों के मुक़ाबले उसे पहचानना हो तो धोती–कुरते से नहीं, उसके घुटे हुए सिर से पहचाना जाता। रिक्शे का हैंडिल पकड़कर वह बोला, ‘‘मेरे घर में डाका पड़ने जा रहा है, सुना ?’’

  पहलवान ने रिक्शेवाले की पीठ में एक उँगली कोंचकर उसे आगे बढ़ने का इशारा किया और कहा, ‘‘तो अभी से क्यों टिलौं–टिलौं लगाए हो ? जब डाका पड़ने लगे तब मुझे बुला लेना।’’

  रिक्शेवाले ने पैडिल पर ज़ोर दिया, पर रामाधीन ने उसका हैंडिल इस तरह पकड़ रखा था कि उनके इस ज़ोर ने उस ज़ोर को काट दिया। रिक्शा अपनी जगह रहा। बद्री पहलवान ने भुनभुनाकर कहा, ‘‘मैं सोच रहा था कि कौन आफ़त आ गई जो सड़क पर रिक्शा पकड़कर राँड़ की तरह रोने लगे।’’

  रामाधीन बोले, ‘‘रो नहीं रहा हूँ। शिकायत कर रहा हूँ। वैद्यजी के घर में तुम्हीं एक आदमी हो, बाकी तो सब पन्साखा हैं। इसीलिए तुमसे कह रहा हूँ। एक चिट्ठी आयी है, जिसमें डकैतों ने मुझसे पाँच हज़ार रुपया माँगा है। कहा है कि अमावस की रात को दक्खिनवाले टीले पर दे जाओ...’’

  बद्री पहलवान ने अपनी जाँघ पर हाथ मारकर कहा, ‘‘मन हो तो दे आओ, न मन हो तो एक कौड़ी भी देने की ज़रूरत नहीं। इससे ज़्यादा क्या कहें ! चलो रिक्शेवाले !’’

  घर नज़दीक है, बाहर पिसी हुई भंग तैयार होगी, पीकर, नहा–धोकर, कमर पर बढ़िया लँगोट कसकर, ऊपर से एक कुरता झाड़कर, बैठक में हुमसकर बैठा जाएगा। लोग पूछेंगे, पहलवान, क्या कर आए ? वे आँखें बन्द करके दूसरों के सवाल सुनेंगे, दूसरों को ही जवाब देने देंगे। देह की ताक़त और भंग के घुमाव में सारे संसार की आवाज़़ें मच्छरों की भन्नाहट–सी जान पड़ेंगी।

  सपनों में डूबते–उतराते हुए बद्री को इस वक़्त सड़क पर रोका जाना बहुत खला। उन्होंने रिक्शेवाले को डपटकर दोबारा कहा, ‘‘तुमसे कह रहा हूँ, चलो।’’

  पर वह चलता कैसे ? रामाधीन का हाथ अब भी रिक्शे के हैंडिल पर था। उन्होंने कहा, ‘‘रुपये की बात नहीं। मुझसे कोई क्या खाकर रुपया लेगा ? मैं तो तुमसे बस इतना कहना चाहता था कि रुप्पन को हटक दो। अपने को कुछ ज़्यादा समझने लगे हैं। नीचे–नीचे चलें, आसमान की...।’’

  बद्री पहलवान अपनी जाँघों पर ज़ोर लगाकर रिक्शे से नीचे उतर पड़े। रामाधीन को पकड़कर रिक्शेवाले से कुछ दूर ले गए और बोले, ‘‘क्यों अपनी ज़बान खराब करने जा रहे हो ? क्या किया रुप्पन ने ?’’

  रामाधीन ने कहा, ‘‘मेरे घर यह डाकेवाली चिट्ठी रुप्पन ने ही भिजवायी है। मेरे पास इसका सबूत है।’’

  पहलवान भुनभुनाए, ‘‘दो–चार दिन के लिए बाहर निकलना मुश्किल है। उधर मैं गया, इधर यह चोंचला खड़ा हो गया।’’ कुछ सोचकर बोले, ‘‘तुम्हारे पास सबूत है तो फिर घबराने की क्या बात ?’’ रामाधीन को अभय–दान देते हुए उन्होंने ज़ोर से कहा, ‘‘तो फिर तुम्हारे यहाँ डाका–वाका न पड़ेगा। जाओ, चैन से सोओ। रुप्पन डाका नहीं डालते, लौण्डे हैं, मसखरी की होगी।’’

  रामाधीन कुछ तीखेपन से बोले, ‘‘सो तो मैं भी जानता हूँ–रुप्पन ने मसखरी की है। पर यह मसखरी भी कोई मसखरी है।’’

  बद्री पहलवान ने सहमति प्रकट की। कहा, ‘‘तुम ठीक कहते हो। टुकाची ढंग की मसखरी है।’’

  सड़क पर एक ट्रक तेज़ी से आ रहा था। उसकी रोशनी में आँख झिलमिलाते हुए बद्री ने रिक्शेवाले से कहा, ‘‘रिक्शा किनारे करो। सड़क तुम्हारे बाप की नहीं है।’’

  रामाधीन बद्री के स्वभाव को जानते थे। इस तरह की बात सुनकर बोले, ‘‘नाराज़ होने की बात नहीं है पहलवान ! पर सोचो, यह भी कोई बात हुई !’’

