Rag darbari, p.62

Rag Darbari, page 62

 

Rag Darbari
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  बाबाजी ने ब्राह्‌मण उम्मीदवार को सान्त्वना दी और पूरी बात समझकर उसे इस संकट से पार उतारने के लिए, गाँजे की चिलम को टेंट में खोंसकर और नक़ली जटाओं पर थोड़ी–सी धूल डालकर बस्ती की ओर चल दिए। उन्होंने एक मन्दिर के सामने डेरा डाला और दूसरे दिन से कबीर और रामानन्द से लेकर गुरु गोरखनाथ तक की ऐसी–ऐसी कहानियाँ सुनाने लगे जिनका अन्तिम निष्कर्ष यही था कि जाति–पाँति पूछे ना कोय और जो हरि को भजता है वह हरि का होता है।

  यह ‘हरि’ क्या चीज़ है, इसे भी लोगों ने उसी दिन शाम से ही समझना शुरू कर दिया। एक चिलम में गाँजे की कली रखी गई जिस पर सुलगती हुई आग ठूँस दी गई। उसे गाल पिचकाकर और उतने ही बार फुलाकर सुलगाया गया और दम खींची गई। एक साँस और दूसरी साँस के इंटरवल के दौरान शंकरजी का नाम कई ढंग से कई अर्थों के साथ लिया गया। वह चिलम भक्तों में इधर–से–उधर और उधर–से–इधर घूमती रही। भक्त समझते रहे कि यही ‘हरि’ है।

  बाबाजी के दरबार में अड़तालीस घण्टे तक अखंड कीर्तन चलता रहा। जो गाँजा नहीं पीते थे उनके लिए बराबर भंग का इन्तज़ाम हुआ और जब तक कीर्तन चला तब तक सिल पर लोढ़ा भी चलता रहा। हारमोनियम बजता रहा और राधाकृष्ण और सीताराम की खुशामद में ऐसी–ऐसी धुनें गायी गईं जिनके सामने सिनेमा के बड़े–बड़े गाने पस्त हो गए, जैसे :

  लेके पहला–पहला प्यार, भरके आँखों में खुमार

  जादू नगरी से आया है कोई जादूगर।

  के मुक़ाबले

  लेके पहला–पहला प्यार, तजके ग्वालों का संसार

  मथुरा नगरी में आया है कोई वंशीधर

  ने मैदान मार लिया।

  बाबाजी दो दिन के बाद ही श्रीकृष्ण का अवतार मान लिए गए; यह दूसरी बात है कि जमुना का जल न पीकर उन्होंने सिर्फ़ गाँजा पिया और पिशाचों की तरह श्रीकृष्ण के मुक़ाबले वे शंकर भगवान् के ज़रा नज़दीक रहे। इस दौरान चिलम धकाधक सुलगती रही और साबित करती रही कि गाँजा चाहे चोरी का हो, चाहे सरकारी दुकान का और गंगाजल चाहे गंगोत्री का हो या गन्दे नाले के संगम का, इनका असर हर हालत में बराबर रहता है।

  बाबाजी बहुत मस्त आदमी थे। वे कीर्तन का मुआइना ही नहीं, खुद कीर्तन भी करते थे। अगर वे गाँजा न पीते होते तो उनकी आवाज़ गले के बाहर निकलकर साफ़-साफ़ सुनायी पड़ती और अगर वहाँ हारमोनियम न बजती होती तो उनके कीर्तनों में एक धुन भी पायी जा सकती थी। पर इन स्वाभाविक अड़चनों के बावजूद बाबाजी ने गाँव–भर को देखते–देखते अपने काबू में कर लिया। उन्होंने कबीर, रैदास और रामानन्द के ऐसे–ऐसे भजन सुनाए कि लोग इन सन्तों की जयजयकार करने लगे। वे सन्त वहाँ मौजूद होते तो ऐसी मौलिक कविता सुनकर बाबाजी की जयजयकार करने लगते। इसी असर में बाबाजी ने गाँव से जातिवाद का नाम हटा दिया और एक दिन उन्होंने गाँजे, भंग और कीर्तन के माहौल में जब इशारा किया कि इस गाँव का प्रधान बड़ा धर्मात्मा आदमी है तो लोग चकित रह गए। एक भँगेड़ी ने कहा कि अभी तो कोई प्रधान चुना ही नहीं गया है और इस ओहदे पर पहली बार चुनाव होना है, तो बाबाजी ने फिर इशारा किया कि हमारे भगवान् ने तो चुनाव कर दिया है। संक्षेप में, नशा उतरने से पहले ही लोगों को मालूम हो गया कि ब्राह्‌मण उम्मीदवार को भगवान् ने स्वयं प्रधान चुन लिया है और इस ज्ञान के आधार पर, नशा उतरने के पहले लगभग सभी गाँववालों ने उन्हें अपना प्रधान स्वीकार कर लिया। इस प्रकार लात सुन्न पड़ गई और मुँह की विजय हुई।