  वे रिक्शे की तरफ़ बढ़ आए थे। बैठते हुए बोले, ‘‘जब डाका ही नहीं पड़ना है तो क्या बहस ! चलो रिक्शेवाले !’’ चलते–चलते उन्होंने कहा, ‘‘रुप्पन को समझा दूँगा। यह बात ठीक नहीं है।’’

  रामाधीन ने पीछे से आवाज़ ऊँची करके कहा, ‘‘उसने मेरे यहाँ डाका पड़ने की चिट्ठी भेजी है। इस पर उसे सिर्फ़ समझाओगे ? यह समझाने की नहीं, जुतिआने की बात है।’’

  रिक्शा चल दिया था। पहलवान ने बिना सिर घुमाए जवाब दिया, ‘‘बहुत बुरा लगा हो तो तुम भी मेरे यहाँ वैसी ही चिट्ठी भिजवा देना !’’

  7

  छत के ऊपर एक कमरा था जो हमेशा संयुक्त परिवार की पाठ्य-पुस्तक-जैसा खुला पड़ा रहता था। कोने में रखी हुई मुगदरों की जोड़ी इस बात का ऐलान करती थी कि सरकारी तौर पर यह कमरा बद्री पहलवान का है। वैसे, परिवार के दूसरे प्राणी भी कमरे का अपने–अपने ढंग से प्रयोग करते थे। घर की महिलाएँ काँच और मिट्टी के बरतनों में ढेरों अचार भरकर छत पर धूप में रखती थीं और शाम होते–होते कमरे में जमा कर देती थीं। यही हाल छत पर सूखनेवाले कपड़ों का भी था। कमरे के आर–पार एक रस्सी लटकती थी जिस पर शाम के वक़्त लँगोट और चोलियाँ, अँगोछे और पेटीकोट साथ–साथ झूलते नज़र आते थे। वैद्यजी के दवाखाने की अनावश्यक शीशियाँ भी कमरे की एक आलमारी में जमा थीं। प्राय: सभी शीशियाँ खाली थीं। उन पर चिपके हुए सचित्र विज्ञापन ‘इस्तेमाल के पहले’ शीर्षक पर एक अर्धमानव की तस्वीर से और ‘इस्तेमाल के बाद’ शीर्षक के अन्तर्गत एक ऐसे आदमी की तस्वीर से, जिसकी मूँछें ऐंठी हुई हैं, लँगोट कसा हुआ है और परिणामत: स्वास्थ्य बहुत अच्छा है, पता चलता था कि ये वही शीशियाँ हैं जो हज़ारों इन्सानों को शेर के मानिन्द बना देती हैं; यह दूसरी बात है कि वे अपने गुसलखाने और शयन-कक्ष में ही कमर लपलपाते हुए शेर की तरह घूमा करते हैं, बाहर बकरी–के–बकरी बने रहते हैं।

  एक साहित्य है जो गुप्त कहलाता है, जो ‘भारत में अंग्रेज़ी राज’ जैसी पुस्तकों से भी ज़्यादा खतरनाक है, क्योंकि उसका छापना 1947 के पहले तो जुर्म था ही, आज भी जुर्म है, जो बहुत–सी दफ़्तरी बातों की तरह गुप्त होकर भी गुप्त नहीं रहता, जो आहार–निद्रा– भय आदि में फँसे हुए आदमियों की ज़िन्दगी में एक बड़े सुखद लिटरेरी सप्लीमेण्ट का काम करता है और जो विशिष्ट साहित्य और जन–साहित्य की बनावटी श्रेणियों को लाँघकर व्यापक रूप से सबके हृदयों में प्रतिष्ठित है। वैसे उसमें कोई खास बात नहीं होती, सिर्फ़ यही बताया जाता है कि किसी आदमी ने किसी आदमी या किसी औरत के साथ किसी तरह से क्या बर्ताव किया; यानी उसमें, सुमित्रानन्दन पन्त की दार्शनिक भाषा में कहा जाए तो, ‘मानव मानव के चिरन्तन’ सम्बन्धों का वर्णन होता है।

 

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