  नेवादावाला तरीक़ा चुनाव लड़नेवालों के लिए बड़ा कारगर साबित हुआ। दूसरे गाँवों से लोगों ने उसे संशोधित रूप से स्वीकार करके बड़े–बड़े चुनाव जीते। जहाँ गाँजा पीनेवाले बाबाजी नहीं मिले, या उतना गाँजा नहीं मिला, वहाँ लोगों ने ज़्यादातर किसी को भी बाबा बनाकर देवी की पूजा का इन्तज़ाम करना शुरू कर दिया। उन जगहों पर बकरे की बलि होने लगी और दारू का प्रसाद भी चढ़ने लगा। इसका भी यही नतीजा होता था कि लात सुन्न पड़ जाती थी और मुँह की विजय होने लगती थी।

  इस तरह पेटेंट किया हुआ तरीक़ा चुनाव–संहिता में नेवादावाली पद्धति के नाम दर्ज हुआ।

  महिपालपुरवाला तरीक़ा शुद्ध वैज्ञानिक और सबसे सीधा था। इसका विकास एक चुनाव–अधिकारी की ग़लती से हुआ और बाद में उस ग़लती को मान्यता देकर उसे कई जगह दोहराया गया। वह ग़लती एक घड़ी को लेकर हुई।

  चुनाव बारह बजे दिन को होना था। चुनाव–अधिकारी की घड़ी चूँकि शहर के घण्टाघर से मिली थी और घण्टाघर की चुंगी के चेयरमैन के घर से मिली थी, इसलिए सवा घण्टा तेज़ थी। नतीजा यह हुआ कि चुनाव–अधिकारी ने कुछ उम्मीदवारों के विरोध के बावजूद–पौन ग्यारह बजे ही, जितने वोटर और उम्मीदवार आ गए थे, उन्हीं से चुनाव पूरा कराके उसके नतीजे का वहीं ऐलान कर दिया। जब बचे हुए वोटर और उम्मीदवार चुनाव लड़ने के लिए घटनास्थल पर पहुँचे, उस समय चुनाव–अधिकारी अपने घर पर एक बजकर पन्द्रह मिनट पर खाया जानेवाला खाना खा रहा था।

  इस चुनाव के ख़िलाफ़ याचिका दाखिल हुई और उसमें सारी बहस घड़ियों को लेकर हुई। वह मुक़दमा काफ़ी वैज्ञानिक साबित हुआ और उससे अदालत को कई क़िस्म की घड़ियों के बारे में मेकेनिकल जानकारी हासिल करने का मौक़ा मिला। इसका परिणाम यह हुआ कि मुक़दमा तीन साल चला, पर न यह साबित होना था, और न हुआ कि चुनाव–अधिकारी ने कोई ग़लती की है। उसने जिसे सभापति घोषित कर दिया था, वह अपनी घड़ी को हमेशा के लिए सवा घण्टे तेज़ करके गाँव पर यथाविधि हुकूमत करता रहा। बाक़ी उम्मीदवार, बक़ौल छोटे पहलवान, घड़ी की जगह घण्टा लेकर बैठे रहे।

  महिपालपुरवाली घटना शुद्ध आकस्मिक थी; पर न्यूटन के सामने पेड़ से सेब गिरने की घटना भी वैसे ही आकस्मिक थी जिससे उसने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त निकाला था। बाद में चुनाव के फ़न में माहिर लोगों ने भी महिपालपुर की घटना से एक सिद्धान्त निकाला था, और वह यह था कि सब घड़ियाँ एक साथ एक वक़्त नहीं दिखातीं और सब वोटर एक साथ एक जगह पर नहीं पहुँचते।

  इस सिद्धान्त की खोज हो जाने के बाद गाँव–पंचायतों के चुनावों में इसका उपयोग कई बार कई तरह से हुआ। चुनाव-अफ़सरों की घड़ियाँ महिपालपुर की नज़ीर को सामने रखकर छुटपुट तौर से घण्टा-आध घण्टा तेज़ या धीमी हो जातीं और चूँकि घड़ी एक मशीन है, इसलिए उसके बारे में किसी इन्सान को दोष नहीं दिया जाता था। फिर ज़्यादातर यह भी होने लगा कि जिस उम्मीदवार की घड़ी का मेल चुनाव-अफ़सर की घड़ी से हो जाता, वह चुनाव में विजयी बनने लगा। वह दो मशीनों का खेल था और इसके लिए भी किसी इन्सान को दोषी ठहराना अवैज्ञानिक बात होती।

  भूगोल के हिसाब से शिवपालगंज से महिपालपुर दूर पड़ता था और नेवादा नज़दीक। इसलिए रामाधीन भीखमखेड़वी को नेवादा-पद्धति का अच्छा ज्ञान था। उसका उन्होंने खुलकर प्रयोग भी किया था। उधर सनीचर की ओर से वैद्यजी ने भूगोल के मुक़ाबले इतिहास का ज़्यादा सहारा लिया था और अतीत काल की सब पद्धतियों का मनन करके सनीचर की ओर से महिपालपुरवाली पद्धति अपनाने की राय दी थी। परिणामस्वरूप, उनकी ओर से सिर्फ़ एक सस्ती घड़ी का खर्च हुआ जो चुनाव-अफ़सर भूल से अपनी क़लाई पर बाँधे हुए अपने घर लौट गए, जबकि नेवादा-पद्धति का प्रयोग करनेवाले हारकर निराशा और शराब के असर से मैदान में ढेर हो गए। नशाख़ाेरी की विशेषज्ञता के अलावा उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ।

  25

  ओ सजना, बेदर्दी बालमा,

  तुमको मेरा मन याद करता है। पर...चाँद को क्या मालूम, चाहता उसको कोई चकोर। वह बेचारा दूर से देखे करे न कोई शोर। तुम्हें क्या पता कि तुम्हीं मेरे मन्दिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो, तुम्हीं देवता हो। याद में तेरी जाग–जाग के हम रात–भर करवटें बदलते हैं।

  अब तो मेरी यह हालत हो गई है कि सहा भी न जाए, रहा भी न जाए। देखो न मेरा दिल मचल गया, तुम्हें देखा और बदल गया। और तुम हो कि कभी उड़ जाए, कभी मुड़ जाए, भेद जिया का खोले ना। मुझको तुमसे यही शिकायत है कि तुमको प्यार छिपाने की बुरी आदत है। कहीं दीप जले कहीं दिल, ज़रा देख तो आकर परवाने।

  तुमसे मिलकर बहुत–सी बातें करनी हैं। ये सुलगते हुए जज़्बात किसे पेश करें। मुहब्बत लुटाने को जी चाहता है। पर मेरा नादान बालमा न जाने जी की बात। इसीलिए उस दिन मैं तुमसे मिलने आयी थी। पिया–मिलन को जाना। अँधेरी रात। मेरी चाँदनी बिछुड़ गई, मेरे घर में पड़ा अँधियारा था। मैं तुमसे यही कहना चाहती थी, मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिए। बस, अहसान तेरा होगा मुझ पर मुझे पलकों की छाँव में रहने दो। पर ज़माने का दस्तूर है ये पुराना, किसी को गिराना किसी को मिटाना। मैं तुम्हारी छत पर पहुँचती पर वहाँ तुम्हारे बिस्तर पर कोई दूसरा लेटा हुआ था। मैं लाज के मारे मर गई। बेबस लौट आयी। आँधियो, मुझ पर हँसो, मेरी मुहब्बत पर हँसो।

  मेरी बदनामी हो रही है और तुम चुपचाप बैठे हो। तुम कब तक तड़पाओगे ? तड़पाओगे ? तड़पा लो, हम तड़प–तड़पकर भी तुम्हारे गीत गायेंगे। तुमसे जल्दी मिलना है। क्या तुम आज आओगे क्योंकि आज तेरे बिना मेरा मन्दिर सूना है। अकेले हैं, चले आओ जहाँ हो तुम। लग जा गले से फिर ये हँसी रात हो न हो। यही है तमन्ना तेरे दर के सामने मेरी जान जाए, हाय। हम आस लगाए बैठे हैं। देखो जी, मेरा दिल न तोड़ना।

  तुम्हारी याद में,

 

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